साक्षात्कार

राजस्थान के जोधपुर की कवयित्री तारा प्रजापत ‘ प्रीत ‘ की कविताओं में जीवन की सुंदर संवेदनाओं का समावेश है और इसमें प्रकट होने वाली जीवनानुभूतियाँ यथार्थ के अनेक रंगों को प्रकट करती हैं . प्रस्तुत है इनसे राजीव कुमार झा की बातचीत . . .

 प्रश्न1 तारा प्रजापत ‘ प्रीत ‘ जी . आपका अपने पोर्टल पर साक्षात्कार के इस कार्यक्रम में स्वागत है . आप हिंदी की प्रतिष्ठित कवयित्री हैं . कविता को समग्र कलाओं में सबसे श्रेष्ठ कला कहा गया है . एक समर्पित काव्य साधिका के रूप में कविता को इस रूप में आप किस तरह से देखती समझती रही हैं ?
 उतर कविता केवल शब्द संयोजन नहीं है,कविता कोई क़लम की उपज नहीं,कविता कहाँ नहीं है?कविता चिड़ियों के चहचहाने में हैं,कविता झरनों की कलकल में हैं,सुबह को सूरज की किरणें कविता करती है तो रात को चाँद की किरणें,पूरी प्रकृति कविता है,बस कोई कागज़ की धरती पर शब्दों के बीज बो देता है तो कविता की फ़सल लहलहाने लगती है।ह्रदय के भावों को लयबद्ध करना ही कविता है।अपने निराकार सपनों को साकार रूप देना कविता है।कविता अभिव्यक्ति का एक ऐसा स्रोत है जिसमें भावनाएं,सम्वेदनाएँ मूर्त रूप ले लेती है।कविता ह्रदय से निकली एक निर्मल सरिता है,जिसमें जीवन की लहरों को किनारा मिल जाता है।एक शब्द में कहूँ तो कविता मानव ह्रदय के उद्गार है।
प्रश्न 2 कविता के बारे में यह भी कहा जाता है कि मनुष्य के चिंतन मनन का सर्वोत्कृष्ट समाहार कविता में ही सदियों से प्रकट होता रहा है . इस दृष्टि से कविता के बारे में आपका क्या मत है ?
उतर कहते हैं,जहाँ न पहुँचे रवि वहाँ पहुँचे कवि।कवि के विचार मंथन से निकली सरस शब्द सरिता है कविता। कविता के माध्यम से कवि अपने ह्रदय में उमड़ती भावनाओं की लहरों को अभिव्यक्ति के किनारें देता है ।सदियों से कविता मानव ह्रदय के चिन्तन मनन का सशक्त माध्यम रहा है। वैसे कविता का इतिहास और दर्शन बहुत पुराना है। साहित्य में अनेकों विधाएं हैं, कविता लेखन भी एक विद्या है।कविता के कई तत्व बताये गए हैं। कविता के बारे में अनेक साहित्यकारों का अपना -अपना अलग मत है। वैसे नौ रसों के रंगों में डूबी भावों की तूलिका जब कागज़ के कैनवास पर चलती है,और फिर जो शब्द उभरते हैं,वो कविता नहीं तो और क्या है?कविता पाठक के ह्रदय में एक भावनात्मक प्रतिक्रिया उत्प्न्न करने वाली कल्पनाशील जागरूकता है।कविता कवि मन की कल्पनाओं को मूर्त रूप और उसके अनुभव को ठोस धरातल देती है।साहित्य दर्पणाकार विश्वनाथन के अनुसार ‘रसात्मक’ वाक्य ही काव्य है,रस अर्थात मनोवेगों का सुखद संचार ही कविता की आत्मा है। कवि ह्रदय में जब भावनात्मक दर्द होता है तो शब्दों की कोख़ से कविता का जन्म होता है। मौन के अधरों पर कई शब्द पलते हैं और जब ये शब्द मुखरित होते हैं, तो बन जाती है कविता।सरल शब्दों में कहूँ तो कविता कवि ह्रदय से निकले भावों के वो उद्गार है,जो पाठक के अन्तर्मन में अपनी गहरी छाप छोड़ देते हैं। गुलज़ार साहिब व अम्रता प्रीतम हमारे आदर्श कवि-कवियत्री हैं।कविता लिखी नहीं जाती,कविता का जन्म होता है।जब कवि ह्रदय में सम्वेदनाएँ जन्म लेती हैं, तो कविता अस्तित्व में आती है।।
प्रश्न 3 आपका काव्य लेखन से कब और कैसे लगाव कायम हुआ ? अपने बचपन घर परिवार और पढायी – लिखाई के बारे में बतायें ?
 उतर मेरा जन्म एक मध्यमवर्गीय साधारण परिवार में 1 जून 1957 को बीकानेर में एक रेल्वे के मकान में हुआ। मेरे पापा रेल्वे में ड्राईवर थे और माता एक गृहणी।मां पढ़ी-लिखी नहीं थी पर हम तीनों भाई-बहनों को उन्होंने पढ़ा-लिखा कर इस क़ाबिल बनाया की हम अपना जीवन व्यापन अच्छी तरह से कर सकें। तीनों भाई-बहनों में मैं सबसे छोटी थी ज़ाहिर है सभी का प्यार मुझे भरपूर मिला।मैंने कला-शास्त्र में स्नातक की डिग्री ली।एम.ए. प्रीवियस किया इस बीच मेरा विवाह हो गया,पढ़ाई बीच में ही छूट गयी।और मैं अपने ससुराल जोधपुर आ गयी।
जहाँ तक लेखन में लगाव की बात है,लेखन कार्य में हमारी रुचि बचपन से ही थी। बचपन में चहचहाती चिड़ियों, रंग-बिरंगी तितलियों को उड़ते हुए देख कर मन में कुछ कोमल-निर्मल भाव जागते,जिनको मैं काग़ज़ पर उतारने का प्रयास करती।कभी आकाश में अंगड़ाई लेते इंद्रधनुष के सात रंगों से अपनी लेखनी रंगती तो कभी बारिश की छम-छम करती बूंदों से अपनी भावनाओं की स्याही में लेखनी भिगोती। खेलते -कूदते कब बचपन पीछे छूट गया,पता ही नहीं चला। हमनें अपने लेखन को कभी गम्भीरता से नहीं लिया।पहली बार जब कॉलेज के सालाना उत्सव में मैंने अपनी कविता सुनाई तो, ख़ूब वाह वाही हुई। उस दिन पहली बार दिल को एक नया सा अहसास हुआ,और तब मैंने अनुभव किया कि मुझे अपने लेखन के इस शौक को गम्भीरता से लेना चाहिये।प्रकृति और संगीत से हमें बहुत प्यार है। रेडियो हम बचपन से लेकर आज तक सुनते हैं।मैंने अपनी कुछ रचनाएँ आकाशवाणी केंद्र को भेजी और वो सलेक्ट हो गयी,मैंने स्वयं उनका वाचन किया।उस समय 25 रु० मिले थे मेहनताना,जो मुझे 25 हज़ार की तरह प्रतीत हुए।इस तरह मेरी साहित्यक यात्रा का आरंभ हुआ।फिर तो हमनें बहुत सी डायरियां लिख-लिख कर भर दी,जैसे एक जुनून सा सवार हो गया।पर उचित मार्गदर्शन व सहयोग न मिलने के कारण हमारा ये शौक दम तोड़ने लगा।
इसी दौरान हमारा विवाह हो गया शादी के बाद घर-परिवार की जिम्दारियों के बीच मेरा लिखने-पढ़ने का क्रम टूट गया।और 20 वर्ष के लंबे अंतराल के बाद मेरे एक क़रीबी मित्र की सलाह पर मैंने एक बार फिर क़लम उठायी।और मेरी रचनाएँ वाट्सऐप,फ़ेसबुक, पत्र-पत्रिकाओं व आकाशवाणी से प्रकाशित व प्रसारित होने लगी। रतनलाल व्यास साहित्य एवं शैक्षणिक संस्था ( फलौदी)को मैंने 2018 में अपनी रचनाओं की पांडुलिपि भेजी और सौभाग्य से चयन समिति द्वारा वो प्रकाशन के लिये चयन कर ली गयी।मेरे सपनों को जैसे उड़ान मिल गयी। 2 सितम्बर 2018 को संस्था द्वारा मेरे पहले काव्य-संग्रह “प्रीत” का भव्य लोकार्पण हुआ। एक वर्ष के अंतराल के बाद 8 सितम्बर 2019 को मेरे दूसरे काव्य-संग्रह “मैं दौपदी नहीं” का विमोचन हुआ।और आज मैं जो कुछ भी हूँ आपके सामने हूँ।आप सभी के प्यार, सहयोग व सतगुरु की विशेष कृपा से जल्दी ही मेरा तीसरा काव्य-संग्रह प्रकाशित होने को है।बस हमेशा आपका प्यार व सहयोग बना रहें।।
 प्रश्न 4 अपने प्रिय लेखकों के बारे में बताइए ?
उतर जहाँ प्रिय लेखकों की बात आती है, तो क्या कोई लेखक अप्रिय भी हो सकता है?ऐसा तो कभी सोच भी नहीं सकते।माँ सरस्वती की जिस पर आपार कृपा होती है वही अपनी भावनाओं को शब्दों द्वारा अभिव्यक्ति का रूप दे सकता है। बचपन में स्कूल में हमने छायावादी कवयित्री महादेवी वर्मा,मैथलीशरण गुप्त,सुभद्राकुमारी चौहान,निराला आदि बहुत से साहित्यकारों की रचनाओं को पढ़ा, हिंदी मेरा प्रिय विषय था।
वैसे तो बहुत से रचनाकारों को पढ़ा है,और अपनी-अपनी ज़गह सभी सर्वश्रेष्ठ है। पसन्द अपनी-अपनी ख़्याल अपना।
जहाँ तक मेरे प्रिय लेखकों की बात है, तो मुझे साहित्य जगत में अपार लोकप्रिय लेखिका अमृता प्रीतम व मशहूर शायर, कवि व गीतकार गुलज़ार साहिब का लिखा साहित्य बेहद पसंद है। 1982 में ज्ञानपीठ से सम्मानित अमृता जी की कहानियों व कविताओं में नारी जीवन की पीड़ा,विडम्बना व विसंगतियों की झलक मिलती हैं। नारी ह्रदय में प्रेम व करुणा का जैसा चित्रण उन्होंने किया हैं,,आज तक कोई नहीं कर पाया। अमृता जी को पढ़कर ऐसा लगता है कि क्या कोई ऐसा भी सोच सकता है? उनकी कविता ‘ मैं तुझे फ़िर मिलूंगी’ को पढ़कर लगता है जैसे नायिका में अपने भावों को आशाओं के पंख दे दिए है ,जो ह्रदय के विशाल गगन पर उड़ान भर रही हो।उनकी एक और कविता”वसीयत” मैं उनकी करुणा उनका समाज के प्रति आक्रोश प्रकट होता है वो कहती है कि- मेरा प्यार मेरी करुणा सब बाँट देना और जो मेरा द्वेष,ईर्ष्या,झूठ, स्वार्थ उन्हें मेरे साथ ही जला देना।ऐसे ही इनकी की कई कविताएँ,जैसे धूप का टुकड़ा,रौशनी,ये अक्षर हमें बहुत प्रिय हैं ।’एक मुलाक़ात’कविता में उन्होंने रोमांस रेवियुलेशन के बारे में खुल कर लिखा है।इनकी कविताओं के साथ-साथ इनकी कहानियां भी काफ़ी लोकप्रिय हुई है,कहानी “जंगली बूटी”हमारी प्रिय कहानी है। “रशीदी टिकिट”इनकी आत्मकथा है। गुलज़ार साहिब किसी परिचय के मोहताज़ नहीं। बेहद संवेदनशील,नज़ाक़त व नर्मी से सरोबार है इनका साहित्य-संगह।
इनकी नज़्में, इनकी शायरी ज़िन्दगी के गूढ़ रहस्यों को खोलती है और जीवन में दार्शनिक व सकारात्मक विचारों को स्थापित करती है-
अज़ीब सा क़िस्सा है
दुनियां का भी,
कोई सब कुछ
बटोरने में लगा है
ख़ाली हाथ जाने के लिये।
इनकी ये पक्तियां जीवन की नश्वरता को दर्शाती हैं -‘इतना क्यों
सिखाये जा रही है ज़िन्दगी?
हमें कौनसी,
सदियां गुज़ारनी हैं।
उनकी एक और रचना-‘
क़िताबें झांकती हैं-
बन्द अलमारी के शीशों से
बड़ी हसरत से तकती हैं
अब मुलाक़ात नहीं होती। में गुलज़ार जी ने वैज्ञानिक युग में क़िताबों के घटते महत्व को दर्शाया है।
फ़िल्म जगत में भी इनकी एक अलग पहचान हैं। इनके गीतों में कविता का पुट नज़र आता है। इनका एक फ़िल्मी गीत-हम को मन की शक्ति देना, स्कूल में हम प्राथना के रूप में गाते थे।ऐसे महान साहित्यकार को ह्रदय से नमन।
प्रश्न5 कविता लेखन में परंपरावादी दृष्टि के अलावा आधुनिक स्वर के समन्वय से आने वाले बदलावों की रचनात्मकता को रेखांकित कीजिए ?
 उतर परिवर्तन प्रकृति का नियम है। हर क्षेत्र में परिवर्तन हुआ है,औरआगे भी होता रहेगा।साहित्य जगत में कविता लेखन में एक युग परिवर्तन हुआ है। कविता लेखन में आधुनिक स्वर के समन्वय से आये बदलाव छंदात्मकता की अस्वीकृति के आलोचकीय षड्यंत्र की परिणति कहे जा सकते हैं। समस्या यह है कि छंदात्मकता की अस्वीकृति जन-सामान्य द्वारा स्वीकृति ही नहीं पा सकी और आधुनिक काल का कोई भी छंदमुक्त महाकवि न तो जनसामान्य में अपनी कविताओं को लोकप्रिय करवा सका और न ही पाठकों या स्वयं कवि को भी ऐसी कोई कविता कण्ठस्थ हो पाई। भारतीय साहित्य, विशेषकर हिन्दी साहित्य में छंदात्मकता को विलुप्त कराने का अकादमीय तथा आलोचकीय षड्यंत्र विफल ही रहा है। आधुनिक स्वर के समन्वय से छन्दों में भी वैचारिक मतों का आगमन हुआ और आधुनिक छंदबद्ध कविता, जो लोकप्रिय भी हुई, उस पर वैचारिकता के तथा विभिन्न मतों, वादों तथा राजनीतिक प्रतिबद्धताओं का प्रभाव भी स्पष्ट नज़र आने लगा। इस कारण ही नवगीत, पारम्परिक गीतों से, दुष्यंतेत्तर काल की ग़ज़लें रिवायती ग़ज़लों से तथा नये दोहे आदि छंदों के संग्रह पुराने रहीम, कबीर आदि के दोहों से कथ्य के आधार पर अलग दिखते हैं और यह क्रम ज़ारी है।
 प्रश्न 6 राजस्थान की काव्य परंपरा में भाट चारण काव्य के प्रचलन के बारे में जानकारी दीजिए ?
 उतर राजस्थान की काव्य परंपरा में चारण व भाट जाति का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। चारण एवं भाट को अलग-अलग जाति में वर्गीकृत किया जा सकता है।चारण जाति में ब्राह्मण और राजपूत के गुणों का सामंजस्य मिलता है।पठन-पाठन तथा साहित्यक रचनाओं के कारण उनकी तुलना बाह्मणों से की जाती है।चारण लोग राजपूत जाति तथा राजकुल से सम्बंधित थे तथा शिक्षित थे।यद्ध के समय ये वीर रस की कविता लिखकर व गाकर योद्धाओं में शक्ति का संचार करतें थे।अजमेर के राजा पृथ्वीराज और गौरी के युद्ध के दौरान पृथ्वीराज ने कवि चन्द्रवरदाई की कविता के आधार पर शब्दभेदी तीर चला कर,उसे मौत के घाट उतार दिया।
चन्द्रवरदाई ने पृथ्वीराज पर ‘पृथ्वीराज रासो’ नाम का एक सम्पूर्ण ग्रन्थ लिख दिया।अपने शैक्षणिक ज्ञान के कारण वे राजस्थानी वात, ख्यात,और रासो साहित्य के लेखक रहें हैं। ये अधिकतर डिंगल व पिंगल भाषा में लिखतें थे।अपनी कुलदेवी करणीमाता के प्रति इनका पूर्ण समर्पण है।देशनोक बीकानेर में आज भी चारण जाति के भक्त अपनी कुलदेवी करणीमाता के मंदिर में श्रद्धा से आते है।चरण राजाओं के साथ चलते थे जो उनकी गाथा उनकी कहानियां,उनकी प्रशंसा किया करते थे।वहीं दूसरी तरफ़ भाट जाति के लोग जनसाधारण से सम्बंधित थे,अधिकतर पढ़े-लिखे कम होते थे।लालसयुक्त याचक प्रवर्ति ने उनकी प्रतिष्ठा को धूमिल कर दिया।शिक्षा की कमी के कारण व चारणों से अलग पीढ़ीनामा,वंशावली तथा कुर्सीनामा के संग्रहकर्ता बन गये चारण और भाटों को अपनी सेवा के बदले राजाओं की तरफ़ से राज्य व जागीरों से कर मुक्त भूमि,गाँव आदि प्राप्त होते थे।साहित्य जगत में आज चारण व भाटों के पारम्परिक लेखन की विद्या लुप्त प्रायः सी हो गयी है।
प्रश्न 7 कविता में प्रेमतत्व की मौजूदगी और जीवन में निरंतर इस स्वर के क्षरण के साथ कविता की दुनिया में भाव विचार के संकट पर अपने विचारों को प्रकट कीजिए ?
 उतर कविता मन के भावों का मंथन है।जब ह्रदय ही प्रेम से रिक्त है तो कविता में वो प्रेम तत्व कहाँ से आएगा?वर्तमान समय में परिवार कट रहें हैं,स्वार्थ बढ़ रहा है। कहीं आतंकवाद तो कहीं धर्म के नाम पर अराजकता,मनुष्य जीवन से मानवता का जैसे हास् होता जा रहा है।मनुष्य जीवन में नैतिक मूल्यों की भारी गिरावट आ रही है। ज़्यादातर लेखक भी इन्हीं विषयों को मुद्दा बना कर लिख रहें हैं,हम नहीं कहते कि इन विषयों पर नहीं लिखना चाहिये पर उससे हमारी मानवीय भावनायों को आघात नहीं पहुँचना चाहिये।प्रेम लिखा या कहा नहीं जाता,प्रेम तो एक भाव है,जिसे अनुभव किया जाता है।मीरा के ह्रदय में निर्मल प्रेम का स्रोत था तो,वो उनके पदों में भजनों में स्वतः ही बह निकला।वर्तमान में कवि प्रेम की कविताएँ लिख तो रहें हैं,पर जब स्वयं उनके जीवन में नीरसता है,ह्रदय प्रेम से रिक्त है तो, ऐसे में वो अपनी कविता द्वारा पाठक के ह्रदय को स्पर्श कैसे कर पाएंगे,?समकालीन कविता में भी अब जीवन की ही भाँति प्रेमतत्व की मौजूदगी के स्वर का निरंतर क्षरण होता दिखाई पड़ रहा है। आज के कविगण प्रेम व सौहार्द के स्थान पर भेदभाव तथा वैमनस्य को उजागर करती कविताएं अधिक लिख भी रहे हैं तथा सामान्य जन को तो छोड़िये, स्वयं कवियों में भी परस्पर प्रेम व सौहार्द के स्थान पर बैर तथा वैमनस्य सर्वत्र व्याप्त है। अपने-अपने गुटों, वादों और स्वार्थों द्वारा निर्मित खेमों के खूँटे से बँधे हुए कवियों की दृष्टि भी एकांगी व पक्षपाती होने से समस्त मानवता के लिये उपयोगी व अच्छी कविताएं भी कम ही रची जा रही हैं। यही वर्तमान में कविता की दुनिया में भाव विचार का सब से बड़ा संकट है।

प्रश्न 8 मीरा की कविता की चर्चा के संदर्भ में हिंदी कविता की लौकिक भूमि पर अध्यात्म की आभा को किस रूप में देखती हैं ?
उतर  राजस्थान का गौरव मीरा बाई,आज तक किसी भी काल में दूसरी मीरा नहीं हुई हैं।मीरा बाई ने अपने पदों में प्रेम व विरह के भावों को जिया हैं।उनके भजन उनके मुख से नहीं उनकी आत्मा से निकले हैं।मीरा बाई बचपन से ही भगवान कृष्ण को पति मानकर उनकी आराधना में मग्न रहती थी।विवाह के पश्चात भी मीरा ने भोजराज को पति के रूप में स्वीका नहीं किया,तभी तो मीरा ने लिखा दिया कि-मेरे तो गिरधर गोपाल,दूसरों न कोई।मीरा की रचनाएँ प्रेम,करुणा व विरह वेदना के भावों से सराबोर थी।मीराबाई की आध्यात्मिक कविता उन के जीवन में कृष्ण-भक्ति का चरमोत्कर्ष प्रस्तुत करती है। अपने आराध्य देव की आराधना वे अनुकूल तथा प्रतिकूल जीवन परिस्थितियों में समान रूप से करती रहती हैं और यही भक्ति उन के पदों में विविध रूप से अभिव्यक्त हुई है जो उन के जीवनकाल में ही उन की वाणी से मुखरित हो कर जन-जन का कण्ठहार बन गये थे। मीरा के अतिरिक्त किसी अन्य भक्त कवयित्री को अपने ही जीवन काल में ऐसी अपार लोकप्रियता नहीं मिली है। राजघराने का विरोध भी इसी अपार जन समर्थन से डर कर धीरे-धीरे शान्त पड़ता गया था। हिन्दी कविता की लौकिक भूमि पर अध्यात्म की आभा की चमक सब से प्रबल है और मीरा की कविता की आभा भी उस में किसी अन्य भक्त कवि से कम दैदीप्यमान नहीं है।
प्रश्न 9 आप राजस्थान की प्रमुख कवयित्रियों में हैं और कविता में नारी स्वर की सहजता और सार्थकता को किस तरह से प्रासंगिक महसूस करती हैं ?
 उतर साहित्य जगत में नारी के योगदान का मूल्यांकन करना हो तो,सम्भवतः आज नारी किसी से पीछे नहीं है।आज सभी क्षेत्रों में नारी ने पुरुष से साझेदारी निभाई है।महिलाओं में बढ़ती चेतना और जागरूकता ने उनकी पारम्परिक छवि को तोड़ा है।साहित्य में भी महिलाओं की भागीदारी जिस तेज़ी से हो रही है,उसे देखते हुए नारी अभिव्यक्ति की सामर्थ्य पर हैरान होने जैसी कोई बात नहीं रहेगी।आज़ादी की लड़ाई के समय जो स्वर साहित्य में उभरा,उसमें देशकाल परिस्थितियों और देश-प्रेम की अभव्यक्ति स्पष्ट लक्षित होती है।सुभद्रा कुमारी चौहान,महादेवी वर्मा,सरोजिनी नायडू आदि कई लेखिकाओं ने अपने समय को अभव्यक्ति दी और उनके सशक्त लेखन का योगदान हिंदी साहित्य को प्राप्त हुआ।पुरुष प्रधान समाज मे नारी को एक अबला का दर्ज़ा दिया गया,जो पुरुषों के इशारों पर नाचती थी।स्वतंत्रता के बाद नारी शिक्षा पर भी ज़ोर दिया जाने लगा। नारी घर से बाहर निकली और उसने धीरे-धीरे अपनी पारम्परिक छवि को तोड़ा।पुरूष के लिए यह एक चौकाने वाला विषय था कि नारी अभव्यक्ति मुखर हो सकती है और वह भी स्वयं नारी के संदर्भ में।नारी भावनाओं की यही अभव्यक्ति थी जो सदियों से भीतर ही भीतर छटपटा रही थी और आज नारी-लेखन में भी अभिव्यक्त हुई। ऐसा नहीं है कि पुरुष लेखक ने नारी के संदर्भ में कुछ लिखा न हो,बहुत कुछ लिखा है परंतु नारी ने नारी की पीड़ा को शब्द दीये, उसके जीवन की व्यथा कथा के भावो को मार्मिकता से कलमबद्ध किया।मन्नू भंडारी,उषा प्रियंवदा, शशिप्रभा शास्त्री का लेखन मानी अस्मिता की तलाश है।धीरे-धीरे सामाजिक,पारम्परिक मूल्यों के बीच पिसते नारी अस्तित्व ने लेखन क्षेत्र में नए मूल्य तलाशने आरम्भ कर दिये आज नारी अपने स्वतंत्र व्यक्तित्व की पहचान कर पाने में सक्षम है। समाज,देश व राष्ट्र में हुए किसी भी आंदोलन का प्रभाव किसी भी ज़िम्मेवार लेखक की लेखनी पर पड़ता है। आज नारी अपनी लेखनी द्वारा हर आंदोलन में पुरुषों के बराबर सक्रिय रूप से भाग ले रही है।आज नारी बड़े-बड़े आयोजित अंतर्राष्ट्री कवि सम्मेलनों में पुरुषों के बराबर हिस्सा ले रही है और ख्याति प्राप्त कर रही है।साहित्य में नारी का भविष्य उज्ज्वल व सुरिक्षत है

परिचय
नाम। – तारा प्रजापत ‘प्रीत’
जन्म तिथि – 1 जून 1957
जन्म स्थान -जोधपुर
शिक्षा – स्नातक
सम्प्रति – गृहणी एवं स्वतन्त्र लेखन
पुरस्कार-
1. आसुकवि स्व.रतनलाल व्यास साहित्य एवं शैक्षणिक संस्था फलौदी द्वारा 2/9/2018 में प्रकाशित व पारितोषित मेरा प्रथम काव्य संग्रह “प्रीत” को श्रेष्ठ साहित्य सृजन।
2. कवि चौपाल रत्न 2018 सम्मान
3. जी.डी. फाउंडेशन साहित्य रत्न सम्मान 12018
4. राष्ट्रीय कवि चौपाल द्वारा “राष्ट्रभाषा गोरवभाषा सम्मान-2019
5.अंतर्राष्ट्रीय साहित्य सम्मेलन मेरठ में Literary Festival Meerut में सम्मान 2019
6. 8 सितम्बर 1920 को मेरी दूसरी काव्य-कृति”मैं द्रौपदी नहीं” का विमोचन हुआ।

विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं व सांझा संकलन पुस्तकों में प्रकाशित रचनाएँ व आकाशवाणी द्वारा प्रसारित रचनाएँ।
सम्पर्क–
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