मेरी कविताएँ हैं . . . राजीव कुमार झा

कवि परिचय । राजीव कुमार झा . जन्म 8 .07 . 1971 . शिक्षा . एम . ए . मास कम्युनिकेशन . रेडियो – टेलिविजन पत्रकारिता में लेखन का कार्य । स्वतंत्र रूप से अखबारों में लेखन । हाल में पोर्टल लेखन में भी सक्रिय . हिंदी की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में कविताओं का प्रकाशन . वर्तमान में बिहार के लखीसराय जिले के बड़हिया स्थित इंदुपुर में निवास . . . ई मेल rajeevkumarjha 294 @ gmail .com

पहाड़ के पीछे

इस सुंदर बाग के एकांत में . . . रंगबिरंगी लताएँ . .यह हरा भरा झुरपुट . . .पेड़ों की छाँव में बैठे युगल प्रेमी . . . यहाँ कितना सुकून है . . . हवा की आहट . . . बाहर सड़क का सन्नाटा . . काफी दिनों के बाद तुम्हारा आना . . साँझ के झुटपुटे में . .घर लौट जाना . ..रात कितनी सुंदर है .. . आकाश खुशियों से भरा .. सितारों की . . . झिलमिल रोशनी में . . नदी का किनारा . . . पहाड़ के पीछे जंगल . .सुबह धूप में डूब गये . . . . . . . राजीव कुमार झा

रजत रागिनी

तुम बेहद सुंदर हो . ओ रजत रागिनी . . . तुम्हें देखकर फूल आज हँसते हैं . . . सुबह के सरोवर में . . . तुमने सखियों संग . . . किलोल करते . . . रात्रि की मादकता से . . . धूप को सराबोर कर दिया . . . आज धरती ने सारा धन धान्य . . . खेतों में बिखेर दिया है . . . यौवन के दिन . . अब अकेले कहाँ बीत जाते . . .सचमुच किसी नदी के किनारे . . . सुबह रीते हाथ आते . . . प्रेम का पावन जल . . . मन में भर कर लाते . . . .हर्षित है तन मन हमारा . . .किसका यह संग सहारा . . . सबके चेहरे पर हो मृदु मुस्कान तुम्हारा . . . . . . राजीव कुमार झा

नदी के किनारे

ओ साँवरी तुम देर रात तक . . . .चांद की रोशनी में . . . नदी के किनारे . . . . विचरती रही . . सितारों से भरा आकाश . . . . तुमको देखता रहा . . . सुबह पहाड़ के किनारे . . . तुमको किसने . . . धूप के बारे में कुछ कहा . . . . सचमुच तुम्हारे पास में . . . . किसी के मन का उछाल . . . समाया रह गया . . . यहाँ अब सुंदर सारी दिशाएँ . . . मन की अशेष वासनाएँ . . . . आज धूल से सुरभित कहाँ संसार है . . . .यह अकेली किसी नदी का निर्मल प्यार है . . . . . . . . राजीव कुमार झा

तारों की बारात में

बेहद सीधे सादे रास्ते पर . . . सुबह में हम अकेले चल पड़े . . . अब धूप तीखी हो गयी . . . काफी साल पहले कभी इस रास्ते से गुजरा . . . कितने छायादार पेड़ यहाँ खड़े थे . . . . किस आँधी में वे गिर पड़े . . . सड़कें कितनी चौड़ी हो गयीं . . . फर्राटे से चार चार मोटरें . . . आगे पीछे आती तेजी से कितनी दूर जाकर . . . कहां चली जाती हैं . . . ओझल हो रहे हैं खेत और गाँव . .अब मिट रहे खेतों में पुरखों के पगचिह्न . . . . हम अपने घर लौट आयेंगे . . . कितनी दूर जाएँगे . . . पीने के लिए कितना पानी . . . बोतलों में भरकर लायेंगे . . . तारों की बारात में . . . सचमुच रात सूनी है . . . . . . . . . . . राजीव कुमार झा