कवि अमर बानियाँ लोहोरो, सिक्किम से ली गई अन्तर्वार्ता की प्रस्तुति:-

 हिंदी भारत की सिर्फ राजभाषा ही नहीं है बल्कि यह भारत के लोगों की संपर्क भाषा भी है . वर्तमान समय में हिंदी साहित्य लेखन में देश के सभी राज्यों के हिंदी के लेखक विद्वान संलग्न हैं . सिक्किम की राजधानी गंगतोक के पास एक गाँव में निवास करने वाले कवि अमर बानियाँ ‘ लोहोरो ‘ की कविताओं में मानवतावादी विचारों का समावेश है . प्रस्तुत है इनसे राजीव कुमार झा की बातचीत . . .वरिष्ठ लेखक/सम्पादक
राजीव कुमार झा जी द्वारा कवि अमर बानियाँ लोहोरो, सिक्किम से ली गई अन्तर्वार्ता की प्रस्तुति:-

1, प्रश्न- लेखन से आपका लगाव कब और कैसे क़ायम हुआ?

उत्तर- सर् देखिये कविता लेखन से यानि कि कविता से लगाव की कोई तथ्य परक तारीख़ तो नहीं बता पाऊँगा पर पीछे उस धूमिल अतीत की और मुड़कर देखता हूँ तो पता लगता है कि क़रीब 7/10 वर्ष की उम्र से ही लगाव रहा स्पष्ट नज़र आ रहा है… उस उम्र में हम दूसरी श्रेणी में पढ़ा करते थे तब हमें हमारे नेपाली मातृभाषा के कवि डाॅ पारसमणि प्रधान की लिखीं कविताएँ पढाई जाती थी उस दौर हमें दूसरे दिन ही याद कर सुनानी होती थी, और हम जब भी सुना पाते थे, बदौलत मास्टर जी कहा करते थे ए! अमर तुम्हें इन सब के कान खींचने होंगे जो पाठ के प्रति गंभीर नहीं हैं…फिर मैं गुरु की आज्ञा पालन कर उठ ‘ब्लैक बोर्ड’ के सामने खड़े सबका कान खींचा करता था पर मास्टर जी को ये बातें पता चलती थीं कि हम कुछ बढ़े सहपाठियों से डर के मारे और कुछ साथियों से करीबी सम्बन्धितों के चलते हल्के से खींच रहा हूँ, तो फिर मास्टर जी अकड़ते हुये मेरे ही कान खींचकर सिखाते थे हाँ ऐसे अब पता चला…तब मैं भी पीड़ा के कारण उन खड़े सहपाठियों के कान को काफी जोर से खींचकर दुखाता था… अब पता चल रहा है कि उसी समय से मेरे ह्रदय में कविता-प्रेम अंकुरित होने लगे थे !
…लेकिन सन 1985 तक लिखीं कविताएँ (काॅपी) मेरी जिंदगी के सफर में न जाने कहाँ खो गयी…उस दु:ख की वजह से हमने तीन साल तक दूसरी (काॅपी) का जुगाड़ नही किया! फिर कुछ वर्ष बाद एक दिन दिल बहुत ही दहल उठा…बस उसी वक्त तय किया कि कल सुबह यानि 23 जनवरी, 1988 को पुनः लिखना शुरू करूंगा और वैसे ही किया भी…बदौलत मेरी पहली नेपाली मातृभा की काव्य कृति ‘भाव-धन’ की पाण्डुलिपि हालाँकि 2000 में ही छापने के लिए तैयारी में थी किन्तु विभिन्न कठिनाईयों के चलते पूरे पाँच साल बाद यानि कि 2005 में आकर किसी तरह से छप पाई…ये सारी बातें मेरी प्रथम काव्यकृति भावधन में दी गई हैं! जबकि मेरी फुटकर रचनाओं में से ‘आमा’ अतः मा कविता 1989 में ही छप चुकी थी । शुभम् अमर बानियाँ लोहोरो
 2, प्रश्न- अपने बचपन, घर परिवार और पढ़ाई लिखाई के बारे में बताएँ ?

उत्तर- मेरा बचपन मेरी जन्म और कर्मभूमि हमारी हरित पहाड़ी प्रदेश सिक्किम के विभिन्न घाटियों के बीच अभाव तथा कठिनाई से होते हुये गुज्रा चूँकि इसकी कहानी कुछ अनोखी और लम्बी है जो यहाँ बयां करना अनिवार्य नहीं समझता हूँ…इसी बीच जब मैं 14/15 वर्ष का था तब की बात है मेरे पिताजी भेड़ों के लिए दरख्त से घांस काटकर बुचड़ी में ले

 

जाकर बेचा करते थे उन दिनों की बातें मुझे अभी भी अच्छी तरह से याद हैं जब मेरे पिताजी बायें और कमर पर खुकुरी बाँधकर बायें कंधे पर कुल्हाड़ी दायें बगल में बोरी और ‘नाम्लो’ मतलब ढोने के लिए फीतानुमा रस्सी दबाकर जंगल से लकड़ी काट ले-आकर पूर्व सिक्किम का रंगेली बाजार में पहुंचा कर बेचा भी करते थे…! वे उस वक्त कभी-कभी हमें भी अपने साथ लेकर ज़ाया करते थे वह इसलिए ताकि हमारे द्वारा ढोयी गयी छोटी बंडल लकड़ी घर के लिए काम आये ।
उसी प्रकार उनके साथ कभी -कभी मेरे द्वारा ढुवायी गई घास अपने ही घर मे पाले-गये बकरों के लिए खिलायी जाती थी ।
मेरी जिन्दगी में उस समय का दौर कुछ पुरातन का ही था, हालांकि सामाजिक सोंच वेरंग विशुद्ध रहा था…मै परिवार में मा-बाप का पहला संतान, मेरे बाद भाई बहनें पर मेरे बाद के दो बहनें और तीन भाई बचपन में ही गुजर गये। अभी हम दो भाई और चार बहनें हीं अलग-अलग गुजर बसर कर रहे हैं । इस वक्त अपने ही बल बूते पर और मेरे लड़कों के सहयोग से बने घर में पत्नी तुलसी, दो बेटे, दो बहूयें, एक बेटी, दो पोते, और एक पोती के साथ अवकाश प्राप्त इस जीवन के उत्तरार्ध में साहित्य एवम् अध्यात्म साधना में तल्लिन हूँ या यूँ कहें कि सादगी जीवन के साथ आनन्दित हूँ… मेरी औपचारिक शिक्षा बहुत साधारण रही पर स्वतंत्र अध्ययन अभी भी बरकरार है! मैं भारतीय नेपाली-भाषी हूँ , हमने हिन्दी में कोई पढ़ाई-लिखाई नहीं की आज जिस तरह से टूटी फूटी हिन्दी बोल और लिख रहा हूँ इसे अपनी इच्छा, कुछ-कुछ अभ्यास, वस्तुतः अदृश्य शक्ति की कृपा और यशस्वी अनुवादक साहित्यकार सुवास दीपक जी की आशीरपूर्ण प्रेरणा के बदौलत मानता हूँ ।
राजीव सर् , मुझे यकीन है कि इन्हीं कम शब्दों में आप सम्पूर्ण समझ पायेंगे मेरे बचपन, घर परिवार और मेरी पढ़ाई लिखाई के बारे में ।

 3, प्रश्न- अपने प्रिय लेखकों और कवियों के बारे में बताएँ ?

झा जी यह प्रश्न धर्म संकट वाला है…वैसे तो हम किसी वाद और सीमाओं से घिरकर रहने में बढ़ी दिलचस्पी नहीं रखते, वस ह्रदय में जो गहन अनुभूति होती अतः घटित होतीं हैं उन्हे ही प्राकृतिक तौर पे शब्दाङ्कन भी करते । और उसी प्रकार जो-जो किताबें पढ़ने को मन करता यानी किताबों के अन्तर्वस्तु मेरी रूचि को छूने में सफल होते उन विषयों को पढ़ता हूँ, चलिए फिर भी कुछ एक कवियों का नाम तो ले ही लेता हूँ जैसे कि हिन्दी साहित्य के आराध्य कवि (संत कबीर) विश्व कवि रविन्द्रनाथ टैगोर, आदि जिसमें से कबीर साहब को मेरे साहित्य मार्ग का परम आदर्श के रूप में मानता हूँ , और उसी प्रकार नेपाली साहित्य जगत् के महाकवि लक्ष्मीप्रसाद देवकोटा, कवि शिरोमणि लेखनाथ पौड्याल, कवि भूपि सेरचन और कवि डाॅ पारसमणि प्रधान आदि-आदि की रचनाएँ ही प्रथम चरण में पढ़ा हूँ । अन्त में इतना कहता हूँ कि जितने भी कवि जाहे विभिन्न भाषाओं में लिखनेवाले ही हों सभी को प्रिय मानता हूँ। प्रणाम करता हूँ ।

 4,प्रश्न- अहिन्दी भाषी हिन्दी सेवियों के बारे में अक्सर कहा जाता है कि हिन्दी में उनके लेखन के मूल्यांकन में भेदभाव किया जाता है, इसके बारे में आपके क्या विचार हैं ?

उत्तर- मैं स्पष्ट कहता हूँ कि मुझे यिन आरोप-प्रत्यारोपों के बारे में कोई खासी जानकारी नहीं है , इमानदारी के साथ कहता हूँ –मैं एक अलग-थलग मनोवृत्ति का अति समान्य इनसान हूँ और स्वतंत्र रहकर ही लिखना चाहता हूँ, विशेषत कविताएँ ही करता हूँ । दूसरी बात तह दिल से कहता हूँ कि मैं पुरस्कारमुखी भी नहीं हूँ चूँकि काव्य-साधना को उपासना समझता हूँ , आराधना मानता हूँ! जैसे कि कविता राम हैं कवि हनुमान । या फिर कविता कृष्ण हैं, कवि मीरा…बस नित्यम भक्ति आराधना में लगे रहना…है। हम हमारे अनुज कवियों को यही बात कहना चाहते हैं कि साहित्य की किसी भी सम्बन्धित विधाओं में सम्मोहित होकर जियें इसी में परम सुख मिलता है ! शब्दातीत आनन्द है ! इन खुशियों और आनन्द के मुकाबले पुरस्कार कोई खासा मायने नहीं रखता… हाँ अगर किसी कृति के मूल्यांकन हेतू विशुद्ध तौर पे मिलता भी है तो उसे भी सहर्ष स्वीकार लेना होता है जो सृजन तथा प्रकाशन के लिए अतिरिक्त उर्ज़ा मिलती है।
झा जी मुझे नही लगता कि अहिन्दी भाषी हिन्दी सेवियों को उस तरह का कोई भेदभाव कम-से-कम हमारे देश भारत में होता होगा…जी नहीं मै ऐसा हरगिज़ नहीं समझता हूँ ।

5, प्रश्न- सिक्किम के निवासियों में हिन्दी के प्रति प्रेम-भाव के बारे में बताएँ ?

उत्तर- मेरे अनुमान के मुताबिक हमारे सिक्किम राज्य के सभी निवासी हिन्दी के प्रति पर्याप्त प्रेम-भाव रखते हैं, इतना ही नहीं बल्कि करीब सत्तर प्रतिशत लोग हिन्दी को समझ सकते हैं तकरीबन 20/25 % अच्छी तरह से बोल सकते हैं, बाकी 5% में से कितने प्रतिशत लोग ठीक से बोल सकते होंगे और कितने प्रतिशत ठीक से लिख भी सकते होंगे इस बारे अस्पष्ट हूँ

जहाँ तक मेरा सवाल है कि हिन्दी के प्रति मेरी अभिरुचि और बढ रही है वह इसलिए कि देश के कई संस्थाओं ने मेरी मातृभाषा की कुछ कृतियों… (जो वरिष्ठ साहित्यकार, अनुवादक तथा पत्रकार सुवास दीपक जी द्वारा) अनूदित को सम्मान भी दे चुकीं हैं, खास बात हमारे देश की ही शीर्षस्थ साहित्य संस्थान दिल्ली साहित्य अकादेमी ने भी राष्ट्रीय एवम् अन्तर्राष्ट्रीय कार्यक्रमों पर पिछले कुछ वर्षों से ही मुझे भी शिरकत करने का मौका दे रही है।
मैं समझता हूँ कि हमारे भारत देश के ही विभिन्न मातृभाषी लोग विशेष, साहित्य कर्मी हमारी राजभाषा हिन्दी के प्रति गहरा प्रेम और सदभाव रखते हैं वह इसलिये कि हिन्दी ही एक ऐसी भाषा है जो अपने राष्ट्रीयता के धागे में एकसाथ पिरोने की क्षमता एवम् सहजता रखती है ।

6,प्रश्न- आप हिन्दी और नेपाली में लिखी अपनी रचनाओं के बारे में बताएँ ?

सर् सबसे पहले तो यह बात साफ़ कर देना चाहता हूँ कि मैनें हिन्दी की कोई पढ़ाई ही नहीं की ।
पर मुझ में बहुत रूचि रही है चूंकि हिन्दी हमारे देश की एक प्रतिनिधि भाषा है हालाँकि (हम जैसे) हिन्दीतर भाषियों के लिए विशेष भाषिक लिंगों को लेकर कठिनाईयाँ भी आती हीं हैं, और नेपाली तो हमारी मातृभाषा रही जो क़रीब चालीस साल भाषाई आन्दोलन के बदौलत भारत सरकार द्वारा सन् 1992 , 20 अगस्त से पूर्ण संवैधानिक मान्यता भी मिली है ।
अब हम अपने लेखनोपज के बारे में प्रकाश डालेंगे: नेपाली भाषा में मेरी 8 मौलिक कविता कृतियाँ और एक बाल कथा छोटी सी किताब के रूप में जो कि NBT INDIA द्वारा छपी है ।यशस्वी साहित्यकार,पत्रकार अनुवादक सुवास दीपक जी द्वारा हिन्दी में अनूदित ‘जीवन-चित्र’, और ‘भाव-धन तथा अन्य कविताएँ’ 2 कृतियाँ । स्वयम द्वारा मेरी खुद की काव्य कृति ‘मानव’ को हिन्दी में अनूदित 1 कृति, उसी प्रकार हमने हिन्दी से नेपाली में 3 कृतियों को अनुवाद कर चुके हैं जैसे कि ‘सन्त कबीर के चुनिंदे दोहे’। डाॅ वेद व्यथित की ‘अन्तर्मन’ काव्य कृति। और डाॅ अ.कीर्तिवर्धन की कविताओं में से चुनकर ‘अक्षरार्थ’। 5 पत्रिकाएँ और 1अभिनन्दन ग्रन्थ सम्पादित हैं । (आज की तारीख में जिस तरह से जो जैसी हिन्दी लिख रहा हूँ ईस का श्रेय उन्हे जाता है जिन्होंने मेरी पर बल दिया प्रेरणा दी उनका नाम है आदरणीय सुवास दीपक जी ।

 7, अब और एक प्रश्न- भारत के प्रमुख रचनाकारों की कुछ जानकारी दीजिएगा ?

उत्तर- मेरे लिए वे सारे रचनाकार (साधक) सभी प्रमुख हैं विशेष हैं, जो किसी वाद एवम् सीमाओं से न बँधकर नि:सृत एवम् विशुद्ध साहित्य सृजन कर अपनी साहित्य-धर्मिता को तह दिल से ही शिरोधार्य करते हैं निभाते हैं …
झा जी अब ज्यादा कुछ न कहते हुए इस नाचिज कविता साधक को साक्षात्कार के लिए आपने समझा परखा अन्ततः आप और नामचीन सम्पादक अतः पत्रिका के प्रति शुक्रगुज़ार हूँ शुक्रिया !
शुभम्