जा रहे मजदूर, कोई तो रोको!

सुशील देव
राम भरोसे ने सपना देखा कि-उसके गांव में हर तरफ चीख-पुकार मची हुई है। लोग इधर-उधर भाग रहे हैं। हल्ला हो गया है कि वेश बदलकर यमराज उसकी काकी से पूछ रहा है कि-‘राम भरोसे कब घर आएगा?’ वह अचानक उठकर बैठ गया और सोचने लगा, ‘सचमुच पूरी दुनिया में आफत आ चुकी है। वरना, दुनिया के हर कोने से रोज मरने और सिर्फ मरने की खबर नहीं आती। इस भारी विपदा में कोसों मील अपने परिवार से दूर रहना उचित नहीं है। अच्छा है कि मैं भी यहां से निकल ही लूं। मेरी मां बीमार है, इसी साल छोटी बहन के हाथ भी पीले करने हैं। पिछली बरसात में भी घर का छप्पर ठीक नहीं करा पाया था…स्कूल में पढ़ने वाले घर के सारे बच्चों की परवरिश का एकलौता कामासुत हूं। समय पर उनके काम न आया तो हजार-पंद्रह सौ किलोमीटर दूर की मेरी नौकरी-चाकरी का भी क्या मतलब रह जाएगा? सो, एकबार तो गांव जाना ही चाहिए, मैं गांव जाउंगा…अवश्य जाउंगा।’

कोरोना वायरस के तेजी से फैलते संक्रमण के कहर से उसका दिल बैठता जा रहा था। पता नहीं यह महामारी और कितना भयंकर रूप ले लेगी। सभी जगहों की सरकार खामोश हैं। सड़कें सूनी पड़ गई हैं। कल-कारखाने वीरान हो गए हैं। संकट के घोर बादल छाते जा रहे हैं। कोई किसी की मदद के लिए तैयार नहीं। ऐसे में हर किसी का जीवन दाव पर लग गया है। राम भरोसे ने यह चर्चा एक के बाद एक से की, दूसरे ने तीसरे से की…और यह डर आग की तरह फैल गई। जिनकी फैक्ट्रियों में वो कल तक बेहद प्यारे थे आज उन्हें किसी तरह की सुविधा तो दूर, उनके हक की मेहताना भी देने से इंकार किया जा रहा है। धीरे-धीरे परिस्थितियां विकट होती गईं। दूसरे लाॅकडाउन तक पूरे देश में काम करने वाले हर मजदूर-कामगारों के बीच चिंता व तनाव की लहर दौड़ पड़ी कि ‘अगर उनके पास पैसे नहीं रहेंगे, तो क्या होगा? सरकार ने भी हाथ उठा दिए तो क्या होगा? बीमार पड़ गए या कोरोना हो गया तो फिर बचाने वाला कौन होगा? सुना है, मौत के बाद यहां लाश भी लावारिश हो जाती है। इसलिए अच्छा होगा कि-हमें गांव ही निकल जाना चाहिए। फिर तो एक के बाद एक मजदूर, जैसे-तैसे अपने गांव जाने के लिए सड़कों पर निकल पड़े। सरकार ने कहा, ‘जान है तो जहान है, इसलिए आप अपने घरों में ही रहें।’ मगर प्रवासी मजदूरों ने सोचा कि-‘जाना है तो जाना है। यहां बेमौत मरने से अच्छा है कि अपने परिवार के बीच रहकर दुख या विपदा में मर जाउं। वैसे भी सरकार की लचर व्यवस्था के कारण कोरोना से पहले, हम भूख से ही मर जाएंगे।

सरकार को भी इस बात का अनुमान नहीं था कि महानगरों से प्रवासी मजदूरों का इस कदर पलायन हो जाएगा। हालांकि राज्य और केंद्र सरकार ने उन्हें कई प्रकार की सुविधाएं प्रदान करने की कोशिश भी कीं, मगर जिसने एकबार ठान लिया कि उन्हें हर हाल में गांव जाना ही है तो क्या पैदल, क्या साइकिल, क्या रिक्शा-ठेला, वो मीलों की दूरी तय करने के लिए अपने पांवों पर ही निकल पड़े, ‘अब पांवों में छाले पड़े, कांटे या कंकड़-पत्थर चुभे, इसकी परवाह नहीं। मजदूर के बच्चे हैं सब कुछ सहन कर लेंगे, मगर मेरी आस में राह तकते अपने बूढ़े मां-बाप को निराश नहीं करेंगे। यह संकल्प लेकर लाखों की भीड़ सड़कों पर जब उतरी तो सरकार के भी सिर चकरा गए। मजदूरों का पलायन लगातार जारी है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड, राजस्थान, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल और ओड़िशा आदि के ज्यादातर मजदूर कोरोना संकट के इस दौर में लगातार अपने गांव वापस जा रहे हैं। देश की राजधानी दिल्ली, आर्थिक राजधानी मुंबई, हैदराबाद, बंगलुरू, विशाखापत्तनम, अहमदाबाद, पंजाब, हरियाणा जैसे दर्जनों महानगर खाली हो रहे हैं। वहां के उद्योग-धंधे चैपट हो रहे हैं। देश की आर्थिक विकास का पहिया थम गया है। जिन मजदूरों और कामगारों की वजह से हम आर्थिक प्रगति का गर्व से नगाड़ा पीटते थे, वह खुशी काफूर हो गई है और हम उन्हें राजनीतिक ट्रेनों या बसों में ठूंसकर, सड़कों पर पैदल निर्बाध जाते हुए केवल देख रहे हैं।