पर्यावरण संकट के चतुर्दिक आयामों पर रचनात्मक चिंतन

पुस्तक का नाम – पर्यावरण : प्रश्न और भी हैं , लेखिका – रश्मि अग्रवाल , प्रकाशक – पर्यावरण शोध एवं शिक्षा संस्थान , शास्त्री नगर , मेरठ – 250004 ( उ . प्र ) मूल्य – ₹ 380

ब्रह्मांड में पृथ्वी को सबसे सुंदर ग्रह यहाँ विद्यमान जीवन की वजह से माना जाता है और इसका विशिष्ट पर्यावरण अपने असंख्य जीवन रूपों से धरती के पर्यावरण को विशिष्ट रूप प्रदान करता है . आधुनिक काल में औद्योगिक सभ्यता के विकास से पृथ्वी के पर्यावरण को काफी नुकसान हुआ है और इसके विभिन्न तत्वों के ह्रास से पर्यावरण संकट की चुनौती आज मौजूदा दुनिया की ज्वलंत समस्या है . धरती के पर्यावरण को रचने में इसके विभिन्न अवरूपों की भूमिका महत्वपूर्ण है और इनमें मिट्टी , पानी , वनस्पति के अलावा हवा विविध प्रकार के जीव जंतुओं का समावेश है . पर्यावरण संकट की समस्या ने पारिस्थितिकी तंत्र के इन सभी घटकों के समक्ष विघटन और इनके अंतर्संबंधों में असंतुलन की समस्या को कायम कर दिया है . सुपरिचित लेखिका रश्मि अग्रवाल ने अपनी पुस्तक ‘ पर्यावरण : प्रश्न और भी हैं ‘ में इस विषय से जुड़े नये – पुराने विचारणीय मुद्दों को लेकर विचार विमर्श प्रस्तुत किया है .

भारतीय संस्कृति में पृथ्वी और इसके विभिन्न प्राकृतिक अवयवों को प्राचीन काल से नैसर्गिक तत्व के रूप में देखा जाता रहा है और शास्त्रों में धरती को माता के समान बताया गया है . प्रकृति के विविध रूपों को ऋग्वेद में देवी देवताओं के समान माना गया है और इनकी प्रार्थना में सुंदर ऋचाओं की रचना इस महान ग्रंथ में की गयी है . लेकिन यूरोप की आधुनिक भौतिक सभ्यता और इसके यांत्रिक तंत्र की चपेट में आकर हमारे देश की प्रकृति और यहाँ की पारिस्थितिकी का पतन की ओर अग्रसर है और भारत भी वैश्विक तापीकरण यानी ग्लोबल वार्मिंग की चपेट में परिगणित होने वाला देश है . यहाँ इसके दुष्परिणामों को बेमौसम होने वाली मूसलाधार बारिश , सूखा , अल्पवृष्टि , अम्लीय वर्षा के अलावा हरेक साल नदियों में आने वाली विनाशकारी बाढ़ के अलावा समुद्र के जल में होने वाली असमान वृद्धि के रूप में देखा समझा जा सकता है . रश्मि अग्रवाल ने अपनी इस पुस्तक में पर्यावरण संकट के इन तमाम वैश्विक मुद्दों को अद्यतन तथ्यों के साथ भारतीय परिप्रेक्ष्य में चिंतन के धरातल पर प्रस्तुत किया है . .

पर्यावरण व्यापक अर्थों को प्रकट करने वाला शब्द है और पृथ्वी के पर्यावरण से इसका आशय समग्रता में धरती के तमाम हिस्सों के प्राकृतिक परिवेश के अलावा यहाँ विविध रूपों में विद्यमान मानवनिर्मित परिवेश जन्य उपादानों से है . पृथ्वी पर पर्यावरण के विनाश के साथ प्रकृति को फिर से सँवारने की मानवीय चेष्टाओं के अंतर्गत पर्यावरण संरक्षण की विविध गतिविधियों की चर्चा भी महत्वपूर्ण है और इसमें नगरों – महानगरों के अलावा देश के ग्रामीण अंचल के साथ वन्यभूमि – रेगिस्तान – नदी – झील – सागर और दलदल – कछार ये सारे इसमें शामिल है . धरती के इन तमाम भूभागों का जैव परिवेश अनगिनत जीव जंतुओं और प्राणियों की मौजूदगी को भी अपनी सतह पर समेटे है . पर्यावरण असंतुलन की समस्या ने पृथ्वी के सारे परिवेश और इसकी पारिस्थितिकी को प्रभावित किया है . रश्मि अग्रवाल की यह पुस्तक पर्यावरण संकट के इन तमाम पहलुओं पर सिलसिलेवार ढँग से प्रकाश डालती है .

अंतरिक्ष में ओजोन परत के निरंतर क्षरण और क्लोरोफ्लोरो कार्बन के साथ अन्य विषाक्त गैसों के वायुमंडल में अबाध उत्सर्जन से पर्यावरण संकट का वैश्विक आयाम उद्घाटित होता है . इस पुस्तक में धरती के पर्यावरण के प्रमुख संकट के रूप में ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव को खास तौर पर लेखिका ने देखने समझने की चेष्टा की है और इस संदर्भ में ऊर्जा संसाधन के रूप में पेट्रोल और कोयला के दोहन और ज्वलन से जुड़े प्रसंगों को उजागर करके पर्यावरण संकट के प्रमुख पहलुओं पर गहराई से विचार किया है .इस नजरिये से यह एक पठनीय पुस्तक है .

लेखिका ने इस पुस्तक में देश की विशाल नदियों पर बनाये जाने वाले डैम जैसे आधुनिक बहुमुखी विकास योजनाओं की रोशनी में पर्यावरण के विनाश के साथ प्रकृति के सुरम्य अंचल में पसरते अँधकार की कथा को भी सप्रमाण प्रस्तुत किया है और वनों के विनाश के साथ देश में खनन गतिविधियों के विस्तार के साथ नगरीकरण कल कारखानों की स्थापना से देश में बंजर और दलदली भूमि क्षेत्रों के विस्तार से जुड़े पर्यावरणीय संकट को गहनता से रेखांकित किया है . इसमें पर्यावरण विनाश खासकर जंगलों की कटायी से विनष्ट या लुप्तप्राय वनस्पतियों और पशु पक्षियों के बारे में भी जानकारी दी गयी है . इस प्रकार यह पुस्तक पर्यावरण की संरक्षा के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित करती है और इसे पर्यावरण संरक्षण की प्रामाणिक संदर्भ पुस्तक के रूप में देखा जा सकता है .

मनुष्य की भोगवादी प्रवृत्ति से पर्यावरण को सर्वाधिक नुकसान पहुँचा है और इससे वायु और जल प्रदूषण के अलावा मृदा में उर्वरक के रूप में रासायनिक तत्त्वों के सम्मिश्रण से कृषि उत्पादों के जहरीले होते जाने की समस्या आज पर्यावरण संकट के अत्यंत विचारणीय आयामों में शामिल है . इस पुस्तक में लेखिका ने इन मुद्दों पर भी दृष्टिपात किया है और पर्यावरण संरक्षण के कारगर उपायों के बारे में बताया है .यह इस पुस्तक का रोचक अंश है और इसकी उपादेयता सबके लिए है . आज पर्यावरण संरक्षण को जन आंदोलन का रूप ग्रहण करना चाहिए और इसमें हरेक उम्र – तबके और पेशे के लोगों को शामिल होना चाहिए . पर्यावरण की सुरक्षा को लेकर सरकार और समाज में संवाद भी जरूरी है और इससे सारी मानव जाति का हित देश की सीमाओं से बाहर समान रूप से ज़ुड़े हैं .

समीक्षक – राजीव कुमार झा