कोरोना ले डूबेगी नीतीश कुमार की कुर्सी …!

आप तो जानते हीं होंगे बिहार को लेकिन शायद आपके मन में बिहार की गरीबी, लाचारी, विवशता सहित आशिक्षा के साथ नौकर वाली छवि घर कर गयी होगी। स्वाभाविक है क्योंकि हम बिहारियों ने इस प्रकार की नकारात्मक छवि स्वयं गढ़ी है, वैसे में इसका दंड भुगतना भी खुद ही पड़ेगा। यह वही बिहार हैं जहाँ आजादी के बाद उद्योग के साथ – साथ सामाजिक समरसता का एक मिसाल देश देता था। एक तहजीब थी एक – दूसरे को मजबूत करने की। सबकुछ ठीक ठाक चल रहा था कुछ परिस्थितियों को छोड़ कर, परन्तु मंडल कमीशन के बाद बिहार पर राजनेताओं की नजर लग गयी और भ्रष्ट पदाधिकारियों में अनपढ़ नेताओं से सत्ता का कमान पर्दा के पीछे से अपने हाथ में ले लिया। डॉ जगरनाथ मिश्र के हाथ से CM की कुर्सी हाथ से निकल गयी। इसके बाद 1990 से 8 मई 2020 तक बिहार बिलखता रहा GDP के बढ़ते ग्रोथ के बाद भी। बिहार जहाँ की शिक्षा और अनुशासन की दुहाई न सिर्फ भारत बल्कि पूरी दुनिया देती थी क्योंकि यह वही बिहार है जिसने संसार को लोकतंत्र दिया, भले ही आज उस लोकतंत्र का मजाक उड़ाया जा रहा है। आप किसी को चुनो कुर्सी पर कुर्सी कुमार यानि कि नीतीश कुमार ही बैठेंगे। 1990 के पहले की बहुत सारी कहानी पर शायद मेरे ऊपर जातिवाद का आरोप मढ दिया जाए पर बिहार में जातिवाद से अलग होकर किसी भी सिस्टम की कल्पना खुद को धोखा देने जैसा है। 1974 के J P आंदोलन के बाद बिहार पर ऐसी नजर लग गयी जिससे बिहार धीरे – धीरे खुशहाल बिहार – बदहाल बिहार की ओर दहलीज पर दस्तक देना प्रारंभ हो गया। 1947 में भारत आजाद हुआ और 1950 में गणतंत्र हुआ और गुलामी से मुक्ति मिली और विकास की दिशा में सांस लेना ही शुरू हए और महज 27 वर्ष बाद ही इमरजेंसी लागू हो गया और सत्ता परिवर्तन का खेल निरंतर चलने लगा। 1990 में गरीबों की आवाज बनकर लालू यादव आये परन्तु चारा घोटाला और साला साधु-सुभाष की कारनामे बिहार की अस्मिता और अस्तित्व को कटघरे में डालने लगी। हत्या, अपहरण, बलात्कार सहित दिन दहाड़े डकैती के साथ कानून का मजाक उड़ाने लगा और बिहार के लोग भी बिहारी से डरने लगे। जंगलराज की उपाधि से बिहार सुशोभित होने लगा और लोग धीरे-धीरे यह भूलने लगे कि यह बिहार चाणक्य, बुद्ध सहित जैन की नगरी है और जिस मिट्टी ने दुनिया को सबसे बड़ा लोकतंत्र दिया, शून्य दिया, गुरुकुल की परिभाषा के साथ एक सम्राट दिया जिसकी चर्चा विश्व जगत में ख्याति रखती है लेकिन खून एवम भय से लथपथ बिहार आवारा की तरह सरेआम भटकने लगा। नीतीश कुमार भी उसी जंगलराज के सिपाही थे और लालू यादव के जेल जाने के बाद मुख्यमंत्री का ख्याब उस वक्त बिखर गए जब इंजीनियर उम्मीदवार के रहते गृहणी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बन दिया गया। 1995 के बाद शुरू हुआ फिर से बिहार उदय की राजनीति परन्तु तब तक झारखंड अलग राज्य के लिए राग अलापना तेज कर दिया और लालू राबड़ी की सरकार को विपक्ष के साथ सत्ता के सिंहासन पर बैठने की ललक ने नीतीश कुमार को बागी बना दिया और जॉर्ज फर्नांडिस के नेत्तृत्व में नीतीश कुमार की लोकप्रियता एक तरफ बढ़ने लगे तो दूसरी तरफ बिहार की जनता, कल कारखाने, उद्योग जगत, शिक्षा चिकित्सा के साथ कानून व्यवस्था बेपटरी हो गयी और कुशासन के हर खेल हुए। 1990 के बाद एक तरफ जनसंघ से बनी भाजपा अपना वर्चस्व बनाने लगी। घोटाला के साथ साथ IAS की पत्नी का बलात्कार के साथ शिल्पी गौतम प्रकरण जैसे वारदात के नक्सलवाद की वलिवेदी पर बिहार राजनीतिक महत्वकांक्षा के कारण दलदल में धंसता चला गया। मुखरता के साथ बिहार में लालू राबड़ी सरकार को उखाड़ फेंकने की क्षमता भाजपा के पास हासिल हो गयी वैसे में नीतीश कुमार से गठबंधन कर बिहार नई दिशा की ओर बढने लगा लेकिन तक तक बिहार में सबकुछ चौपट हो गया। हाँ इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि लालू यादव ने गूंगे को भी जुबान दे दी और वही लालू के लिए काल बन गया। कांग्रेस सत्ता से दूर होने के बाद बिहार की राजनीति से भी बाहर होने लगी और उसकी जगह क्षेत्रीय दलों ने बना ली।
बिहार में उम्मीद की किरण के रूप में नीतीश कुमार दिखने लगे। पढा लिखा और बदजुबानी से दूर फूहड़ता से कोई लेना देना नहीं और उद्देश्य पवित्र का संकल्प ने बिहारवासी को वह भगवान की तरह लगने लगे। नतीजा यह हुआ कि वह पहली बार 7 दिन के लिए मुख्यमंत्री बने परन्तु इसके बाद 2005 के नवम्बर में बिहार में लालू राबड़ी सरकार का सफाया हो गया। बिहार का नया जन्म हुआ ऐसा और बच्चा लड़ प्यार में बढ़ने लगा। उम्मीद पर खरा उतरता देख और 5 वर्ष के बेहतरीन प्रयास ने 2010 में लालू राबड़ी की सरकार को विपक्ष के लायक भी नहीं रहने दिया। अब यही से शुरू हुआ शह और मात की खेल जिसके बाद बिहार का चाणक्य बन चुके नीतीश कुमार को ऐसा लगने लगा कि बिहार में वह बिना भाजपा के भी हुकूमत चला सकती है वही दूसरी ओर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी PM के रूप में उभरकर आने लगे। 2004 में अटल युग का अंत हो गया और 22009 के लोकसभा में लालकृष्ण आडवाणी करिश्मा कर पाने में विफल हो गए और मोदी का लगातार गुजरात में विकास देश मे मॉडल के रूप में पहचान बनाने लगा। इस खेल को देख नीतीश कुमार डर गए और 2012 के मध्य में 17 साल पुरानी राजनीतिक गठबंधन की दोस्ती बिखर गई। किसी प्रकार नीतीश कुमार कुर्सी बचाने में कामयाब रहे लेकिन 2005 से 2010 के बीच का शासन जैसा माहौल फिर से बिगड़ गया और कई घोटाले का जन्म भी हुआ और खूनी संघर्ष भी जारी हो गया। 2014 के लोकसभा में मोदी के मुकाबले नीतीश कुमार कुर्सी का चार पाया भी जीतकर लोकसभा भेजने में नाकामयाब हुए। नैतिकता का पाठ का परिचय देते हुए CM की कुर्सी को त्यागकर महादलित जीतन राम मांझी को CM बनाकर सोनिया गांधी की तरह डॉ मनमोहन सिंह जैसे सरकार चलाने लगे परन्तु महादलित नेता और अनुभवी होने की वजह से CM की कुर्सी को संविदा के बजाय स्थायी करने की जुगत में जइतना राम मांझी भीड़ गए। भाजपा के साथ मांझी की नजदीकियां बढ़ने लगी तो नीतीश कुमार ने आव देखा न ताव राजद के समर्थन से मांझी का कांट्रेक्ट को रद्द कर दिया। 2012 से 2015 के बीच बिहार फिर से 1990 वाले दौर में प्रवेश कर गया था पर बहुत कुछ पटरी से नीचे नहीं उतरा था। 2015 में नीतीश कुमार बनाम नरेंद्र मोदी के जंग में नीतीश कुमार ने लालू यादव सहित कांग्रेस के साथ महागठबंधन बनाकर सुशील कुमार मोदी जैसे विभीषण की पर्दे के पीछे की कूटनीति के कारण PM मोदी को हार का सामना करना पड़ा। PM मोदी से नीतीश कुमार को बेहतर उम्मीदवार कहने वाले सुशील कुमार मोदी के साथ नीतीश कुमार के बेहतर संबंध थे। DY CM तेजस्वी यादव के साथ बेहतर तालमेल नहीं कर पाने के कारण या फिर यहाँ भाजपा से भी ज्यादा खतरनाक राजनीति न हो जाये 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर RJD आयी और विलुप्त हो चुकी कांग्रेस भी 27 सीट जीतकर अपना खोया अस्तित्व को प्राप्त करने की दिशा में आगे बढ़ी के साथ खुद को असहज महशुस का राजनीतिक माहौल बनाकर नीतीश कुमार भाजपा की गोद मे बैठ गए। नीतीश कुमार में सदन में कहा था मिट्टी में मिल जाऊंगा पर BJP के साथ नहीं जाऊंगा। दूसरी तरफ BJP भी नीतीश कुमार के DNA पर सवाल उठाने लगी लेकिन 2017 में DNA को भुलाकर लोकतंत्र में मिले जनमत को ठुकराकर NDA में नीतीश कुमार शामिल हो गए। नतीजा यह निकला कि 2014 में 02 सीट पर MP भेजने वाला JDU 2019 के लोकसभा में 16 सीट पर जीत गयी लेकिन नीतीश कुमार का कद नरेंद्र मोदी के सामने बौना हो गया। समय समय पर नीतीश कुमार को भाजपा उनकी औकात बताती रहती है तो केंद्र का नेता नीतीश कुमार का पीठ थपथपा कर आगे बढ़ जाते हैं। जबकि दूसरी तरफ विकल्प के आभाव का नेता के रूप में भी नीतीश कुमार की ख्याति कायम है जैसा माहौल बन चुका है।
बिहार का विधानसभा चुनाव का शतरंज बिछना शुरू ही हुआ था कि वैश्विक महामारी कोरोना वायरस ने नेताओं की नींद उड़ा दी तो विषम वातावरण में नीतीश कुमार का कद बौना साबित हो रहा है कि वह लॉक डाउन में संसाधन विहीन के उपमा से खुद को सुशोभित करवा चुके हैं। नीतीश कुमार पहली बार खुद को असहाय महशुस कर रहे हैं क्योंकि बिहार में शराब बेचकर सर्वाधिक राजस्व हासिल करने का सिस्टम पर ही प्रतिबंध लगाकर अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मार चुके हैं जैसा महशुस कर रहे हैं जबकि शराबबंदी की वजह से नीतीश कुमार का समाजवाद लोगों के दिल मे स्थान रखता है। पत्रकार होने के नाते इस प्रयास को मैं भी सलाम करता हूँ लेकिन जिन IAS, IPS और BSS, BPS अधिकारी पर भरोसा करते हैं ने ही डस लिया है। जहर का प्रभाव किस हद तक बढ़ गया है इसका अवलोकन ही कर रहे थे कि जल जीवन हरियाली पर कोरोना वायरस ने पानी फेर कर एकबार फिर नरेंद्र मोदी को हीरो बन दिया है। केंद्र ने लॉक डाउन में प्रवासी मजदूर एवं छात्रों की घर (बिहार) वापसी का सिग्नल दिया पर नीतीश कुमार ने हाथ खड़ाकर खुद को कमजोर और लाचार नेता के रूप में प्रस्तुत किया। 80 सीट पर विजय प्राप्तकर 2015 में तेजस्वी विकल्प के रूप में 2020 में अथक परिश्रम कर रही है वहीं दूसरी ओर नीतीश कुमार को घेरने के लिए सवर्ण भी इसबार दो दो हाथ की तैयारी में जुटी है और नीतीश कुमार को गद्दी से हटाना का प्रयास में आगे बढ़ रही है। 15 साल बनाम 15 साल की सत्ता के खेल में जनता भी कुछ हैरतअंगेज रिजल्ट दे सकती है और कहीं 2015 के बयानबाजी का बदला भाजपा ने ले लिया तो फिर नीतीश कुमार कुर्सी कयमर की उपाधी से वंचित रह जाएंगे क्योंकि वह Dy CM का पद स्वीकार करने से बेहतर ……।
अंत करते हुए यह लिखना जरूरी है कि कई घोटाले का दाग जब सत्ता से बेदखल नीतीश कुमार होंगे तो शायद उस दाग को छुड़ा पाना आसान नहीं होगा और सृजन, मुजफ्फरपुर बालिका गृह कांड जैसे कितने मामले जब खुलने लगेंगे की करोड़ो लीटर शराब चूहे कैसे चट कर गए। कोरोना का कहर भले ही कुछ महीने बाद शांत हो जाये पर कोरोना का राजनीतिक वायरस से नीतीश कुमार का बचना मुश्किल भरा है और आरक्षण और दलित महादलित के खेल में घिरते दिख रहे हैं। कई मामले हैं कि कई IAS रंगतालिया मनाने विदेश गए लेकिन किस फंड से जैसे गंभीर मामले पर फिर कभी दृष्टिगोचर होगा। नीतीश कुमार की कुर्सी को कोरोना कोरेनटाईंन भी करवा सकती है और 14 दिन के वनवास वापसी के बाद ही कुछ कहना मुनासिब होगा पर कुर्सी खतरे में दिख रही है।
ब्रजेश मिश्र की तरफ से आज के लिए बस