कवि – कथाकार आशीष दसोत्तर

आशीष दसोत्तर
राजीव कुमार झा

प्रश्न .  आशीष जी आपने विविध विधाओं में लेखन करके साहित्य में अपनी पहचान कायम की है अपने लेखन के बारे में बताएं ? यह कब कहाँ और कैसे शुरू हुआ . साहित्य लेखन को आप किस सामाजिक संदर्भ में देखते रहे हैं ?
उत्तर- मेरे लेखन की शुरुआत बहुत कम उम्र से हो गई थी ।हालांकि परिवार में साहित्य के प्रति कोई विशेष लगाव नहीं था, फिर भी मेरे दादाजी सदैव इस बात के लिए प्रेरित किया करते थे कि किताबों को पढ़ो और पढ़कर उनके बारे में अपनी एक राय कायम करो। बस ,यहीं से लेखन- पठन के प्रति एक झुकाव सा हो गया मुझे याद है जब मैं कक्षा आठवीं में था यानी मेरी उम्र 12 वर्ष थी तब से मेरी लेखन यात्रा प्रारंभ हुई जो अब तक निरंतर जारी है। इस दौरान गद्य और पद्य की विभिन्न विधाओं में मैं लिखने की कोशिश करता रहा हूं। जहां तक समाज के प्रति दायित्व का सवाल है तो मुझे यह महसूस होता है कि जब तक हमारा लेखन आम जन जीवन से जुड़ा नहीं होगा या हम आम व्यक्ति के प्रति लेखन नहीं करेंगे तो अपने लेखकीय दायित्व को ईमानदारी से नहीं निभा पाएंगे। इसलिए मेरी कोशिश भी यही रहती है कि आम जनमानस की पीड़ा, उनके अभाव, उनके दुख-दर्द, और उनके सुख-दु:ख को अपने लेखन के जरिए साझा किया जाए।
प्रश्न- आप गीत लेखन के लिए सम्मानित कवि हैं . हिंदी में गीत लेखन की परंपरा पर प्रकाश डालिये।
उत्तर- हिंदी में लेखन की शुरुआत छंद बद्ध ही हुई, यानी गीत के रूप में या कविता के रूप में अभिव्यक्ति मुखर हुई ।इससे पहले श्रुति परंपरा के माध्यम से साहित्य एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचता रहा। गीत परंपरा हमारे यहां काफी समृद्ध रही। खासतौर से भक्ति काल तो इस मायने में समृद्ध रहा ही ,उसके बाद भी गीतों को साहित्य में प्रमुखता से स्थान मिलता रहा। यही कारण रहा कि यह विधा निरंतर पल्लवित होती रही और उसके बाद गीत के कई स्वरूप हमारे सामने आए। गीत के विधान को तोड़ा भी गया फिर जोड़ा भी गया। गीत से गीतिका, नवगीत आदि कई स्वरूप हमारे सामने आते रहे और गीत परंपरा इस तरह आगे बढ़ती रही।
प्रश्न- आपको हिन्दी में कौन कौन कवियों के गीत प्रिय हैं।
उत्तर – सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, महादेवी वर्मा, हरिवंश राय बच्चन ,जय कुमार जलज, गोपाल सिंह नेपाली।
प्रश्न- आपने व्यंग्य लेखन भी किया है . व्यंग्य की विधागत विशिष्टता को उजागर कीजिए।
उत्तर – सीधे-सीधे किसी भी बात को कहने के बजाय व्यंग्य शैली में कही गई बात अधिक मारक होती है और भीतर तक असर करती है। किसी भी विषय पर व्यंग्य शैली में कहना कठिन भी है और सरल भी। यह कहने वाले की क्षमता, उसकी परिकल्पना और उसकी शैली पर निर्भर करता है ।व्यंग्य की खासियत यही है कि यह कम शब्दों में व्यवस्था पर प्रहार करता है। यह किसी भी बात को इतनी आसानी से कह जाता है कि पढ़ने वाला उसे बार-बार नयेपन के साथ देखता एवं महसूस करता है।
प्रश्न- आप अपने प्रिय व्यंग्यकारों के बारे में बताएं।
उत्तर – हरिशंकर परसाई, शरद जोशी, श्रीलाल शुक्ल और वर्तमान में प्रेम जनमेजय, ज्ञान चतुर्वेदी आदि।
प्रश्न- आप पत्रकारिता में भी संलग्न रहे . हिंदी में पत्रकारीय लेखन की दशा और दिशा को रेखांकित कीजिए।
उत्तर – यह वर्तमान परिस्थितियों में बहुत प्रासंगिक प्रश्न है। पत्रकारिता किसी समय स्वतंत्रता प्राप्ति का एक महत्वपूर्ण माध्यम बनी थी और उस दौर के पत्रकारों ने देश को स्वाधीनता दिलाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। यही कारण है कि उस दौर के पत्रकार प्राय: साहित्यकार हुआ करते थे और जो साहित्यकार थे वे पत्रकारिता के माध्यम से अपनी अभिव्यक्ति को मुखरता प्रदान किया करते थे। लेकिन जैसे-जैसे समय बदलता गया पत्रकारिता में भी परिवर्तन आते गए ।
आज हम हिंदी पत्रकारिता की बात करें तो उसमें कई सारे परिवर्तन परिलक्षित होते हैं। आज हिंदी में पत्रकारीय लेखन की दशा और दिशा बहुत चिंतनीय है। भाषा को लेकर ,प्रस्तुति को लेकर और विषय वस्तु को लेकर पत्रकारिता में जो परिवर्तन हो रहे हैं उसने पाठकों को सोचने पर विवश कर दिया है ।आज पत्रकारिता मिशन नहीं है क्योंकि इसके सामने कोई लक्ष्य नहीं है ।एक महत्वपूर्ण कारण यह भी है कि आज के अखबार बड़े घरानों द्वारा संचालित हैं और उन घरानों के व्यावसायिक उद्देश्य आज की पत्रकारिता को प्रभावित कर रहे हैं। इसलिए पत्रकारिता को आज किसी सांचे में नहीं बांधा जा सकता। किसी स्पष्ट दृष्टि से भी उसे नहीं देखा जा सकता। निरंतर हो रहे बदलावों ने पत्रकारिता के स्तर और स्थिति दोनों में परिवर्तन किया है। इसे हमें समझना होगा।
प्रश्न- अपने बचपन घर परिवार शिक्षा और वर्तमान कार्य पेशे के बारे में बताएं।
उत्तर – मैं बहुत सामान्य परिवार से हूं। पिता रेलवे में सेवारत रहे। हम चार भाई भाई-बहन हैं ।मैं सबसे छोटा हूं ।
मेरी शिक्षा मध्यप्रदेश के रतलाम शहर में हुई। यहीं से मैंने भौतिक शास्त्र में एमएससी की डिग्री प्राप्त की। इसके बाद एलएलबी, बीएड, एल एल एम, बीजेएमसी, एम. ए. हिंदी सहित अन्य शिक्षा प्राप्त करने का सिलसिला भी जारी रहा।
मैंने पत्रकार के रूप में राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, दैनिक चेतना में रतलाम ,बीकानेर, जयपुर चंडीगढ़, देवास, इंदौर आदि स्थानों पर ब्यूरो चीफ एवं मुख्य संवाददाता के रूप में कार्य किया। आठ वर्षों तक पत्रकारिता के उपरांत मध्यप्रदेश शासन की सेवाओं से जुड़ा। जनसंपर्क विभाग में भी अपनी सेवाएं प्रदान की। वर्तमान में भौतिक शास्त्र के व्याख्याता के रूप में मैं रतलाम जिले के बाजना विकासखंड में पदस्थ हूं।
प्रश्न- मध्यप्रदेश के साहित्यिक परिवेश के बारे में बताएं।
उत्तर – मध्य प्रदेश का साहित्यिक वातावरण बहुत बेहतर है। हरिशंकर परसाई ,शरद जोशी, ज्ञान चतुर्वेदी इस भूमि पर साहित्य की अविरल धारा बह रही है। यहां से आवेग, कंक, वाम मित्र जैसी महत्वपूर्ण पत्रिकाएं भी प्रकाशित होती रही। प्रभाकर माचवे, श्री नरेश मेहता ,गोपाल सिंह नेपाली जैसे महत्वपूर्ण हस्ताक्षर इसी प्रदेश की शान रहे ।वर्तमान में भी नई पीढ़ी इस प्रदेश के नाम रोशन कर रही है।
प्रश्न- लेखन के अलावा और किन कार्यो में रुचि है।
उत्तर – लेखन के अलावा संगीत के प्रति मेरा रुझान है। कुछ एल्बम भी जारी हुए हैं। निरंतर संगीत की प्रस्तुति भी देता रहा हूं।
प्रश्न – सिनेमा से सबका जुड़ाव रहता है आपका भी लगाव रहा होगा . समाज मे सिनेमा अपनी सार्थकता को किस तरह प्रकट कर रहा है।
उत्तर – सिनेमा को लेकर मैंने काफी शोध परक लेख लिखे भी हैं। जो पश्यन्ती, ऊद्भावना और वसुधा के फिल्म विशेषांक में प्रकाशित हुए हैं।
मैं समझता हूं कि समाज में सिनेमा अपनी सार्थक उपस्थिति दर्ज कराता रहा है और आज भी करा रहा है। यह अलग बात है कि आज सिनेमा के माध्यम से कई सारी ऐसी चीजें भी प्रस्तुत की जा रही है जो हमारे समाज में अमान्य है लेकिन कई फिल्मों के माध्यम से समाज की बुराइयों को दूर करने, समाज की विषमताओं और समाज के ज्वलंत मुद्दों को सामने लाया जा रहा है जो आम जनमानस को जागरूक करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।