साक्षात्कार

 बिहार में वैशाली के जंदाहा की निवासी पूजा झा मूलत : मिथिला की हैं . इनका काव्य लेखन से बाल्यावस्था से ही लगाव रहा है . इनकी कविताओं में अपनी परंपरा के प्रति प्रेम का भाव और आधुनिक जीवन चेतना का भी समावेश है . प्रस्तुत है इनसे राजीव कुमार झा की बातचीत . . .
पूजा झा . आपका इंटरव्यू के इस कार्यक्रम में स्वागत है .
नमस्कार.आपके इस कार्यक्रम में आकर मुझे अपार खुशी की अनुभूति हो रही है।
आप मिथिला की हैं . यहाँ के साहित्य और संस्कृति की सारी दुनिया में पहचान है . आप इसके बारे में बताइए ?
 मिथिला मेरी जन्म भूमि है।मेरा जन्म दरभंगा जिले में हुआ। मैंने शुरू से ही अपने पिता को विद्यापति के गीतों को गाते सुना था।मिथिला के कण – कण में साहित्य की खुशबू रची बसी है।विद्यापति,उमाकांत उपाध्याय,लाल कवि, नंदीपती,विश्वनाथ झा,पंडित बलदेव मिश्र आदि साहित्यकारों ने तीन शताब्दियों तक पूर्वी भारत में मैथिल का सिक्का जमा दिया। मिथिला की मधुबनी पेंटिंग से आज पूरी दुनिया परिचित है ।
आप हिंदी की कवयित्री हैं . अपनी मातृभाषा मैथिली और इसके साहित्य की समृद्धि को रेखांकित कीजिए .
मैथिली भाषा विश्व की मधुरतम और समृद्ध भाषा है।मैथिली के साहित्यिक महत्व व विशाल क्षेत्र को देखते हुए इसे भारत के 22 मान्यता प्राप्त भाषाओं में शामिल किया गया था।मैथिली भाषा का इतिहास 700 वर्ष पुराना है। इन सात सदियों में विभिन्न अवस्थाओं से गुजरते हुए मैथिली भाषा आज विश्व की एक महत्वपूर्ण समृद्धशाली भाषा है। आपकी मातृभाषा मैथिली के इन कवियों के अलावा आपके मन प्राण को हिंदी के किन लेखकों – कवियों ने अनुप्राणित किया ? मुझे हिंदी कवियों में,सुमित्रानंदन पंत जी की कला और बूढ़ा चांद,हरिवंश राय बच्चन जी की मधुशाला,महादेवी वर्मा जी की निहार,नीरजा,पाठ के साथी,प्रेमचंद्र जी का गबन और दिनकर जी का कुरूक्षेत्र आदि रचनाएं बहुत पसंद हैं।
अपने पिता और परिवार के अन्य लोगों के साथ अपने राज्य और इसके बाहर कहाँ कहाँ घूमने का मौका मिला ?
चूंकि पिताजी का स्थानतरण होते रहता था तो पूरे परिवार को उनके साथ घूमने का मौका मिल जाता था।हमें गंगटोक,दार्जलिंग,नाथुला बॉर्डर,राजगीर,बरौनी,पटना आदि जगहों पर जाने का मौका मिला।
जीवन में आने वाले तमाम तरह के बदलावों के बीच अपने बचपन घर परिवार स्कूल कालेज को किस तरह याद करती हैं ?
आपका बीता हुआ कल ही सबसे सुखदाई पल होते हैं जिनमें आपका बचपन, लड़कपन, स्कूल का समय,मित्र ,आपका परिवार आदि आपको अपने सुख – दुख में हमेशा याद आते हैं।आज भी जब मैं अपने मित्रों से बातें करती हूं तो अक्सर पुरानी बातों को याद करती हूं कि हमलोग  साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है आज का साहित्य लेखन इस बात को कितना चरितार्थ कर पा रहा है ?
बिल्कुल,साहित्य समाज का दर्पण है।समाज जिस प्रकार का होगा साहित्य में उसी प्रकार परिभाषित होगा।समाज के रूप – रंग, उत्थान – पतन ,समृद्धि आदि का सही आईना साहित्य ही दिखता है।
 आपको संगीत से भी लगाव है . हमारी संस्कृति में संगीत की लय का समावेश किस तरह से है ?
गायन मानव के लिए स्वाभाविक है।संगीत वह गुण है जो प्रायः सभी में होती है,चाहे वो जैसा भी गाए।प्रकृति के हर एक कण में संगीत है।हमारा देश लोकगीतों का देश है।युवाओं में शहरीकरण और जीवनशैली में बदलाव होने के बावजूद भी संगीत की परम्परागत छवि कहीं ना कहीं आज भी विद्यमान है।लोग विशेष अवसर को मानने के लिए जब आज भी इकट्ठे होते हैं तो वे अपने घर,गांव और समाज के परम्परागत संगीत है लय पर आज भी थिरक लेते हैं।चाहे वो उनकी समझ में आ रहा हो या नहीं।हमारी संस्कृति की पहचान सबसे ज्यादा हमारे संगीत से ही है।
आपने निर्मला का जिक्र किया . आज के समाज में नारी जीवन की दशा में आने वाले बदलावों को इस संदर्म में किस तरह से रेखांकित करना चाहेंगी ?
आज के समय में नारी अब “निर्मला”नहीं।उसे अब उसके अधिकार दिए जा रहे।आज की नारी अपने स्तर से हर ऊंचाइयों को छूना चाहती है। नारी ने अब हर क्षेत्र में अपनी पहचान बना ली है।
जीवन में आने वाले तमाम तरह के बदलावों के बीच अपने बचपन घर परिवार स्कूल कालेज को किस तरह याद करती हैं ?
एक अध्यापिका होने के नाते अक्सर मेरा समय बच्चों के बीच बीतता है,उनको समझना ,उनके साथ समय बिताना मुझे बहुत आनन्द देता है।आज मैं अपने परिवार,स्कूल और लेखनी सभी को साथ लेकर चल रही तो पता ही नहीं चलता समय की उड़ान कितनी तेज़ गति से चल रही है।जब आप अपनी सारी सोची गईं चीजों को कर पा रहे तो उससे सुंदर और सार्थक जीवन में और कुछ नहीं। एक रचनाकार के रूप में जिंदगी को देखने की आदत हो जाती है।कभी- कभी ऐसा होता है जब हम मौखिक रूप से अपने मन की बातें औरों तक नहीं ले जा पाते ऐसे में लेखनी हमारे लिए एक अहम भूमिका अदा करती है।एक लेखक प्रकृति की नैसर्गिक सुंदरता ,सबकी पीड़ा और खुशी को जितना महसूस कर सकता है उतना कोई नहीं कर सकता।इसलिए लेखन से बड़ी कोई सुखद अनुभूति नहीं हो सकती।
एक लेखनी ही तो है जिसमें शुरू से ही लैंगिक असमानता रही ही भी।लैंगिक भेद भाव तो राजनीति,सामाजिक स्तर पर ही स्थापित है।
देश की ग्राम्यप्रधान संस्कृति और यहाँ के जन जीवन में आने वाले बदलावों को किस तरह से देखती हैं ?
इसमें कोई संदेह नहीं है कि ग्रामीण भारत की तस्वीर एवं तकदीर तेजी से बदल रही है। इसमें बुनियादी सुविधाओं के विकास का बहुत बड़ा योगदान है। सूचना और संचार प्रौद्योगिकी का विस्तार भी इसमें अहम भूमिका अदा कर रहा है। देश के गाँवों में रहने वाले लोग विकास की और तेजी से आगे बढ़ रहे। ग्राम्य जीवन हमारी भारतीय सभ्यता और संस्कृति की पहचान है। यह हमारी गहन सूझ-बुझ के आधार पर व्यवस्था-निर्माण करने की क्षमता की परिचायक है। अभाव के बावजूद ग्रामीण परिवेश में रहने वाले लोगों ने ना ही अपने स्तर को ऊंचा किया बल्कि अपनी सभ्यता और संस्कृति को भी संभाले रखा।
मिथिला धर्म अध्यात्म और कर्म की भूमि है . इस संदर्भ में जय मिथिला जय मैथिली के साथ क्या कुछ और कहना चाहती हैं ?
मैंने जितना अपने मिथिला को देखा है,पाया है कि मिथिलावासियों ने अपनी सभ्यता और संस्कृति की धरोहर को आज भी संभाले रखा है।सुख – सुविधा मिल पाने के बावजूद भी वो अपनी संस्कृति की विरासत को संभाले हैं और उसे आगे बढ़ाने में लगे हैं।ऐसे ही सभी को अपनी संस्कृति का सम्मान करना चाहिए और आधुनिकीकरण में भी अपनी ज़मीन से जुड़े रहना चाहिए।
 इस प्रसंग में वर्तमान हिंदी लेखन में नारीवाद को किस तरह देखती हैं ?
एक लेखनी ही तो है जिसमें  शुरू से ही लैंगिक असमानता रही ही भी।लैंगिक भेद भाव तो राजनीति,सामाजिक स्तर पर ही स्थापित है।
कविता लेखन के अलावा आपकी रुचि और किन कलात्मक कार्यों में है ? अपनी देखी कुछ यादगार फिल्मों के बारे में बताएँ ?
मुझे मुगल – ए – आज़म ,बैजू बावरा ,नीलकमल,जब वी मेट ,हम आपके हैं कौन,नदिया के पार आदि फिल्में बहुत पसंद है
आजकल के सिनेमा में काफी बदलाव आया है . इसकी सकारात्मक नकारात्मक बातों का उल्लेख करें .
आजकल के सिनेमा में परिवारवाद को अनदेखा किया जा रहा।कहीं ना कहीं ये परिवार के जुड़ाव के लिए आवश्यक है।पहले के सिनेमा को हम साथ बैठकर जब परिवार के बीच देखते थे तो उसका आनंद ही कुछ और था।अब सिनेमा देखते वक़्त वो एहसास और आनंद नहीं आता।कहीं ना कहीं हमारे समाज में अच्छे या बुरे परिवर्तनों का कारण सिनेमा भी है जिसका सकारात्मक प्रभाव युवा पर कम नकारात्मक प्रभाव ज्यादा पड़ रहा।
आपको अपना शहर दरभंगा कैसा प्रतीत है ? मिथिला के केन्द्र में स्थित इस शहर की विशेषताओं को किस तरह याद करती हैं ?
दरभंगा बागमती के किनारे बसा हुआ है।दरभंगा जिले का श्यामा माई मंदिर बहुत ही प्रसिद्ध है।कहा जाता है कि इसे शमशान में राजा रामेश्वर सिंह की चिता के ऊपर बनाया गया है।इस मंदिर में हजारों श्रद्धालु आते है,कई मांगलिक कार्य होते हैं।यहां के लोग बहुत ही सरल है।
आपका विवाह वैशाली में हुआ है . इस ऐतिहासिक अँचल की गरिमा के बारे में बताएँ ?
वैशाली जिले को को विश्व के प्रथम गणतंत्र होने का गौरव प्राप्त है।इसकी ऐतिहासिक पृष्टभूमि बहुत गरिमापूर्ण है।वैशाली जिला भगवान महावीर की जन्मभूमि होने के कारण जैन धर्म वालों के लिए पवित्र नगरी है।इस भूमि पर भगवान बुद्ध का तीन बार आगमन हुआ था।भगवान बुद्ध ने अपना आखिरी प्रवचन यहीं दिया था।
मिथिला सीता की जन्मभूमि है . भारतीय संस्कृति में सीता को नारी जीवन की गरिमा का प्रतीक माना जाता है . इस बारे में अपने विचारों को प्रकट कीजिए .
मिथिला को सीता की जन्मभूमि होने का गौरव प्राप्त है।आज भी कहीं भारतीय नारी के त्याग और पतिव्रत धर्म की बात आती है तो सीता माता का नाम सर्वप्रथम लिया जाता है।

 पूजा झा,जन्म – 21 मई 1987
शिक्षा – हिंदी एम. ए .
विगत दो वर्षों से काव्य लेखन में प्रवृत।
आजकल – विजय दर्पण टाइम्स,ग्राम पोटल न्यूज एवम् शाश्वत सृजन समाचार पत्रों में कविताओं एवम् ग़ज़ल का प्रकाशन।
वर्तमान में – बेस्ट मॉडल पब्लिक स्कूल,लोमा (जंदाहा)वैशाली में अध्यापन।
निवास – नाडीकला,जंदाहा