कवयित्री लता सिन्हा ‘ ज्योतिर्मय ‘

कवयित्री लता सिन्हा ‘ ज्योतिर्मय ‘
राजीव कुमार झा

1 . लता जी आप कवयित्री हैं आप कला के रूप में कविता की विधात्मक विशिष्टता के बारे में बताएँ .

उत्तर-काव्य लेखन की विधा मानव हृदय के अंदर स्वतः ही प्रस्फुटित होती है। केवल कवि ही नहीं अपितु कला प्राकृतिक रूप से प्रत्येक मनुष्य के अंतःकरण में पूर्व से ही समाहित रहती है, बस हमें उस विधा का भान होने भर की देर है, उसका भान होते ही हमारी कलात्मक क्षमता पंख फैलाए गगन की ऊँचाइयों को छूने हेतु तत्पर होने लगती है। हां, यह बात भी उचित है कि परिवेश और परिस्थितियां हमारी लेखन शैली को प्रेरित करती है। वही भाव व्यक्तिगत रूप से कवि की शैली का परिचायक बन जाता है..!
कला के विभिन्न आयामों के अंतर्गत काव्य लेखन का अपना ही एक विशिष्ट स्थान है। जहाँ हमारे समाज में नाट्य कला, नृत्‍य कला और चित्र कला को आंतरिक एवं वाह्य मनोरंजन का स्थान प्राप्त है, वहीं काव्य कला का स्थान चेतना की जागृति हेतु विशेष है क्योंकि इसमें, श्रवण मात्र से अंतःकरण तक झकझोर देने की शक्ति समाहित रहती है। कविता केवल मनोरंजन का साधन नहीं अपितु ज्ञान का वह दीपक है जिसके प्रकाश से संपूर्ण जीवन आभावान हो उठता है। केवल एक कविता बाल-मन के विकास का आधार भी साबित हो सकती है और संपूर्ण जनसमूह की मार्गदर्शिका भी..! मुझे अच्छी तरह स्मरण है, मैंने आठंवें वर्ग के पाठ्य पुस्तक में एक कविता पढ़ी थी, संभवतः वही कविता मेरी माँ ने भी पढ़ी हो..!  माँ हमेशा संस्कारों के पाठ पढ़ाते समय वह पंक्तियाँ बार-बार याद दिलाया करती, जिससे मेरे कोमल मन पर उस कविता का व्यापक प्रभाव स्थापित हो जाए।
वह कविता थी कविवर मैथिली शरण गुप्त की :-
‘यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो न निराश करो मन को’
आप देखें कि, इन चार पंक्तियों में ही सामान्य जीवन से संघर्षों की शक्ति छिपी मिलेगी।
केवल कला ही सामान्य मानव का समन्वय सत्यम् शिवम् सुन्दरम् से स्थापित करती है। साहित्य में काव्य का क्षेत्र असीमित है।
ब्रह्म की उर्जा का संचार है काव्य,
आत्मिक चेतना का उद्गार है काव्य…!
तभी तो यह पंक्ति भी सार्थक होती है कि,
“साहित्य संगीत कला विहिनः
साक्षात् पशुः पुच्छ विषाणहीनः”
हृदय की गहराई से निकली हुई अनुभूतियाँ जब कलात्मक रूप धारण करती हैं तो कलाकार स्वयं से परे होकर संपूर्ण विश्व का पक्षधर बन जाता है। यही तो खूबी है काव्य में समाहित कलाओं के रहस्य की..!

2. कविता लेखन की तरफ कायम होने वाले रुझान को याद करते हुए अपने बचपन, घर परिवार और पढ़ाई लिखायी के बारे में बताएँ?

उत्तर:- मुझे बचपन से तुकबंदी का बड़ा शौक था। छोटी छोटी बातों के जवाब में उत्तर देते हुए बातों को तुकांत तक ले जाती थी। परन्तु लेखन में दूर-दूर तक मेरी अभिरुचि नहीं रही थी। हाँ, घर में उपलब्ध पत्रिकाएँ तो पढ़ती थी परन्तु मुख्य रूप से मेरे नानाजी की आलमारी में भरपूर संख्या में उपलब्ध कल्याण की पत्रिकाएँ मुझे बहुत आकर्षित करती थीं। कल्याण के प्रत्येक पृष्ठ पर उद्धृत मनोरम तस्वीरें तो मानों कल्पना लोक से होते हुए मुझे श्रीहरि के काल तक की यात्रा करा दिया करती थीं, संभवतः यहीं से मेरी काल्पनिक शक्ति को बल मिला हो…!
घर में जहाँ एक तरफ पिताजी की छत्र छाया में सैनिकों सा भाव था तो दूसरी तरफ माँ के स्नेह के मध्य अध्यात्म के गूढ़ रहस्यों का समावेश..! श्रीराम ,कृष्ण, महादेव एवं हनुमान जी तो सदैव मेरे बालमन को अपने घर के वरिष्ठ सदस्यों की भांति प्रतीत होते थे। इन्हीं परिवश ने मेरी लेखनी को भी प्रभावित किया है। आज मैं जब ओज और आध्यात्म का संगम रचती हूँ तो मुझे मिलने वाले शब्दों का प्रवाह एक तरफ देश के वीर सपूतों की गरिमामयी उपस्थिति तो दूसरी तरफ हमारे अध्यात्मिक ग्रंथों से स्वतः ही मिलते प्रतीत होते हैं। मैं हिन्दी की छात्रा नहीं हूँ, अतः मेरी रचनाओं में आपको आज के हिन्दी साहित्य के शोधकर्ताओं की सी उत्कृष्ट शैली का अभाव मिलेगा, मेरी कविताएँ मेरे भावों की अभिव्यक्ति मात्र हैं।
जहां तक सवाल है मेरे लेखन के प्रति अभिरुचि की…एक दिन मेरा बेटा, (जो इन दिनों पुणे में एक अमरिकी कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर है) उसने मुझे यह याद दिलाने की कोशिश की कि “आपके पिताजी को आपसे बहुत उम्मीदें थीं, और आप सब कुछ भुलाकर केवल रोटियाँ सेंक रही हैं.!” उस दिन शिवम ज्योतिर्मय ने मेरे ज्ञान का वह दरवाजा खोल दिया था, जिसे मैं छोटी उम्र में विवाह के उपरांत बंद कर चुकी थी, बस उसी दिन मैंने निर्णय ले लिया कि मैं अपने माता-पिता के सपने को अवश्य साकार करूंगी, और अपने पुत्र को ही गुरु मानकर मैंने उसके नाम को अपने उपनाम स्वरूप धारण करके उसी दिन कलम उठा चुकी थी। अत्यधिक संकोच और संदेह में घिरकर पहली कविता लिखी थी….‘लाचार बचपन’

‘दारिद्रर्य की महामारी में वह
अपनी किस्मत कूट रही थी
माँ की ममता भी विकृत हो
संतान का बचपन लूट रही थी।’

2011 ई० से ही मैं हिन्दी साहित्य से जुड़ती चली गई। अब तक मेरे दो काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। मेरा प्रथम काव्य संग्रह ‘मेरा-अंतर्मन’ 2016 ई० तथा द्वितीय काव्य संग्रह-‘अब शैय्या-शेष की त्याग’ 2019 ई० में प्रकाशित हो चुका है।
‘मेरा अंतर्मन’ में मैंने जीवजगत के उन जड़ व चेतन की पीड़ा लिखी है जो अपनी व्यथा कह पाने में असमर्थ हैं। यह पुस्तक मैंने माता-पिता के श्रीचरणों में सादर समर्पित किया है।
दूसरा संग्रह ‘अब शैय्या-शेष की त्याग’ में मैंने मानव की आत्मिक क्षमता को धिक्कारा ही नहीं ललकारा भी है, साथ ही साक्षात श्रीहरि से इन विषम परिस्थितियों से जग को उबारने हेतु आदेशात्मक आह्वान भी किया है।

3. आपने जिन लेखकों की किताबों को पढ़ा और पसंद किया उनके साहित्य के बारे में अपने विचारों को प्रकट करें

उत्तर:- हिन्दी साहित्य से मेरा संपर्क पिछले नौ वर्षों से है। महादेवी वर्मा और सुभद्रा कुमारी चौहान की मर्म युक्त भावपूर्ण रचनाओं ने सदैव मेरी संवेदनाओं को प्रभावित किया है, वह चाहे गद्य में हो अथवा पद्य में। छायावाद की एक सुदृढ स्तम्भ महादेवी वर्मा की रचनाओं से मैं इसलिए अधिक प्रभावित हुई क्योंकि मुझे मेरे भावों के अनुकूल उनकी रचनाएँ लग रही थी। मुझे उनकी कृतियों में असीम पीड़ा तो दिखी परन्तु विषाद का वह दृश्य नहीं दिखा जिससे पाठक शोकाकुल हो उठे। यही आकर्षण रहने के कारण संभवतः मेरे प्रथम काव्य संग्रह ,‘मेरा अंतर्मन’ को हिन्दी साहित्य परिषद खगड़िया द्वारा 2018 ई० में महादेवी वर्मा सम्मान से अलंकृत किया गया। यह अलंकरण मेरे लिए बिन मांगे मिली मोतियों से कम नहीं रहा।
ओजस्वी व्यक्तित्व के स्वामी राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की गरिमामयी आभा से शायद ही ऐसा कोई हो जो प्रभावित नहीं हुआ हो..! वो हमारे बिहार का गौरव हैं। उनकी विशेष रचनाओं में से एक ‘रश्मिरथी’ ने तो मेरी लेखनी को हर बार नयी उर्जा प्रदान की है। वीर रस से सराबोर उनकी ओजपूर्ण कविताओं की ललकार ने मेरे अंदर आंदोलन के से भाव उत्पन्न किए हैं।
रश्मिरथी:-
‘तेजस्वी सम्मान खोजते नहीं गोत्र बतला के,
पाते हैं जग में प्रशस्ति अपना करतब दिखला के।

हीन मूल की ओर देख जग गलत कहे या ठीक,
वीर खींच कर ही रहते हैं इतिहासों में लीक।
@दिनकर

राष्ट्रीय चेतना की एक सजग कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान की कविताएं ही नहीं उनकी सैनानियों सी वृत्ति ने मेरी आत्मिक अभिलाषा को हर्षित किया है। उनकी रचना ‘झांसी की रानी’ ने उन्हें काव्य जगत में निश्चय ही प्रसिद्धि दिलाई हो परन्तु उनकी प्रत्येक रचनाएँ विशेष हैं। प्रचंड दुखों की व्याख्या करती उनकी कविताओं ने हृदय में अकुलाहट नहीं बल्कि उद्वेलित करती हुई संवेदनाएँ प्रेषित की हैं।
‘जांलियावाला बाग’

“यहाँ कोकिला नहीं, काग हैं, शोर मचाते,
काले काले कीट,भ्रमर का भ्रम उपजाते।

कलियाँ भी अधखिली, मिली हैं कंटक-कुल से,
वे पौधे, व पुष्प शुष्क हैं अथवा झुलसे।

परिमल-हीन पराग दाग सा बना पड़ा है,
हा! यह प्यारा बाग खून से सना पड़ा है।”
@सुभद्रा कुमारी चौहान

स्वतंत्रता संग्राम में सुभद्रा कुमारी चौहान की सहभागिता सदैव मेरे मनोभाव को संबोधित करती हैं, मेरी एक कविता मेरे इसी लालसा पर आधारित है..
‘कलम के सिपाही’
“बड़ी थी ललक करूं देश की
सेवा निरंतर हो लगन
एक सैन्य पुत्री हो के भी
थामा है शस्त्रों में कलम

भले प्राण छोड़े देह लेकिन
प्रण कभी होगा न भंग
लेकर कलम सा शस्त्र,
हो निष्पक्षता लेखन के संग”

4) आज का साहित्यिक परिवेश आपको कैसा लगता है.?

उत्तर:-  साहित्य में प्रतिस्पर्धा तो बहुत अच्छी बात है परन्तु ख्याति हेतु मार्ग को सुगम बना लेने का प्रयास साहित्य की गरिमा को धूमिल करता है। इसलिए मैं आज के साहित्यिक परिवेश को शंका की दृष्टि से देखती हूँ। मुझे कहने में गुरेज़ नहीं कि आज की साहित्यिक पृष्ठभूमि पर कवि और कवियित्रियों में भेद सिद्ध किया जा रहा है। जहाँ केवल लेखनी परिचायक होनी थी वहाँ लेखनी की जगह किसी और ही दृष्टिकोण से रचनाओं की क्षमता आंकी जा रही है। मैं मानती हूँ कि आज दिग्गज साहित्यकारों में सब एक से बढ़कर एक हैं परन्तु कहीं कुछ तो त्रुटि हुई है, जो आज भी इनमें से कोई दिनकर, प्रेमचंद, निराला, महादेवी वर्मा, सूर एवं तुलसी तुल्य होने की शक्ति नहीं जुटा पा रहे। मैं आज के परिवेश के लेखन पर कदापि उंगली नहीं उठा रही, बस इतना ही कहना चाहती हूँ कि शब्दों की संपन्नता ने भावनाओं के रस छीन लिए हैं और संवेदनशील भावों का स्पंदन ही काव्य की आत्मा है, तो यूं कहें पिछली कुछ सदी की तुलना में आज के परिवेश का साहित्य थोड़ा कुपोषित है, निःसंदेह ही साहित्य की धरती अब भी सूर-तुलसी, प्रेमचंद और दिनकर जैसे सूर्य के पुनः आगमन की बाट जोह रही है।

 5 . आप रेडियो उद्घोषिका हैं, जन माध्यम के रूप में रेडियो की प्रासंगिकता के बारे में बताएँ ?

उत्तर:- आकाशवाणी हमारे संचार माध्यम का सबसे प्रथम साधन रहा था। इसकी उपयोगिता ग्रामीणों एवं कारीगरों के लिए विशेष है, जहाँ रेडियो बिना अवरोध के मनोरंजन और आवश्यक सूचनाएं सुगमता से संचारित करता है।

 6 लेखन के अलावा आपकी अन्य अभिरुचियाँ क्या हैं ?

उत्तर:- लगभग प्रत्येक कलात्मक कार्य में मेरी बचपन से अभिरुचि रही है। स्कूल के समय से ही मैं मंचों पर अभिनय, भाव नृत्य, गीत संगीत आदि में सक्रिय रही। मैंने अपने प्रथम पुस्तक की प्रत्येक कविताओं के लिए पेंसिल से रेखाचित्र खींचे हैं, साथ ही अपने दोनों पुस्तकों के आवरण भी स्वयं बनाए हैं। विभिन्न कलाओं में से चित्रकला, पाक कला, विभिन्न प्रकार के परिधानों का निर्माण, कई तरह के क्राफ्ट वर्क, बागवानी इत्यादि में मेरी विशेष दिलचस्पी हमेशा से रही है। प्रकृति से मुझे बहुत प्रेम है। मैं तो क्यारियों व गमलों में लगे पौधों से बातें करती हूँ। सच मानिए आप पेड़ पौधों के जितने करीब जाएंगे आपको उनके जीवंतता की उतनी ही अनुभूतियाँ होंगी ।

 7  समाज में नारी जीवन की बदलते संदर्भों को किस रूप में देखती हैं ?

उत्तर:- हमारे समाज में आदिकाल से नारी शक्ति स्वरूपा रहीं हैं। अतः मेरे दृष्टिकोण में नारी को बेचारी साबित करने का श्रेय कहीं न कहीं पुरुष समाज को ही जाता है। हमारा देश तो आदिशक्ति की अराधना करता है, फिर किसने यह भाव संपूर्ण नारी के हृदय में थोप दिए हैं कि तुम अबला और पराधीन हो.! निश्चय ही यह घोर चिंतन का विषय है। पूरी की पूरी आधी आबादी को एक षड्यंत्र के तहत हासिए पर लाकर रख दिया गया है। मैं कदापि सहमत नहीं हूँ कि आखिर जो नारी एक परिवार की रीढ़ होती है वह कमजोर कैसे हो सकती..! मेरी समझ में नारी को पूरे आत्मविश्वास के साथ अपने भीतर ही अपने अस्तित्व को ढूंढने की आवश्यकता है।
मेरी एक कविता इसी विषय पर आधारित है।
‘मैं आज के युग की नारी हूँ’
हाथों में चूड़ी खनकाई,
पैरों में पायल पहन लिया
पर चूड़ी को कभी कमजोरी
न पायल बेड़ी बनने दिया
जीवन में एक लक्ष्य लिए
पुरुषों के बराबर जा बैठी
निर्भय हो बढ़ती ही रही
नारीत्व पे आंच न आने दिया
निर्णय लेने की है क्षमता
पर आंचल में रहती ममता
यही स्नेह सम्मान लिए
अपने परिवार की प्यारी हूँ
मैं आज के युग की नारी हूँ
‘ज्योतिर्मय’

धन्यवाद?
लता सिन्हा ज्योतिर्मय
मुजफ्फरपुर, बिहार