गुरु पूर्णिमा महर्षि वेद व्यास का जन्मदिन है

हमारे देश में गुरु पूर्णिमा का त्योहार सारे देश में श्रद्धा और आस्था से मनाया जाता है । इसी दिन महर्षि वेद व्यास का जन्म हुआ था . वेद व्यास के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने चार वेदों के अलावा अठारह पुराण और महाभारत की रचना की थी . भारत की संस्कृति – धर्म और समाज पर इन ग्रंथों का सदियों से गहरा प्रभाव रहा है . वेदों को संसार के सबसे प्राचीनतम ग्रंथ के रूप में देखा जाता है और यूरोप के प्रसिद्ध विद्वान मैक्समूलर ने इनमें समाहित चिंतन को संसार का सुंदर चिंतन कहा है . संसार के सारे धर्मों पर वेदों का और खासकर ऋग्वेद का गहरा प्रभाव रहा है . इनमें एकेश्ववाद और आत्मा की अनश्वरता के अलावा जीवन में सतत् संधान और साधना के दर्शन का समावेश है . वेद व्यास इस प्रकार हमारे देश की काव्य और दर्शन की परंपरा के सच्चे पुरोधा हैं और भारतीय आचार विचार जीवन दृष्टि और चेतना के सर्जक हैं . गुरु पूर्णिमा के दिन उनका स्मरण पुण्यप्रद है . उन्हें महाभारत का भी रचयिता कहा गया है . रामायण के अलावा महाभारत को भी महाकाव्य कहा जाता है और धर्म – अधर्म के अलावा नीति – अनीति पाप – पुण्य के साथ जीवन के तमाम आयामों को जय विजय के उदात्त भावों के साथ इस महाकाव्य में प्रस्तुत किया गया है . हमारे देश की चिंतन परंपरा में वेद व्यास को इस प्रकार समाज और संस्कृति का सबसे महान व्याख्याकार कहा जा सकता है . गुरु पूर्णिमा के दिन उनका स्मरण और सम्मान सबका धर्म है ।

भारतीय जीवन परंपरा में ज्ञान को सर्वोपरि स्थान प्राप्त है और यहाँ अज्ञान को संसार के समस्त दुखों का कारण कहा गया है . भारत को एक देश के रूप में संसार का जगतगुरु भी कहा जाता है . गुरु पूर्णिमा के दिन महर्षि वेद व्यास का जन्म हुआ था और उन्हें यहाँ वेदों के रचयिता के रूप में देखा जाता है . वेद ज्ञान की गरिमा के प्राचीनतम स्रोत ग्रंथ हैं . भारतीय समाज संस्कृति में गुरु को ब्रह्मा – विष्णु और महेश के समान कहा गया है और वेदोत्तर कालीन समस्त पंथों संप्रदायों में भी गुरु परंपरा का प्रचलन रहा . भक्ति काल के कवियों के अलावा इस काल के नये धार्मिक संप्रदायों में गुरु की महिमा को स्वीकार किया गया . सिक्ख धर्म गुरु प्रधान धर्म है . गुरु हमें अज्ञान से ज्ञान की ओर और अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाते है . वे हमें सबसे पहले विनय का पाठ पढाते हैं . तुलसीदास ने भी रामचरितमानस की शुरुआत में अपने गुरु नरहरि दास का स्मरण किया है । गुरु पूर्णिमा के दिन हमें द्रोणाचार्य का भी स्मरण करना होगा जिन्होंने वर्ण चेतना के कुत्सित प्रेम और स्नेह की डोर में भील बालक एकलव्य से उसके अँगूठे को गुरु दक्षिणा के रूप में माँग कर हमारे देश में गुरु शिष्य परंपरा के स्वर्णिम अध्याय को कलंकित किया था . आज भी आसाराम बापू और राम रहीम के अलावा अन्य झूठे गुरुओं के किस्से मीडिया से प्रकाश में आते हैं . गुरु हमें जीवन का सच्चा पाठ पढाता है और सात्विक संदेश से संसार को माया मोह के बंधन से मुक्त करता है . राजीव कुमार झा . ह्वाटस अप 8102180299