छत्तीसगढ के कवि रजत कृष्ण

कवि रजत कृष्ण
राजीव कुमार झा

01. कविता लेखन की शुरुआत स्कूली शिक्षा के दिनों में तब हुई जब एक बार अपने आँगन दो चिड़ियों को दाना चुगते और मस्ती करते देखा ! दरअसल मैं बचपन से ही चित्रकारी और मूर्ति कला में भी रुचि रखता था ,अतः यह दृश्य ” कितने अच्छे हैं पंछी ” शीर्षक से शब्दबद्ध हो गया …और इस तरह अवसर विशेष पर समय- समय में कविताएँ रचने लगा ,कालांतर में उम्र बढ़ने के साथ ही बाल कविता रचने से आगे बढ़ते हुए अन्यान्य विषय पर भी लिखने लगा !

02. शुरू-शुरू में सरिता ,मुक्ता जैसी पत्रिका में प्रकाशित कविताएँ प्रभावित करती थी और ऐसी एक -दो कविताएँ तब ‘सरिता ‘ में छपी भी ! लेकिन जल्द ही यह समझ आया कि मुझे ऐसी कविताओं से इतर लिखना है …और मैंने साहित्यिक पत्रिकाओं की ओर रुझान बढ़ाया !

03.कविता लेखन में मुझे अपना स्थानीय परिवेश,अपना गाँव-जनपद ,वहाँ के जन ,अपने परिजन ,अपने संगी -साथी ,खेत मे काम करती मेरी अपनी माँ ,बहनें , पिता और जनपद के श्रमशील अन्यान्य लोग ही जीवंत रूप में सदैव भाते हैं और यही मेरी कविता के असल चरित्र हैं !

04. हमारा परिवार किसानी परिवेश से नाभि-नाल जुड़ा हुआ है ! मेरी प्राथमिक शिक्षा धमतरी जनपद के छोटे से गाँव लिमतरा में हुई ! हांलाकि पिता जी टेलीफोन विभाग में ऑपरेटर थे ,लेकिन वह नियमित रूप से खेती भी करते थे और मेरी माँ तो अब भी (70 की उम्र में ) खेती करती हैं ! मेरी बहने -दीदी भी खेतिहारिन हैं जो छत्तीसगढ़ के अलग-अलग जनपद में किसानिन कि भूमिका निभाते हुए श्रमरत हैं ! यहां पिता के बाद अब खेती का काम बड़े भैया और भाई करते हैं !

05. मेरे प्रिय कवि -लेखक तो कई हैं , जिनके नाम गिना पाना संभव नही है , लेकिन मुझे सादतपुर,दिल्ली के विष्णुचन्द्र शर्मा जी से लेकर जोधपुर के सत्यनारायण ,जयपुर के राजाराम भादू , छत्तीसगढ़ के एकांत श्रीवास्तव ,नासिर अहमद सिकन्दर ,शरद कोकाश ,कमलेश्वर साहू,भास्कर चौधुरी, सूरज प्रकाश , संजीव बक्शी,विजय सिंह सहित कई महत्वपूर्ण नाम याद रहते हैं सदैव ,जिन्हीने अपनी स्नेहिलता और साहित्यिक संस्कार व सरोकारों से मुझे प्रभावित किया है ! ऐसे और भी बहुत से हम उम्र रचनाकार साथी हैं जिनकी सूची लंबी है !

06. अपनी शिक्षा की बात करूँ …तो मेरी प्राथमिक शिक्षा छत्तीसगढ़ के धमतरी जनपद के लिमतरा गाँव मे हुई , फिर मिडिल से लेकर स्नातक तक की पढ़ाई बागबाहरा जनपद में हुई !
स्नातक की पढ़ाई के बाद स्वास्थय संबधी दिक्कतों की वजह से निययमित शिक्षा मुझे 14 साल तक रोकनी पड़ी ….! लेकिन इस दौरान मैंने घर मे रह कर साहित्यिक पत्रिकाएं पढ़ना , अखबारों के लिए समय-समय पर कविताएँ लिखना धीर-मन्थर ढंग से जारी रखा ! फिर 2004 में विपरीत हालात में भी साहित्यिक अग्रजों राजा राम भादू,सत्यनारायण ,एकांत श्रीवास्तव, विजय सिंह,नासिर अहमद सिंकदर आदि के प्रोत्साहन भरे पत्रों , फोन-संवाद से प्रेरित होकर 14 साल के अंतराल पश्चात महाविद्यालय की अपनी रुकी पढ़ाई पुनः आगे बढ़ाते हुए हिंदी साहित्य में एम.ए. और फिर पी-एच.डी.की साथ ही सेट की पात्रता परीक्ष उत्तीर्ण की !
हमारा घर-परिवार पूर्णतःकिसानी परिवेश वाला है ,अतः खेत-खार, मजदूर ,धान …गाय-बैल से जुड़े दृश्य-प्रसंग उभर कर आते गए ! अड़ोसी-पड़ोसी ,नाते-रिश्तेदार यह सभी मेरी कविता में सहज आते हैं ,क्योंकि हमारा पूरा परिवेश जनपदीय राग-रंगों से अब भी सराबोर है ! छोटी-छोटी पहाड़ियां ,दूर-दूर तक फैले जंगल , तेंदू , महुआ, चिरौंजी सहित कई वनोपज और बीड़ी पत्ते इधर के बड़ी आबादी की आजीविका के साधन है !
बदली परिस्थित में अब यहाँ जंगली जानवरों के लिए संकट बढ़ता जा रहा है ! आबादी का दबाव बढ़ने के साथ ही ,जंगली हाथी , भालू, बन्दर सहित कई जंगली जानवर आबादी तक पहुंचने लगे हैं ,जिससे जन-.जीवन असुरक्षा भाव से भरकर जीने को मजबूर हैं !
जहां तक लघु पत्रिकाओं के योगदान की बात है ,तो आज का बेहतर साहित्य लघु पत्रिकाओं के माध्यम से ही सामने आ रहा है ! हमारे समय का बेहतर साहित्य लघु पत्रिकाओं के माध्यम से देश के विभिन्न अंचलों में में पहुंचता है ! लघु पत्रिकाएँ न होती तो पिपरिया, चन्दौसी, कांकरोली, बागबाहरा, जैसे छोटे-छोटे जनपदों से आज जो कई पत्रिकाएँ निकल रही हैं वे शायद ही नजर आती!

07.छतीसगढ़ को मुक्तिबोध के नाम से पहचाना जाता है ,यह गर्व का विषय है ! यहां पदुम लाल पुन्नालाल बक्शी , मुकुटधर पांडे , श्रीकांत वर्मा जैसे साहित्यकारों के साथ ही कबीर के शिष्य सन्त धर्म दास, सतनाम पंथ के प्रवर्तक गुरु घासी दास और मुक्तिबोध की कर्मस्थली के नाते यह हमारे लिए गौरव की भूमि है ! साथ ही हम तीजन बाई की पण्डवानी , महान रंगकर्मी हबीब तनवीर और हिंदी सिनेमा के एक विशिष्ट नायक किशोर साहू की जन्म भूमि होने का गर्व भी हमें सदैव प्रेरित करता है ,बेहतर करने को !

08.राज्य की नक्सली समस्या से जूझने का जो सवाल है ,तो इसके कारणों को ऊपरी व सतही तौर पर व्यक्त नही किया जा सकता ! यह एक राजनीतिक और जटिल पेचिदगियों भरा संवेदनशील सवाल है ,जिसका जवाब देना यहाँ मेरे लिए संभव नही है ! राजनीतिज्ञ और सामाजिक संघर्ष से जुड़े लोग ही इसे बेहतर बता सकते हैं !

09 . मेरी दृष्टि में पिछले डेढ़- दो दशकों की हिंदी कविता लेखन की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि जो जन ,जनपद और उनके सामाजिक -सांस्कृतिक सरोकार को कविता के जनपद से तथाकथित क्रांतिकारिता भाव और भाषाई शुद्धतावाद के मारे सुनियोजित ढंग से हकाल दी जाने लगी थी ,उसे पुनर्स्थापित करने का उद्यम तेज हुआ ।इस क्रम में देशज राग-रंग और चरित्र बहुलता भी नए धज में सामने आता गया ! इस दौर में जो कवि परिदृश्य में उभरे उनका विकास अपने जातीय राग-रंग और पारिवारिक नाते – रिश्ते को सहेजने -संभालने में सन्नद्ध देखना दरअसल अपनी समृद्ध परंपरा को ही पुष्ट होते देखना है!

10. वर्र्तमान में हिंदी कविता लेखन में जो पीढ़ी सामने आ रही है ,उनको अपनी परंपरा से दो बातें अवश्य सीखनी चाहिए , एक तो यह कि सदैव अपनी जड़ और जमीन से जुड़ करके ही हम रचनारत रहें ! दूसरी यह कि हम सिर्फ लिखत भर के कवि न हों ,बल्कि अपने विचार,व्यवहार और सरोकार के स्तर पर जीयत के भी कवि हम बने , यानी हमारी कथनी-करनी में अंतर ना हो !
हमारे जो पुरखे कवि बड़े , जनोन्मुखी व जन प्रिय देश- समाज के लिए हो सके ,उन्होंने अपनी लकीरें सदैव लंबी रखी ! हमे उसे याद रखना चाहिए हर हाल में !

11.समाज के वर्तमान संकटों के बीच भक्ति काल के कबीर ,तुलसी ,जायसी , रहीम सहित आधुनिक काल के मुक्तिबोध , केदार नाथ अग्रवाल ,त्रिलोचन आदि से हमें यही प्रेरणा लेनी चाहिए कि हम जब तक अपनी जडों की गहराई , तनों के विस्तार,भावों की सहजता और दृष्टि की व्यापकता को साध नही लेते ,तब तक अपनी कविता को काल अनुरूप प्रासंगिक भी नही बना सकते ! दरअसल प्रासंगिकता समय सापेक्ष होती है ! जाहिर है किसी भी कवि की उम्र उसके कविता के होने की अवस्थिति पर निर्भर करता है ! अंततः यही कहा जा सकता है कि हमारे यह पुरखे कवि चूंकि जीवन और उसकी समस्याओं से नाभिनाल जुड़े रहकर सदैव संवादोन्मुखी बने रहे और देश-.काल के अनुरूप संघर्षरत रहे , अतः भविष्य में भी यही हमारे आदर्श रहेंगे !