पुस्तक समीक्षा

पुस्तक का नाम : सहस्राब्दी के घाट पर ( कविता संग्रह ) कवि : जितेन साहू . प्रकाशक : सारंग प्रकाशन . बालाजीपुरम , मथुरा (उत्तर प्रदेश ) मूल्य : 80 रुपये

 कवि का परिचय : जितेन साहू . शिक्षा : कला स्नातक . इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय , खैरागढ । केद्रीय विद्यालय , बस्तर में अध्यापक । देश के कुछ नगरों में एकल तथा समूह चित्र प्रदर्शनी । कला के बहाने तथा छत्तीसगढ आखर पत्रिका का संपादन ।
छत्तीसगढ के कवि जितेंद्र साहू के कविता संग्रह ‘ सहस्राब्दी के घाट पर ‘ कविता में लोक जीवन के सौंदर्य को जीवंतता से समेटती है और सहजता से जीवन के आत्मीय संस्पर्शों को कथ्य के धरातल पर प्रस्तुत करती है . इन कविताओं में कवि जीवन को निरंतर निहारता देखता हुआ उसे कविता के रचनात्मक धरातल पर सदैव रचता हुआ भी दिखायी देता है और इस तरह कविता में अनुभूति की दृष्टि से इस संग्रह की कविताएँ पठनीय हैं . जितेंद्र साहू की कविताओं में मानव मन की सुनायी देने वाली आहटें इनमें दिखाई देने वाले जीवंत बिंबों के माध्यम से अपने परिवेश के भीतर मौजूद हरेक चीज के अनेक अर्थों के आवरण से अक्सर कुछ ऐसे सार्थक भावों और विचारों को प्रस्तुत करती हैं जिनमें समाज में मनुष्य जीवन के नये पुराने प्रसंगों के साथ इसके चतुर्दिक फैले सुख – दुख की तमाम बातों का आत्मीय समावेश इन कविताओं को यथार्थ की रंगत से सँवारता प्रतीत होता है . समाज में आम आदमी के जीवन के संघर्ष को कवि खास तौर पर इस दौरान चिह्नित करता दिखायी देता है और इनकी विषयवस्तु में जीवन के राग विराग को वैयक्तिक – सामाजिक संदर्भों में समान रूप से देखा समझा गया है . ‘ जब तक बचा रहेगा . स्त्री के स्तन में दूध . और चिड़िया की चोंच में दाने की गंध . तब तक खत्म नहीं होगी . पृथ्वी पर से . हरे पत्ते और नीले जल की संभावना ‘ ( संभावना )
अपनी सर्जना की नैसर्गिक भावभूमि पर कविता जीवन के बनावटी रंगरूप और इसके आडंबर के ताने बाने से स्वभावत : दूर दिखायी देती है और इस नजरिये से इन कविताओं को पढना जरूरी होगा जितेंद्र साहु की कविताओं में अपने समाज – परिवेश और जीवन की जड़ों को तलाशने की कोशिश दिखायी देती है और कविता की दुनिया में फैले शब्दों के झूठे वाग्जाल से बाहर कवि इन कविताओं में समाज में बेहद सीधे सादे सामान्य सरल लोगों की जीवन कथा के माध्यम से वर्तमान जीवन के अनेक विरोधाभासों विडंबनाओं का बयान भी कविता में दर्ज करके अपनी संवेदना को चिंतन के धरातल पर प्रतिष्ठित करता है .कविता में अक्सर जीवन के वैयक्तिक सरोकारों के साथ समाज और परिवेश से जुड़ी अनुभूतियों को भी कवि समान रूप से समेटता है तो उसमें प्रकट होने वाले अर्थों का दायरा व्यापक हो जाता है . इस बात को जितेंद्र साहू की कविताएँ खास तौर पर जाहिर करती हैं . अपने कविता संग्रह ‘ सहस्राब्दी के घाट पर ‘ में संकलित कविताओं में उन्होंने छत्तीसगढ के ग्राम्य कस्बाई परिवेश के जन जीवन से जुड़ी सुख दुख की बातों को निकटता से रेखांकित किया है ‘ दूर घने जंगलों में . जहाँ सरसराती हवा . सन्नाटे को तोड़ती है . उबड़खाबड़ पथरीली पगडंडियां . इन जंगलों को चूमती हैं . अपनी बाँहों में ले . झुरमुटों के बीच . छींद छप्परों के घर . दे जाती है . आदिम महक . आदिम महक . पहाड़ों पर भी . पदचिह्न बना जाती है . ‘ ( बस्तर – चार कविताएं ).हिंदी कविता में जनपदीय जीवन चेतना और उस दृष्टि से कविता में लोक जीवन के चित्रण के संदर्भ में इस संग्रह की कविताओं को उल्लेखनीय कहा जा सकता है . कविता में आम जन के जीवन के सुख – दुख के समावेश को अगर सच्चाई से अगर जानना समझना हो तो इस संग्रह की कविताएँ प्रमाण कही जा सकती हैं .’ कुरेधिंन , तीजा हांडिन . लौट रही है बाजार से . बेचकर कोदों , कुटली ,आमली , चापड़ा . खरीद कर . नून , तेल , टिकली – फुंदरी . डोलता है पेट कुरेघिन का . वह खुश है . बेटी होगी . ‘ विहाव ‘ में तिलक लायेगी . खोड़ेया खुश है . बेटा होगा . पियेंगे संग साथ सल्फी लांदा . महाजन खुश है . मिल जाएगा और एक चाकर उसे । ‘ ( बस्तर – चार कविताएँ )जितेन्द्र साहू की कविताओं के केन्द्र में मनुष्य के जीवन की विवेचना है और इनमें विषयवस्तु के रूप में समाज के मौजूदा परिवेश से जुड़ी बातों को समेटा गया है . यह गौरतलब है कि इन कविताओं में औरतें – लड़कियाँ और बच्चे खास तौर पर नये जीवन की आहट के रूप में दस्तक देते हैं और यहाँ कविताओं में सिमटने और उभरने वाले अन्य बिंब जीवन के अन्य कार्य व्यापारों की विवेचना से इसके अर्थ विस्तार में सहायक बनते हैं . इसके अलावा प्रकृति के बिंब भी कवि की काव्य योजना में जीवन के अर्थों को कविता में सँजोने में कवि के कथ्य को विस्तार और गहराई देते हैं . ग’ जब तक बचा रहेगा . स्त्री के स्तन में दूध . और चिड़िया की चोंच में दाने की गंध . तब तक खत्म नहीं होगी . पृथ्वी पर से . हरे पत्ते और नीले जल की संभावना ‘ ( संभावना )कविता के गहन आकाश में जिदगी के सच और झूठ को रेखांकित करती ये कविताएँ विविध संदर्भों में समाज के अनेक संकटों का बयान करती हैं . इनमें उपभोक्तावाद के घेरे में आदमी की आत्मा को घेरता जीवन में व्यवहार के आडंबर के निरंतर फैलते धुंध में विलीन होते मानवीय प्रेम और इसकी त्रासदी के साथ मनुष्य के भटकाव की समग्र कथा को खास तौर पर यहाँ देखा और पढा जा सकता है .’ जब उससे . पहली बार मिला . तो लगा . उसका कद कुतुब है . दूसरी बार मिला . तो लगा . उसका कद कुछ छोटा गया है . तीसरी बार मिला . तो लगा . हो गया हुँ मैं . ठीक उसके कद के बराबर . चौथी बार मिला . तो लगा . वह तो बौना है . कुछ भी नहीं है उसके पास . सिवाय आचरण के . ( पहचान )कविता में मनुष्य के मन के लिए सच्चे प्रेम को सबसे सार्थक बताने वाली जितेन्द्र साहू की कविताओं में मनुष्य के मन को विस्मृति से घेरते समय में स्मृति जीवन और संबंधों के लिए स्मृति सबसे जरूरी तत्व महसूस होता है और यह अकारण नहीं है कि इनकी अनेक कविताओं में कभी साथ नहीं छोड़ते लोगों के अलावा बारंबार जीवन के आवरण में अपने व्यवहार को बदलने वाले लोग भी शामिल दिखायी देते हैं .’ कुछ तुम भूलो . कुछ हम . अँजुरि भर सपना . थाल भर मिट्टी . कुछ द्वेष तुम भूलो . कुछ राग हम . अँजुरि भर सपना . थाल भर मिट्टी .गढें साथ – साथ नया . जैसे गढ गया . परमात्मा हमें ‘ ( गढे कुछ )                  समीक्षक : राजीव कुमार झा . ह्वाटस अप 8102180299