लेखिका शशि पुरवार से राजीव कुमार झा का साक्षात्कार ,

साहित्य जगत में अपनी विशेष पहचान रखने वाली लेखिका शशि पुरवार देश की १०० सशक्त महिलाओं में शामिल है , आपकी रचना धर्मिता  आपकी विशेष पहचान है।  शशि पुरवार स्वतंत्र लेखन करती है।  आप स्तम्भकार, गीतकार, कहानीकार, हाइकुकार, ब्लॉगर अनेक विधाओं में अपनी पैठ बना चुकी  है , आइये लेखन से  इतर भी उनके व्यक्तित्व के बारे में जानते है।
प्रश्न – 1  अपने साहित्य लेखन के बारे में बताएं ? साहित्य जीवन का स्वर है अपने लेखन को आप किस तरह से देखती हैं ?

  समाज और साहित्य का गहरा संबंध है पूर्णतः सत्य है कि साहित्य जीवन का स्वर है।  सामाजिक परिवेश में जन्मी संवेदना ही समाज का आईना होती हैं. सामाजिक चेतना के अभाव में साहित्य का सृजन नहीं हो सकता है।  समय सापेक्ष सृजन ही साहित्य के  भूत, वर्तमान और भविष्य का निर्धारण करता है. एक साहित्यकार जीवन के अनुभूतियों व संवेदना से प्रेरित होकर साहित्य का सृजन करता है जो इतिहास के पन्नों में दर्ज होती हैं.  मेरे लिए लेखन पूजा एवं अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है.  सामाजिक परिवेश में जन्मी संवेदना को अभिव्यक्त करती करके विसंगतियों पर प्रहार करती हूं
 २ –  अपने घर परिवार माता – पिता पढायी – लिखाई और लेखन के प्रति कायम होने वाले झुकाव के बारे में बताएँ
एक मध्यम वर्गीय शिक्षित परिवार में जन्म हुआ था।   माता ने हिंदी में  उच्च शिक्षा प्राप्त की है व साहित्य  अभिरुचि रूचि थी। वही पिताजी ने विज्ञानं व अर्थशात्र में उच्च शिक्षा प्राप्त की है। मैंने विज्ञान में स्नातक उपाधि,  राजनीति विज्ञान में एम् ए  किया एवं  सॉफ्टवेयर में  आनर्स डिप्लोमा इन कंप्यूटर मैनेजमेंट  की शिक्षा प्राप्त की है.   लेखन के प्रति बचपन से ही रुझान उत्पन्न हो गया था.  जब ८-९ कक्षा  तब कबीर के दोहे व ग़ालिब की शायरियों   ने आकर्षित किया।  माँ की साहित्यिक किताबें व साइकोलॉजी की किताबें चुपचाप पढ़ी थी। कहानियों में विशेष रूचि थी व संवेदनाओं को महसूस करके आकार देना पसंद था।  अंतर्मुखी स्वाभाव व  किताबों के प्रति रूचि ने अभिव्यक्ति की तरफ प्रेरित किया।  किताबें  मेरी सबसे अच्छी मित्र बनी।  जिनके बिना मुझे अधूरेपन का एहसास होता है।
3 अपने प्रिय रचनाकारों के बारे में बताएँ ?

   पुराने हस्ताक्षरों में निराला, हरिवंश राय बच्चन, रविंद्र नाथ टैगोर, अमृता प्रीतम की कहानियां, प्रेमचंद, प्रसाद सभी पुराने हस्ताक्षरों को पढ़ना पसंद है. गीत, छंद व कहानियां मुझे खूब पसंद है।  साथ ही मै नए हस्ताक्षरों को भी पढ़ना उतना ही पसंद करती हूं. अच्छा साहित्य ही मन की  पिपासा शांत करता है.

४ आज का साहित्य परिवेश खासकर नारी लेखन के बारे में आपका ख्याल है।

  महिलाओं ने हर  क्षेत्र में सम्मानजनक स्थिति में कार्य किया है।  लेखन अपनी गुणवत्ता से आंका जाता है नर या नारी से नहीं।  साहित्य के क्षेत्र  प्राचीन समय से महिलाओं की उपस्थिति दर्ज है। आज महिलाएं  इस क्षेत्र में अपनी दखल बढ़ा चुकी है  और बेहद उम्दा लेखन करके साहित्य में अपना विशेष योगदान दे रही है।  आज आपको उनकी लम्बी सूचि  मिल सकती है।

 ५ – इंदौर से आपका काफी लगाव रहा है . यहाँ का साहित्यिक माहौल आपको कैसा प्रतीत होता है ?

   –  अपनी जन्मभूमि से लगाव  होना स्वाभाविक है।  मालवा  की माटी  ने  बहुत  से रचनाकारों और कलाकारों को जन्म दिया है।  जब बात इंदौर की होती है तो  वहां साहित्यिक  सक्रियता बहुत हैं  व  गतिविधियां वहां होती ही रहती है।  हाल ही में  देश में पहली बार अखिल भारतीय महिला समागम की शुरआत भी इंदौर में हुई थी।जिसे वहां की  घमासान मीडिया व वामा साहित्यिक मंच ने आयोजित किया था।  इंदौर साहित्य से  समृद्ध स्थान  है। इंदौर में   बहुत अच्छे व  विख्यात हस्ताक्षर  मौजूद हैं जो साहित्य के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान रखतें है।  वहां से कई साहित्यिकीक पत्रिकाएं भी प्रकाशित होती  है।

६ आप अपने नवगीत लेखन के बारे में बताएँ ?

जब बात गीतों की होती है तो ह्रदय में संवेदना का ज्वार उमड़ता है. हालांकि बचपन में नवगीत पढ़े थे किन्तु  सन 2011 में नवगीत के संसर्ग में आकर नवगीत  लेखन प्रारम्भ कर दिया था।  नवगीतमानवीय संवेदनाओं की पृष्ठभूमिसे जन्में हुए वह गीत हैं जोपाठकों  से संवाद करते हुएदिलों में अपनी गेयता की छापछोड़तें है। नवगीत  हमारेही परिवेश से  जन्मी हुई वहसंवेदनाएं हैं,जो पाठकों को उनकी पृष्ठभूमि सेजोड़ती हैं। नवगीत जन-जनकी मुखर वाणी बनकर नए उपमानप्रस्तुत करतें है . नवगीत में जन चेतना का पैनापन  होता है वही जीवन के खुरदुरे पन  को सघनता, सहजता व सरलता से व्यक्त किया जा सकता है.  ।नवगीतों की  कशिश व उसका  सलोनापन पाठकों के अंतर्मनमें मधुरता बिखेरता है। मेरा  नवगीत संग्रह   ” भीड़ का हिस्सा नहीं ”   प्रकाशित हुआ है  किन्तु लॉक डाउन  के कारण पाठकों के  हाथों तक नहीं पहुंच सका.

७ साहित्य लेखन में कल्पना की जगह यथार्थ को आप कितना महत्वपूर्ण मानती हैं ?

 एक साहित्यकार समाज का दर्पण होता है.  साहित्य समाज का आईना होता है। बिना सामाजिक सरोकार के तो रचनाएँ  पंगु हो जाएँगी।  परिवेश में जन्मी रचनाएँ  ही उस काल का चित्रण करती है। मै यथार्थ को ही महत्वपूर्ण मानती हूँ क्यूंकि समय सापेक्ष रचनाएँ, साहित्य के पन्नों पर  अमिट  छाप छोड़ती है।   मै काल्पनिक चित्रण करने में स्वयं को  असहज महसूस  करती हूँ।  कल्पना का  साहित्य में स्थान नहीं है लेकिन हम यह कह सकतें है कि उपन्यास कहानियां लिखते समय  बिम्बों के माध्यम से पात्रों को कल्पित कर सकते हैं।  साहित्य  सत्य घटनाओं और तथ्यों पर आधारित होता है।  काल्पनिक साहित्य और गैर काल्पनिक साहित्य दोनों पृथक हैं.

८ आजकल आप महाराष्ट्र में रहती हैं यहाँ हिंदी का कैसा माहौल है ?
शादी के बाद ही महाराष्ट्र में निवास हुआ है.  महाराष्ट्र के कई शहरों में मैंने प्रवास किया है.  इतने वर्षों की यायावरी में अगर कुछ विशिष्ट  जगहों को छोड़ दिया जाए तो अन्य स्थानों पर मुझे हिंदी का माहौल नहीं मिला है।  मराठी साहित्य व गतिविधियां हर जगह है किन्तु हिंदी के लिए आपको भटकना पड़ता है.
९ साहित्य लेखन के अलावा अपने अन्य रचनात्मक कार्यो के बारे में बताएँ ?
रचनात्मकता कार्य करना मुझे बेहद पसंद है। मै कभी भी खाली नहीं बैठती हूँ।  बागवानी में प्रयोग करना , नृत्य (क्लासिकल, फोक डांस, कत्थक ),  पुराना संगीत सुनना, किताबें पढ़ना, शतरंज, बैडमिंटन, पैंसिल स्केच, कुकिंग, प्रकृति से संवाद व  नई नई चीजे सीखना व बनाना, कुछ अलग हट के काम करना बेहद पसंद है।

  शतरंज व बैडमिंटन , बास्केटवाल मैंने कॉलेज  तक खूब खेला है वहीँ नृत्य भी जीवन का अभिन्न अंग बना रहा, हालांकि अब छूट सा गया है। खाने की शौक़ीन हूँ इसीलिए उसमे भी प्रयोग करना बेहद पसंद है , लेखन की तरह कुकिंग में भी  प्रयोग करना मेरे दैनिक जीवन का हिस्सा है।  बहुत कम लोग जानते हैं कि  मैंने कुकिंग में भी पुरस्कार जीते हैं।  साथ ही अन्य गतिविधिओं में खूब सराहना मिली है.

१० नारी लेखन में प्रेम और श्रृंगार आपको कितना सार्थक  विषय प्रतीत होता है ?
श्रृंगार रस के बिना साहित्य अधूरा ही माना जाता है। श्रृंगार को रसराज व रसपति भी  कहा जाता है। श्रृंगार के नौ रस में से प्रेम बेहद संजीदा व कोमल विषय है।  नारी स्वयं प्रेम का प्रतिक  है, तो नारी प्रेम व श्रृंगार की अभिव्यक्ति भी उतनी  कोमलता व नजाकत से प्रस्तुत करती है।  मैंने भी श्रृंगार रस व प्रेम रचनाएँ लिखी है। मै प्रेम को नजाकर से प्रस्तुत करना पसंद करती हूँ।   रचनाएँ सार्थक वही होती है जो पाठकों से सहज संवाद करती है।  लेखन में भौंडापन नहीं एक नजाकत होनी चाहिए , तो उसकी कशिश बनी रहती है।

११ आपने व्यंग्य लेखन भी किया है . गद्य लेखन में व्यंग्य की विशिष्टता को रेखांकित कीजिए .
मेरे विनोदी स्वभाव ने मुझे व्यंग्यकार बना दिया।  गद्य  में व्यंग्य लेखन ठीक उसी प्रकार कार्य करता है जैसे भोजन में तड़के का छौंक। व्यंग्य  का उपयोग सार्थक व सही दिशा में हो तो कारगर सिद्ध होता है।  व्यंग्य उस सुगंधित  छौंक के समान हैं जो जीवन में रंग भरते हैं.   व्यंग्य और हास्य व्यंग्य के बीच पतली सी रेखा का फर्क है।  ऊब भरी एक सार  जिंदगी में हास्य व्यंग्य पाठकों के अधरों पर मुस्कान का रंग भरते हैं वही व्यंग्य सहजता से लोगों के मानस पटल पर अपनी अमिट छाप छोड़ते हैं. अपनी बात को हलके फुल्के ढंग से प्रस्तुत करना गद्य लेखन में रोचकता बढ़ता है , मेरी किताब व्यंग्य की घुड़दौड़ को पाठकों द्वारा पसंद किया है.
१२ वर्तमान समय में मीडिया की बदलती भूमिका का विवेचन आप किस तरह करना चाहेंगी ?

  मीडिया ने समय-समय पर लोगों को उनके अधिकारों के प्रति सचेत किया है.   बदलते वक्त के साथ मीडिया का स्वरूप भी बदला है.  संप्रेषण के नए-नए आयाम  स्थापित हुए हैं.  आज मीडिया हमारे जीवन का महत्वपूर्ण अंग है।  सोशल मीडिया  ने देश  विदेश के हर कोने में बैठे व्यक्ति से सहजता से जोड़ दिया है।  आज मीडिया   विचारों की  अभिव्यक्ति स्वतंत्र सशक्त माध्यम बना है  .  मीडिआ द्वारा लोगों  के  महत्वपूर्ण जानकारियां सुलभ सहज  उपलब्ध है जिसका फायदा उनके दैनिक जीवन को समृद्ध करता है