कविता में नारी मन और उसके सहज प्रवाह का समावेश

राजीव कुमार झा

  सुपरिचित कवयित्री रंजना फतेपुरकर की कविताओं में नारी जीवन के नये पुराने स्वरों का समावेश सहजता से होता दिखायी देता है . जीवन के सुविस्तीर्ण आँगन में प्रेम को कविता के मूल भाव के रूप में स्थित माना जाता है और इस जीवन स्वर के स्रोत के रूप में नारी मन और उसके प्रवाह की विवेचना की जाती है . सचमुच कविता में प्रेम के समावेश से ही आत्मा का स्वर भी झंकृत होता है और काव्य हमारे मन प्राण का एक हिस्सा बनता प्रतीत होता है . इस प्रसंग में किसी संवेदनशील कवयित्री के रूप में रंजना फतेपुरकर के कविता संग्रह ‘ महकते गुलाब ‘ में संकलित कविताओं को पढना प्रीतिकर अनुभूति के समान है . इसमें नारी मन के सारे भाव विचार किसी सीपी में मोतियों की तरह से सुरभित होते सबको अभिभूत करते हैं .’ कभी मोगरे की महक बनकर . कभी साँझ का गुलाल बन . इस खूबसूरत सी दुनिया में . अगर तुम मिले न होते . ये हसरतें अधूरी ही रहतीं . अगर मंजिल की तलाश में . तुम संग – संग चले न होते . साँसों की रुनझुन ताल में . झरनो से झरते राग में . बूँदों की रिमझिम बारिश में . अगर तुम भीगे न होते . ये गीत अधूरे ही रहते . अगर तुम्हारे बोलों पर सुर . संग – संग सजाए न होते . कभी पलकों में ख्वाब बन . कभी शबनम में नूर बन . चाँदनी रातों में . वादे निभाए ना होते . ये जिदगी खामोश ही रहती . अगर मधुर गीत . संग – संग गुनगुनाए ना होते . . . ( साँझ का गुलाब )जिंदगी के तमाम रंग इस संग्रह की कविताओं के कैनवास पर बिखरे सजे हैं . इनमें रिश्तों के अपनापन यादों के रुपहले दोपहर किसी के इंतजार के साये में सुनायी देने वाली गुफ्तगू और आँखों में बेपनाह मुहब्बत को समेटे गुलाबी अफसानों के साथ बारिश की बूँदों से भीगते मन की आहट कवयित्री के मन से संसार की हर दूरी को करीब सी लाती दिखायी देती है . इन कविताओं में रात की पसरी वीरानगी में दिन के उजाले में सफर की कहानी कविता के पाठ को प्रामाणिक रूप देते हैं . इस संग्रह की कविताओं की शिल्प शैली पर उर्दू प्रेम कविताओं का गहरा प्रभाव दिखायी देता है और प्रेम के सच्चे जीवन रंगों से इनमें मन की सारी खुशियों को उँड़ेला गया है . इनमें नारी मन का सरल – निश्छल – आत्मीय जीवन संसार की हलचल किसी पावन जलधारा कल कल बहते स्वर के समान सुनायी देता है और यहाँ कविता अपने व्यक्त – अव्यक्त भावभूमि पर एक सघन – विरल जीवन संसार के अक्स को प्रकट करती कहीं किसी तलाश में दूर बढ़ती नजर आती है . जीवन में प्रेम के साथ समर्पण का भाव भी जुड़ा है और इस संदर्भ में इन कविताओं में निस्सीम के साथ असीम और प्राप्य के साथ अप्राप्य का द्वंद्व किसी सान्निध्यता की विवेचना के साथ प्रेम के लौकिक परिदृश्य की व्याख्या से अवगत कराता है . प्रेम इन कविताओं में अपने आध्यात्मिक रंगों की आभा को लेकर प्रकट होता है इसलिए सांसारिक धरातल पर इन कविताओं की विचारभूमि को तलाशना आसान नहीं है .रंजना फतेपुरकर की कविताएँ अपने यथार्थ में जीवन के रोमांस के साथ इसकी तमाम रंगतों को प्रमाण के रूप में प्रकट करती हैं . इसलिए इन कविताओं को सच्चे अर्थों में जीवनधर्मी कविताओं की कोटि में रखना समीचीन होगा और अपने आत्म को सदैव संबोधित कवयित्री का काव्य स्वर सदैव जीवन यात्रा में किसी प्रतीक्षा – प्रस्थान की उत्कंठा के साथ मिलन के हर्ष और उसके रोमांच के साथ आकंठ निमग्न सबको अपने पास बुलाता प्रतीत होता है . कविता के विमर्श में अक्सर रस की चर्चा होती है और इस दृष्टि से इन कविताओं के अर्थ और मर्म को जानना – समझना आसान नहीं होगा . इनमें रात के आकाश में चाँद सितारों और बादलों के साये में सुबह के सिहरते मन पर जमी यादों के शबनम में समाये रूपक कवयित्री की जीवन यात्रा के अनेक सुख – दुख के संदर्भों को साकार करते हैं और प्रकृति के नैसर्गिक सौंदर्य के साथ हमारी चेतना को एकाकार करके जीवन से विविध स्तरों पर जीवंत संवाद करते किसी खामोश सफर के जाने अनजाने रास्तों को निरंतर गढ़ता – बुनता दिखायी देता है .रंजना फतेपुरकर की कविताएँ वैयक्तिक भावबोध की रचनाओं के रूप में भी देखी जा सकती हैं लेकिन इनकी अर्थयोजना को कविता की सिर्फ इसी विषय विधान के आसपास देखना पर्याप्त नहीं होगा . इनमें नारी के मनोलोक की गहरी अभिव्यक्ति समाहित है और अपने प्रकृत भावबोध में यहाँ वह अपने आत्मीय उद्गारों के माध्यम से अपने सहज़ जीवन संसार को सँवारने में तल्लीन है .रंजना फतेपुरकर की कविताएँ अपने यथार्थ में जीवन के रोमांस के साथ इसकी तमाम रंगतों को प्रमाण के रूप में प्रकट करती हैं . इसलिए इन कविताओं को सच्चे अर्थों में जीवनधर्मी कविताओं की कोटि में रखना समीचीन होगा और अपने आत्म को सदैव संबोधित कवयित्री का काव्य स्वर सदैव जीवन यात्रा में किसी प्रतीक्षा – प्रस्थान की उत्कंठा के साथ मिलन के हर्ष और उसके रोमांच के साथ आकंठ निमग्न सबको अपने पास बुलाता प्रतीत होता है . कविता के विमर्श में अक्सर रस की चर्चा होती है और इस दृष्टि से इन कविताओं के अर्थ और मर्म को जानना – समझना आसान नहीं होगा . इनमें रात के आकाश में चाँद सितारों और बादलों के साये में सुबह के सिहरते मन पर जमी यादों के शबनम में समाये रूपक कवयित्री की जीवन यात्रा के अनेक सुख – दुख के संदर्भों को साकार करते हैं और प्रकृति के नैसर्गिक सौंदर्य के साथ हमारी चेतना को एकाकार करके जीवन से विविध स्तरों पर जीवंत संवाद करते किसी खामोश सफर के जाने अनजाने रास्तों को निरंतर गढ़ता – बुनता दिखायी देता है .’ मेरे ख्वाबों में तुम खुशनुमा रंग . इबादत का भर देते हो . चाहत के खूबसूरत तोहफों संग . हसरतों को पनाह दे देते हो . तुम्हारे बिना रोशनी का हर रंग बेनूर है . तभी तो जिधर देखती हुँ . उधर तुम ही तुम नजर आते हो ( खुशनुमा रंग )प्रेम के उजास में इसके गहन स्वर में गहरी स्मृति के साथ कवयित्री के सच्चे मन की तलछट से फूटे उसके इन उद्गारों में प्रणय के बोल बेहद आत्मीयता से फूटते प्रतीत प्रतीत होते हैं और इसे इस संग्रह की तमाम कविताओं की भाव भंगिमा की खास पहचान के रूप में देखा जाना चाहिए और यहाँ कवयित्री के जीवन का अन्तर्बाह्य सर्वत्र आत्मा के पवित्र रंग से एकमेक होता जीवन साधना के पवित्र राग से मंत्रमुग्ध करता सुनायी देता है . इन कविताओं में रहस्यवाद का अस्फुट स्वर समाया है और कवयित्री की कामना में उसके अनगिनत खुशियाँ सुबह के किरनों की तरह से आलोकित होती हैं -जीवन के सारे लय को अपने मन के उल्लास और उछाह में समेटती रंजना फतेपुरकर की कविताएँ उल्लास उमंग के मनोभावों को सजीवता और जीवंतता से उकेरती हैं और इनमें फागुनी हवा के साथ बारिश के बूँदों की सरगम भँवरों की गुनगुनाहट के साथ गुनगुनी धूप में गुलमोहर का साया किसी झील में खिलती कमलिनी से सुबह में धरती के जिस आँचल की सुंदरता का बयान करती है इन कविताओं में प्रेम के इसी पहर की तस्वीर समायी है : तुम रंग भरे कजरारे बादल हो . जी भर बरसना चाहते हो . आज बहके महके इस मौसम में . सांवली सलोनी धरती को . जी भर भिगोना चाहते हो . ‘ ( सांवली सलोनी धरती )