5 जून, विश्व पर्यावरण दिवस

 

बीते 19 जनवरी को पश्चिमी दिल्ली के जय विहार में जब ‘गणतंत्र दिवस उत्सव’ मनाया था, तब बच्चों में पर्यावरण थीम आधारित एक क्वीज प्रतियोगिता कराई थी। उसमें गणतंत्र दिवस के बहाने देश, समाज और पर्यावरण के प्रति जागरूकता फैलाने के उददेश्य से विषय रखा गया था-‘सांस लो और सांस लेने दो।’ तब इस मंच के माध्यम से राजधानी की सड़कों पर सरपट दौड़ती वाहनों के धुंए, शोर-शराबे और धूल के गुबार पर चर्चा हुई थी। पड़ोसी राज्यों में जलाए जाने वाले पराली की बात हुई थी, नदी-नाले, पहाड़, पानी की गंदगी और कचरे पर चिंतन किया था। मगर आज जब हम बदलाव की बात करते हैं तो ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ पर कोरोना संक्रमण के कारण हुए लाॅकडाउन के बाद प्रकृति में हुए बदलाव पर चर्चा करना भी लाजिमी है। इस महामारी के भय से अलग-थलग जीवन बिताना या घरों के अंदर कैद हो जाना, दूरी बनाकर रखना या मुंह ढंककर बाहर निकलने जैसे व्यवहार ने यह साबित कर दिया है कि वह मानवीय भूल ही रही होगी, जिसके कारण हम प्रदूषण संकट में आज तक घिरते जा रहे थे। प्रकृति में आए सकारात्मक बदलाव इसके प्रमाण हैं। जानलेवा कोरोना वायरस के कारण आज मजबूरी कहें या सावधानी, हम अपने प्रति बेहद सचेत होकर रह रहे हैं। पिछले दो महीने में हम किसी प्रकार से प्रकृति से छेड़छाड़ नहीं कर पाए, जिससे वह स्वतः संतुलित होती गई। हमें इससे सबक लेनी चाहिए। जरा सोचिए, लाॅकडाउन खत्म होने के पहले हवा कितनी शुद्ध हो गई, नदी-तालाब का पानी स्वच्छ हो गया। पेड़ों पर चिड़ियों की चहचहाहट लौट आईं। फूल खिलने लगे, पेड़-पौधे लहलहा उठे। जीव-जंतुओं में नई जान आ गई। प्राकृतिक छटा बदली तो हमारा जीवन भी बदलने लगा। बारिश की बूंदों, मिटटी की सौंधी महक और बादलों की सतरंगी छटा ने मन मोहना शुरू कर दिया। लाॅकडाउन के दौरान कल-कारखाने बंद रहे। सड़कों पर वाहनों का पहिया थम गया। उसर्के इंजनों से निकलने वाले रसायनिक खतरनाक तत्व भी नहीं फैले। अंधाधुंध जंगल की कटाई रूकी, मकानों के निर्बाध निर्माण रूके। नदी-नालों में बहाती गंदगी रूकी तो तालाब और नदियां भी खिलखिला उठीं। यह बदलाव वैश्विक तौर पर हुआ, क्योंकि पूरी दुनियां में कोरोना संक्रमण की वजह से क्रमशः लाॅकडाउन था। परिणाम जीव-जन्तु, जलचर एवं वायुमंडलीय स्वच्छता से आंका गया। करोड़ों रूपये खर्च करके जिस गंगा नदी की सफाई, सरकार जो अब तक न कर सकी, वह प्रकृति ने अपने आप कर दिखाया। 50 सालों में पहली बार गंगा खुद भगीरथ बन गई। कलियुग में जीवनदायिनी गंगा का यह नया अवतार हुआ है। गंगा स्वच्छ, निर्मल और अविरल हो उठी, और तो और यमुना नदी भी सजीव हो उठी। चिड़ियाघरों या जंगलों में पशुओं के मिजाज बदल गए। वह उनमुक्त, स्वस्थ और खुशहाल नजर आने लगे। ऐसे जलचर जिन्हें विलुप्तप्राय मान लिया गया था, वह भी अपने पुराने स्वरूप में दिखाई देने लगे। पहाड़ों में दुर्लभ फूल खिल गए, साफ हवा के कारण पंजाब से हिमालय दिखने लगा। ध्वनि प्रदूषण के कारण लोग बहरे होने लगे थे, उन्हें कुछ-कुछ सुनाई देने लगा। ये सारे बदलाव कोरोना की वजह से संभव हो सके। इन बदलावों की वजह से समाज में भी एक नए तरह का बदलाव देखा जा रहा है। लोगों के स्वभाव भी बदलते हुए दिखाई दे रहे हैं। कूड़े-कचरे फिलहाल नहीं जलाए जा रहे हैं, इसलिए हवा में प्रदूषण का स्तर घटा है। पाॅलिथीन के प्रयोग कम हुए हैं। जिसके कारण हम कह सकते हैं कि कोरोना महामारी के भय से मानवीय जीवन में अदभुत बदलाव आए हंै। इस बदलाव को हम वैश्विक बदलाव से जोड़कर देख सकते हैं। कई बार अब साफ आसमान और नीले रंग में देखने का अवसर पा रहे हैं। सड़कों पर दौड़ती-भागती अनावश्यक वाहनों के ठप होने पर पेट्राॅल, डीजल या गैस ईधनों की भी बचत हुई है। प्रदूषण के कम होने की वजह से निश्चित तौर पर लोगाों के सेहत में भी सुधार आए हैं। इसमें कतई संदेह नहीं कि कोरोना वायरस किसी गंदगी या प्रदूषण की वजह से नहीं फैली है बल्कि एक साजिश के तहत इसे फैलाई गई है। चीन पर उंगली उठाते कई देशों ने यह आपत्ति भी उठाई है। अगर यह सच है, तो इसे जघन्य अपराध की श्रेणी में गिना जाना चाहिए।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)