कविता लेखन के अलावा समाज सेवा में भी इनकी रुचि

 कवयित्री संगीता कुजारा टाक राँची की निवासी हैं . कविता लेखन के अलावा समाज सेवा में भी इनकी रुचि है . प्रस्तुत है इनसे राजीव कुमार झा की बातचीत

1)आप कवयित्री हैं . आपका कविता संग्रह भी प्रकाशित हुआ है . अपने कविता लेखन के बारे में बताएँ ?

जी हाँ! मैं दिल से कवयित्री हूँऔर और मेरा एकल कविता संग्रह #खुद से गुजरते हुए# इसी साल शिवना प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है । यूँ तो तीन सांझा कविता संग्रह 1)संवेदनाएं 2) झारखंड कुसुम और 3) नीलांबरा पहले ही प्रकाशित हो चुके हैं।देश के मुर्धन्य कवि केदारनाथ जी ने अपनी एक कविता में लिखा है “लिखने से कुछ नहीं होगा फिर भी मैं लिखना चाहता हूँ” । साहित्य के क्षेत्र में मैं तो तिल मात्र भी नहीं।ये जानते हुए भी कि मेरे लिखने से तो सचमुच कुछ नहीं होने वाला लेकिन फिर भी मैं भी लिखना चाहती हू कविताएँ। दरसल कोई भी कला, चाहे वह कहानी लेखन हो, कविताएं लिखना हो ,चित्रकारी हो, संगीत हो या फिल्म ही क्यों ना हो , ये सारे माध्यम भावनाओं को प्रकट करने के माध्यम है। ईश्वर ने अपने भावों को प्रकट करने के लिए दुनिया बना डाली तो हम भी तो उन्हीं के बाशिंदे हैं। सृजन करना हम सब के’ डी.एन.ए ‘ में है। साइंस की स्टूडेंट रही ,बिजनेस को अपना कैरियर चुना लेकिन दिल हमेशा कविता कहता रहा। यूँ तो बचपन से ही कविता लिखने लगी, पेंटिंग करने लगी लेकिन सब ने समझा दिया कि इससे कुछ होने- जाने का नहीं है ।पढ़ाई में अपना मन लगाओ, पर मन कविता- कहानियों में डूबा रहता। न मैंने उन्हें छोड़ा, न उन्होंने मुझे। स्कूल की लाइब्रेरी से पहला ही नोवेल निकाला था ‘दिल्ली की गलियाँ’, अमृता प्रीतम ने लिखा है। इसके बाद ‘देवदास’ और फिर सिलसिला निकल पड़ा हिंदी साहित्य को पढ़ने का । लाइब्रेरी में लेकर प्रेमचंद, शिवानी की पूरी सीरिज़ पढ़ डाली । शुरू- शुरू में दो चार कविताएँ सरिता पत्रिका में छप कर भी आई लेकिन हिम्मत नहीं हुई किसी को बताने की , तो फिर छोड़ दिया भेजना। लेकिन हाँ! कुछ न कुछ लिखती रही दोस्तों को सुनाती रही।और हौसला मिलता रहा।
2)राँची का साहित्यिक परिवेश आपको कैसा प्रतीत होता है ?

राँची का साहित्यिक माहौल बहुत अच्छा बन पड़ा है ।यूँ तो यहां पर वरिष्ठ साहित्यकारों का इतिहास है चाहे राधा कृष्ण जी हो ,द्वारिका प्रसाद हो, डा मिश्र ,डा श्रवण गोस्वामी या खगेंद्र ठाकुर जी हो।वर्तमान में भी मूर्धन्य साहित्यकार विद्या भूषण जी , रवि भूषण जी, डा अशोक प्रियदर्शी जी, डा माया प्रसाद जी, डॉ पंकज मित्र जी ,रणेन्द्र और महुआ माँझी जैसे साहित्यकारों का आशीर्वाद, मार्गदर्शन और सहयोग मिलता रहता है । नवलेखनकारों से हरा भरा है राँची का साहित्यिक उद्यान । आए दिन गोष्ठियों से गुलजार रहता है यहाँ का परिवेश।

3)अपने घर परिवार शिक्षा और अपने अन्य कार्यों के बारे में बताइए ?

मेरे दादा जी विभाजन से पूर्व ही , पाकिस्तान (मुल्तान )से 1941-42 के आसपास बिहार आ गए थे । तब से मेरा मायेके का परिवार यही बस गया । और यहीं वूल का बिजनेस किया। दादा जी की मृत्यु जल्द हो गई थी। पूरे परिवार की जिम्मेदारी मेरे पिताजी के ऊपर आ गई। यह संघर्ष का समय था पर मेरे पिताजी ने हिम्मत नहीं हारी और इस क्षेत्र में बड़ा नाम किया। मेरा जन्म स्थान राँची ही है। यहीं मेरी शिक्षा हुई। एमएससी करने के साथ- साथ अपने पिताजी के साथ बिजनेस भी किया । फिर शादी भी राँची में ही हो गई। सो ससुराल भी राँची में ही है ।मेरे पति चार्टर्ड अकाउंटेंट है। दोनों परिवारों का सहयोग मिलता रहता है। पर इन सबके बीच दो जवान मौतों ने हम सब को हिला दिया। हम तीन बहनों का इकलौता ,पच्चीस साल का मेरा जवान भाई डॉक्टर की लापरवाही की वजह से हम सब से दूर चला गया और मेरे बहनोई की अकाल मृत्यु ने हमारे जीने का नजरिया बदल दिया। सो हम ने भाई की याद में उसके नाम का 1999 में N.G.O खोला । जिसका नाम है ‘आशीष कुजारा मेमोरियल ट्रस्ट’। इस ट्रस्ट के द्वारा हम समाज के उन तबकों को मेडिकल और एडूकेशनल सहायता पहुंचाते है जो इसमें अक्षम है ।इसका काम मैं अपने परिवार के साथ देखती हूँ।
4)वर्तमान हिंदी कविता की भाषा और संवेदना के नये संदर्भों को किस तरह से देखती हैं ?

वर्तमान हिंदी कविता की भाषा और संवेदनओं के नये सन्दर्भ बहुआयामी है। एक तरह से काव्यान्दोलन काल है। आज की पीढ़ी ,आज के रचनाकार की आर्थिक, सामाजिक और संवेदनात्मक तौर पर स्वतंत्र सोच के है । हर काल के, हर समय के अलग तरीके के अंतर्द्वंद ,अंतर्विरोध, पीड़ा और आशाएँ होती हैं ।उनकी अपनी विशेषताएँ है । नयी संवेदनाएँ ,नयी चेतना,नयी भाव -भूमि, नए बिंब और नये शिल्प गढे़ जा रहे हैं। प्रेम कविताएँ , राजनीतिक, व्यंग ,सामाजिक यथार्थ हो या कोरी बयान बाजी ,हर क्षेत्र में और हर विधा में नये शब्द- संकेतों से लिखा जा रहा है। वर्तमान में सोशल मीडिया ने नए रचनाकारों को प्रस्फुटित होने में बहुत मदद की है । क्लासिक साहित्य भी पढ़ें जा रहे है।
5)झारखंड के सुरम्य प्राकृतिक परिवेश और आदिवासी जनजीवन के बारे में बताइए ?

झारखंड में खासकर राँची का प्राकृतिक परिवेश बहुत सुंदर, मनोरम है। मेरी दादी बताती थीं, जब वो आई थी तब राँची में पंखा भी नहीं होता था। सिर्फ 20 दिन के लिए गर्मी पड़ती थी और और उसमें भी अगर ज्यादा गर्मी पड़े शाम को बारिश होना निश्चित था। और मैं अपने बचपन की बात करूँ तो मुझे याद है हम भाई बहन मई-जून में भी हाफ स्वेटर हमेशा पहना करते थे। मुझे लगता है विकास के बाद भी, राँची का आज भी कई शहरों से ज्यादा खुशगवार प् प्ारकृतिक परिवेश है। एक यही कारण है कि राँची छोड़ने का कभी मन ही नहीं होता। प्रकृति से मिल कर रहना झारखंड के निवासियों की ख़ासियत है ।अब तो कोरोना ने भी बहुत अच्छी तरह ये समझा दिया है ।मिलनसार और सादगी पसंद है यहाँ के लोग।शिक्षा के क्षेत्र में भी पहले से बहुत अच्छी तरक़्क़ी की है।
यहाँ के जनजीवन की बात करूँ तो आदिवासी आबादी का वर्चस्व है। फिर भी हिंदू, ईसाई मुस्लिम और सिख समुदाय के भी अच्छी -खासी जनसंख्या है। बिल्कुल एक छोटा -सा मेट्रो है। नक्सलवाद और आए दिन बदलती सरकार ने बिहार से अलग हुए झारखंड को उस तरह से विकसित नहीं होने दिया जैसी उम्मीद की जा रही थी।लेकिन हम सब ने आशा नहीं छोड़ी है। कोरोना काल के बाद ऐसे भी बहुत -सी चीज़ें बदलने वाली हैं।