युवा लेखिका डा . प्रज्ञा त्रिवेदी शुक्ला कानपुर की निवासी हैं और साहित्य चिंतन में भी इनकी रुचि है . प्रस्तुत है राजीव कुमार झा के साथ इनकी बातचीत . .0

 राजीव कुमार झा नयी दिल्ली स्थित जामिया मिल्लिया इस्लामिया से मास कम्युनिकेशन में एम . ए . की पढायी पूरी करने के बाद रेडियो – अखबार और अन्य जन माध्यमों के लिए लेखन करते रहे हैं .  युवा लेखिका डा . प्रज्ञा त्रिवेदी शुक्ला कानपुर की निवासी हैं और साहित्य चिंतन में भी इनकी रुचि है . प्रस्तुत है राजीव कुमार झा के साथ इनकी बातचीत . .0

 भारतीय समाज – संस्कृति में कविता का क्या स्थान है ?
भारतीय समाज और संस्कृति में कविता का स्थान महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें कवियों के भाव संरक्षित होते हैं और कवि एक संवेदनशील व्यक्ति होता है इसलिए वह अपनी भावनाएं व्यक्त कर देता है जबकि साधारण मनुष्य संवेदनशील होते हुए भी अपनी भावनाएं कविता के रूप में व्यक्त नहीं कर पाता है।
 अपने प्रिय कवियों के बारे में बताइए ?
जयशंकर प्रसाद,निराला, रघुवीर सहाय, केदारनाथ सिंह, समकालीन कविता में सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि भाषा सरल होती है लेकिन भाव जटिल। कविता और अधिक परिपक्व हुई है। साथ ही साथ स्त्री लेखन के योगदान से भी इंकार नहीं किया जा सकता।
 आजकल कविता लेखन में क्या बदलाव आ रहा है ?
 समकालीन कविता में सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि भाषा सरल होती है लेकिन भाव जटिल। कविता और अधिक परिपक्व हुई है। साथ ही साथ स्त्री लेखन के योगदान से भी इंकार नहीं किया जा सकता। अगर हम इस बात को कहते हैं कि कविता जनजीवन से दूर होती जा रही है तो मुझे लगता है कि इसका सबसे बड़ा कारण सोशल मीडिया है। जहां पहले लोग किताबों के माध्यम से ही सारा ज्ञान अर्जित करते थे । उसके लिए पब्लिक लाइब्रेरी जाते थे एक किताब देखने के साथ न जाने कितनी किताबों पर नजर चली जाती थी। आज इंटरनेट के समय में एक नई पीढ़ी ऐसी हो गई है जो सब कुछ आसानी से पाना चाहती है। टेलीविजन और गूगल एक विज्ञापन वाली दुनिया विकसित कर रहे हैं। साथ ही जो आवश्यक और अनावश्यक है दोनों ही चीजें उपलब्ध करा रहे हैं।
 क्या निराला को कवि के रूप में हिंदी कविता की परंपरा और इसकी आधुनिक जीवन चेतना का सबसे महान सर्जक कहा जा सकता है ?
जैसा कि मैंने पहले ही कहा है की निराला आज के समय में भी प्रासंगिक कवि हैं। जिन्होंने हिंदी कविता की परंपरा में भाषा के माध्यम से परिवर्तन किया। उन्होंने भाव और भाषा का तालमेल कविता में बैठाने की कोशिश की। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि निराला आधुनिक जीवन चेतना के सबसे महान संयोजक हैं। सरोज स्मृति में देखा जा सकता है कि कैसे एक पिता अपनी पुत्री के यौवन का वर्णन करता है। कितने सधे हुए शब्दों का प्रयोग एक पिता अपनी पुत्री के लिए कर सकता है। इसका साक्षात प्रमाण सरोज स्मृति मे देखने को मिलता है। मुझे लगता है कि निराला के पहले और ना ही निराला के बाद किसी भी कवि ने अपनी पुत्री के यौवन का वर्णन हिंदी साहित्य में इस प्रकार किया हो।
 आप शोध अध्येता हैं . अपने विश्वविद्यालय और साहित्य शोध के बारे में बताएँ ?
मैंने कानपुर विश्वविद्यालय से m.a. किया तत्पश्चात यूजीसी नेट किया। पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर, छत्तीसगढ़ से पीएचडी कार्य पूर्ण किया। रायपुर में ही 3 वर्ष तक रायपुर यूनिवर्सिटी से संबंद्ध महाविद्यालय में अध्यापन कार्य किया। वर्तमान समय में दिल्ली में रहती हूं और स्वतंत्र रूप से लेखन कार्य करती हूं। शोध कार्य करने के पहले मैंने यूजीसी नेट की परीक्षा उत्तीर्ण की। उसके बाद केदारनाथ सिंह के काव्य में सामाजिक संवेदना विषय पर शोध कार्य किया। केदारनाथ सिंह की कविताओं के प्रति रुझान मेरा परास्नातक होने पर ही हो गया थाक्योंकि अक्सर में महाविद्यालय की लाइब्रेरी में जाया करती थी और वहां केदारनाथ सिंह की कविताओं पर पुस्तके हुआ करती थी जिन्हें पढ़ने पर एक अलग ही अनुभूति महसूस होती थी और शायद यही कारण था कि मैंने शोध कार्य में केदारनाथ सिंह की कविताओं को चुना। केदारनाथ सिंह की एक कविता ‘रोटी’ जिसमें भूख और रोटी का संबंध दिखाया गया है।रोटी का महत्व एक भूखे व्यक्ति के लिए भी है और रोटी का महत्व उसके लिए भी है जो रोटी पैदा करने में योगदान देता है। भूख रोटी और आग इस कविता के महत्वपूर्ण बिंदु है जो मुझे लगता है कि हर युग में प्रासंगिक रहा है और रहेगा। कविता को आप समाज से…
 हिंदी में गद्य साहित्य को विशिष्ट बनाने में आप किन लेखकों का योगदान महत्वपूर्ण मानती हैं ?
गद्य साहित्य को विशिष्ट बनाने में सर्वाधिक योगदान मै प्रेमचंद का मानती हूं जिन्होंने सरलतम भाषा शैली से एक समृद्ध कहानी संसार रचा। उनकी लगभग 300 कहानियां आज भी लोगों को पढ़ने के लिए प्रेरित करती हैं। प्रेमचंद का गोदान उपन्यास आज भी किसानों की स्थिति के लिए उतना ही प्रासंगिक है जितना कि उस समय था। प्रेमचंद के बाद अगर किसी और का स्थान आता है तो वह जैनेंद्र हैं क्योंकि उनके उपन्यास भी अपना महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। सही मायनों में जैनेंद्र के उपन्यासों से ही स्त्री-विमर्श की चर्चा होना प्रारंभ होती है। त्यागपत्र की नायिका मृणाल जीवन पर्यंत दुख भोगने के लिए विवश रहती है। लेखक ने तो सिर्फ एक मृणाल का वर्णन किया है हमारे समाज में न जाने कितनी ऐसी स्त्रियां होती है जो सिर्फ अपने परिवार और समाज के लिए ही अपना जीवन होम कर देती हैं। अज्ञेय भी विशिष्ट गद्य लेखक के रूप में अपनी पहचान बनाते हैं। ‘शेखर: एक जीवनी’ की भाषा एक साधारण लेखक की भाषा नहीं है। एक मंजे हुए लेखक की भाषा प्रतीत होती है। समकालीन लेखकों में मन्नू भंडारी भी विशिष्ट लेखिका है जिनका उपन्यास ‘आपका बंटी’ अति विशिष्ट उपन्यास है। नासिरा शर्मा विश्व स्तरीय गद्य लेखिका है जिनका उपन्यास ‘साथ नदियां एक समंदर’ बहुत ही महत्वपूर्ण उपन्यास है जिसमें उन्होंने ईरान की दुर्दशा का वर्णन किया है जो विश्व स्तरीय उपन्यास है। गद्य लेखिकाओं में प्रभा खेतान, उषा प्रियंवदा, मृदुला शर्मा, ममता कालिया, मृदुला गर्ग भी महत्वपूर्ण लेखिकाएं हैं।
 आप कथा लेखिका हैं और कहानी को कविता से किस तरह भिन्न पाती हैं ?
मुझे लगता है कि कविता कहानी की अपेक्षा अधिक सूक्ष्म है। भाव तो दोनों में ही होते हैं किंतु कविता के भाव दूर तक प्रहार करते हैं जो अधिक मार्मिक होते हैं। कविता की एक कहानी हो सकती है मगर कहानी की कविता कभी नहीं हो सकती है। थोड़े से ही शब्दों में कविता आपकी बात को कह जाती है जबकि कहानी बिना पात्रों के सहयोग के आगे बढ़ ही नहीं सकती है कविता काव्य विधा की महत्वपूर्ण देन है वही कहानी गद्य विधा की महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
 हिंदी में नारी लेखन की धारा के बारे में आपका क्या मत है ?
हिंदी में नारी लेखन की एक लंबी लिस्ट है जिस से इनकार नहीं किया जा सकता है। स्त्री लेखिकाओं ने सिर्फ अपने आपको स्त्री विमर्श तक ही सीमित नहीं रखा है बल्कि संपूर्ण समाज की स्थितियों परिस्थितियों का अवलोकन कर अपने लेखन कार्य में समाहित किया है। स्त्रियों के लेखन को सिर्फ स्त्री विमर्श तक देखना एक संकुचित मानसिकता का प्रतीक है।
अपने बचपन घर परिवार और जीवन के प्रारंभिक दिनों को आज कैसे याद करना चाहेंगी ?
मैं बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि, पढ़ने में तेज थी। घर में पढ़ाई- लिखाई का माहौल था। आर्थिक स्थिति सुदृढ़ ना होने पर भी मेरे पिता हमेशा मुझे पढ़ने के लिए प्रेरित किया करते थे। पिताजी होम्योपैथिक डॉक्टर हैं और माता कुशल ग्रहणी। जिनकी प्रेरणा और आशीर्वाद से मैंने उच्च शिक्षा प्राप्त की। विवाह पश्चात पतिदेव का भी बराबर सहयोग मिला।आज अगर मैं जीवन के प्रारंभिक दिनों को याद करती हूं तो मुझे लगता है कि मेरा बचपन बहुत ही अच्छा रहा, जिस परिवार में बड़े- छोटे को सम्मान दिया जाता है, वह परिवार किसी भी आर्थिक- दबाव में कभी नहीं आता है क्योंकि बच्चे भी उस स्थिति में परिवार का सहयोग करते हैं। आज भी मेरा घर-परिवार मेरी सबसे बड़ी पूंजी है।
डॉ प्रज्ञा त्रिवेदी शुक्ला
जन्म स्थान-कानपुर
शिक्षा-कानपुर विश्वविद्यालय
तीन वर्षों तक महाविद्यालय में अध्यापन कार्य
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में सामाजिक लेख एवं कहानियां छप चुकी हैं।
संप्रति: स्वतंत्र लेखन
वर्तमान आवास: नई दिल्ली