राजीवकुमार झा द्वारा माधव नागदा का साक्षात्कार

राजीव-लेखन की ओर आपका झुकाव कब और कैसे हुआ?

माधव नागदा- राजीव जी, मेरे परिवार में तो क्या पूरे गाँव में भी लेखन की कोई परंपरा नहीं थी | हमारी बिरादरी
के लोग साक्षर तो थे परंतु उनका पुस्तकों से कोई लेना-देना नहीं था | परिवेश घोर सामंती था | आज़ादी के पश्चात जब शिक्षा की अलख जगने लगी तो हमारे पालकों को यह बात समझ में आ गई कि बच्चों को पढ़ाना चाहिए | गाँव में केवल प्राथमिक स्कूल था | आगे की शिक्षा के लिए मुझे बारह किलोमीटर दूर नाथद्वारा शहर में जाना पड़ा| हम चार-पाँच साथी रोज ही जाते-आते | यह स्कूल उदयपुर जिले का सबसे बड़ा स्कूल था | गुरुजन भी बहुत काबिल | पुस्तकालय-वाचनालय बहुत बड़ा | गुरुजन खाली कालांश में हमें वाचनालय में ले जाते | वहाँ ढेर सारी पत्रिकाएँ थीं, सुव्यवस्थित जमी हुई | हम कभी इस पत्रिका को हाथ में लेते तो कभी उसको | चम्पक, चंदामामा, कथालोक, साप्ताहिक हिंदुस्तान, धर्मयुग, सारिका आदि कई | धीरे-धीरे पढ़ने में रुचि जागृत होने लगी | आठवीं या फिर नौवीं कक्षा में हमें भगवातीप्रसाद देवपुरा हिन्दी पढ़ाने लगे थे | वे ही जिन्होंने साहित्य मण्डल, नाथद्वारा की स्थापना की और जिसके जीवन पर्यंत प्रधान मंत्री रहे | हिन्दी भाषा के प्रति उनका अटूट प्रेम था | वे हमें डूबकर
पढ़ाते | यद्यपि नौवीं कक्षा से मैंने वैकल्पिक विषय के रूप में विज्ञान को चुना था किन्तु हिन्दी के संस्कार भी
मुझमें घर करने लगे | पुस्तकें पढ़ने की लालसा बढ़ने लगी | नौवीं कक्षा में माँ ने मुझे साइकिल दिला दी थी |
पिताजी तो जब मैं ग्यारह वर्ष का था तभी चले गए थे | वे काफी बीमार रहने लगे थे | माँ को कहे गए उनके
अंतिम शब्द थे, ‘छोरे की पढ़ाई मत छुड़ाना, आगे पढ़ाना |’ माँ के मन में ये शब्द अनहद नाद की तरह गूँजते रहे
| अपने गहने बेचकर भी उसने मुझे पढ़ाया | तो राजीव जी, दसवीं में आते-आते पुस्तकों की भूख इतनी बढ़ गई
कि मैं हमारे शहर के जिला पुस्तकालय का सदस्य बन गया | यहाँ खुली अलमारियों में रखी हुई पुस्तकें ही पुस्तकें
| दसवीं और ग्यारहवीं इन दो वर्षों में मैंने लगभग दो सौ उपन्यास और कहानी संग्रह पढ़ लिए | प्रेमचंद, यशपाल,
जैनेन्द्र, भगवतीचरण वर्मा, अमृतलाल नागर, रेणु, आचार्य चतुरसेन शास्त्री, वृंदावनलाल वर्मा, शिवानी, गुरुदत्त,
मोहन राकेश, राजेन्द्र यादव, कमलेश्वर यहाँ तक कि गुलशन नन्दा, कुशवाहा कान्त, प्रेम वाजपेयी, वेदप्रकाश
काम्बोज को भी नहीं छोड़ा | तो इस तरह मुझ में साहित्यिक और भाषायी संस्कार पड़े | मन में कई बार एक हूक
सी उठती कि मैं भी इन बड़े साहित्यकारों की तरह लोगों के दुख-दर्द, सपने, उनकी पीड़ा और जिजीविषा को कागज
पर उतारूं | दूसरे ही क्षण मैं अपने इस शेखचिल्लीपन पर हँसता, मैं इनकी होड़ कैसे कर सकता हूँ ! इन्हीं दिनों
हमारे गाँव के प्राइमरी स्कूल में नये अध्यापक लगे थे, ब्रजेश जी | वे यहीं गाँव में ही रहने लगे थे | मेरी उनसे
पटने लगी | मैं एक दिन उनके कमरे पर गया तो देखता हूँ कि वे तन्मय होकर डेस्क पर रखे कागजों पर कुछ
लिख रहे हैं | मैं कुछ देर तो खड़ा रहा, फिर पूछ बैठा, ‘आप इतनी एकाग्रता से क्या लिख रहे हैं ?’
‘कहानी लिख रहा हूँ |’ वे कलम एक ओर रखते हुए बोले | मैं एकबारगी तो हैरान रह गया | फिर कहा,
‘कहानियाँ तो बड़े-बड़े साहित्यकार लिखते हैं |’‘कोई भी लिख सकता है | लिखते-लिखते ही व्यक्ति बड़ा साहित्यकार बनता है | कोई जन्मजात बड़ा नहीं होता |’ यह बात मेरे अंतस में घर कर गई | इसका अर्थ है कि मैं भी कहानियाँ लिख सकता हूँ | कुछ दिनों के मंथन के पश्चात मैंने सचमुच में एक कहानी लिख डाली | तब मैं ग्यारहवीं कक्षा में पढ़ता था | कहानी मैंने भगवतीप्रसाद
जी देवपुरा को बतायी | इस कहानी को उन्होंने स्कूल की वार्षिक पत्रिका में छाप दिया |

राजीव-अपने बचपन, घर, परिवार इनके बारे में बताएं |

माधव नागदा- बहुत सी बातें तो अभी बता चुका हूँ | घर में मैं और माँ ही थे | कोई बहन-भाई नहीं थे | दो चाचा
थे मगर वे गाँव से पलायन कर चुके थे | दादी माँ अलग रहती थी | आय के साधन थे नहीं | एक खेत था मगर
उससे पूरा नहीं पड़ता था | माँ के गहने एक-एक कर साहूकार के पास पहुँचने लगे | हायर सेकंडरी करने के पश्चात
मैंने तय किया कि अब बस, आगे नहीं | अब नौकरी करनी है, चाहे चपरासी की ही क्यों न हो | ग्यारहवीं में प्रथम
श्रेणी बनी थी | मेरे दूसरे साथी तो एक-एक कर पिछली कक्षाओं में ही समर्पण करते चले गए | साइंस लेने का
साहस तो किसी ने दिखाया ही नहीं था | लोगों ने माँ को सुझाया कि बेटे को आगे पढ़ाओ, पढ़ाई में होशियार है |
मेरे मन में ललक तो थी ही | नाथद्वारा कॉलेज में एडमिशन ले लिया | कॉलेज का वातावरण एकदम भिन्न | यहाँ
आकार मैंने जीवन में पहली बार पेंट पहना | विषय मुश्किल थे | फिर भी मैं तन्मय होकर जुट गया | बी.एससी.
में कॉलेज टॉप किया | परिणाम आया तो हमारे केमिस्ट्री के सर बालकृष्ण जी झंवर ने मुझे चेम्बर में बुलाया |
पूछा, ‘माधव, अब क्या करने का इरादा है ?’ मैं बोला, ‘सर मेरे लिए नौकरी जरूरी है | मेरी स्थिति आपसे छिपी
नहीं है |’ ‘पढ़ाई मत छोड़ो, आगे पढ़ो | केमिस्ट्री में एम.एससी. कर लो |’ मैं चुप खड़ा रहा | मेरा असमंजस
भाँपकर उन्होंने कहा, ‘अच्छा, आगे पढ़ो तो कितने रुपये महीने में काम चला लोगे ?’ मैं थोड़ी देर चुप रहा, फिर
झिझकते हुए बोला, सर, सौ रुपये में | यह 1970 था | ‘तो मैं तुम्हें प्रतिमाह सौ रुपये भेजता रहूँगा | यह मत
समझना कि कोई एहसान कर रहा हूँ | नौकरी लगे तब लौटा देना’| तो इस प्रकार राजीव जी, मैंने उदयपुर एम.बी.
कॉलेज में एडमिशन ले लिया | 1973 में एम.एससी. हो गई | इसके तत्काल पश्चात शिक्षा विभाग में अस्थायी
गणित शिक्षक की नौकरी मिल गई जो सिर्फ एक सत्र के लिए थी | 1974 में उदयपुर में ही विवाह हो गया | फिर
दो बच्चे | पहले बेटी, बाद में बेटा | अस्थायी नौकरी छूटने के बाद अजमेर से बी.एड.कर ली | 1976 में रसायन
विज्ञान व्याख्याता की नौकरी मिली | नियमित लेखन इसके बाद ही आरंभ हो पाया

राजीव-लेखन करते हुए आप कैसा महसूस करते हैं ?

माधव नागदा-मत पूछिए | एक तड़प सी महसूस होती है जैसे कोई तितली ककूना में से निकलने की कोशिश कर
रही हो | थीम, विषय-वस्तु, कथानक, भाषा, शिल्प, मुहावरा, संवाद, आरंभ, अंत सबके लिए एक बेचैनी | जैसे-
जैसे ये सधते जाते हैं मन शांत होता जाता है |

राजीव- आप मूलतः स्वयं को क्या मानते हैं ? मेरा आशय कवि, कथाकार और आलोचक से है |
माधव नागदा-मेरी साहित्यिक यात्रा का आरंभ ही कहानी लेखन से हुआ | चार-पाँच वर्षों तक तो सिर्फ कहानियाँ ही
लिखीं | फिर 1980 से लघुकथा की ओर झुकाव हुआ | कहानी हो या लघुकथा, हैं दोनों कथा विधा के ही रूप |
अभी तक चार कहानी-संग्रह और दो लघुकथा संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं | मन कथा लेखन में ही ज्यादा रमता है,
चाहे कहानी हो या लघुकथा | तो राजीव जी, मैं स्वयं को मूल रूप से कथाकार ही मानता हूँ |

राजीव-समकालीन कथा लेखन के नये आयामों के बारे में बताएं |
माधव नागदा-आज के युवा अच्छी कहानियाँ लिख रहे हैं | कई नाम उभरकर आए हैं; चन्दन पांडेय, नीलाक्षी सिंह,
किरण सिंह, प्रभात रंजन, अल्पना मिश्र, दिव्या विजय, रूपा सिंह, मोहम्मद आरिफ़, प्रत्यक्षा, चरणसिंह पाथिक,
कुणाल सिंह आदि | ये सब नए शिल्प, नए तेवर के साथ उपस्थित हैं | सबसे बड़ी बात है कि आज की कहानी में
विचारधारा के दबाव नहीं दिखाई देते | एक उन्मुक्तता और यथार्थ के प्रति लगाव | इन्टरनेट के युग में ये
रचनाकार अध्यानूतन ज्ञान और नई टेक्निक से लेस हैं जिसका प्रभाव आज की कहानी में स्पष्ट दिखाई देता है |
कहानी में एकान्विति की धारणा भी समाप्त होती जा रही है | ऐसे ब्योरे सामने आते हैं जो मुख्य कहानी से इतर
जाकर किसी न किसी सामाजिक विसंगति पर प्रहार करने से नहीं चूकते | कुल मिलाकर समकालीन कथा लेखन आश्वस्तकारी है |

राजीव-हिन्दी में अपने पसंदीदा लेखकों, कवियों के बारे में बताएं |

माधव नागदा- यह एक लंबी सूची है | यों तो किसी न किसी लेखक की किसी न किसी रचना ने प्रभावित किया
है | परंतु समग्र रूप से बात करें तो प्रेमचंद सबसे ऊपर आते हैं | भीष्म साहनी, अमरकान्त, स्वयंप्रकाश ,
रघुनंदन त्रिवेदी की कई कहानियों को मैं कभी भूल नहीं पाऊँगा | भीष्म साहनी की चीफ की दावत, लीला नंदलाल
की, अमृतसर आ गया है; अमरकान्त की डिप्टी कलक्टरी, दोपहर का भोजन, ज़िंदगी और जोंक; स्वयंप्रकाश की
बर्डे, पार्टीशन, सूरज कब निकलेगा; रघुनंदन की वह लड़की अभी ज़िंदा है, खांचे, एक दिन रामबाबू झाड़ी लांघ
जाएंगे आदि कहानियों का मेरे मन पर अमिट प्रभाव है | उदयप्रकाश ने भी प्रभावित किया है | तिरिछ, पालगोमरा
का स्कूटर, और अंत में प्रार्थना आदि कहानियाँ उनके कथा शिल्प का उत्कृष्ट है | कवियों में सर्वेश्वर दयाल
सक्सेना, दुष्यंत, धूमिल, भगवत रावत, मदन डागा, क़मर मेवाड़ी, विष्णु नागर, गोविंद माथुर, मीठेश निर्मोही की
कविताओं का मैं मुरीद हूँ |

राजीव-लेखन के अलावा और किन चीजों में रुचि रही ?

माधव नागदा-पुस्तकों में तो होनी ही है क्योंकि लेखन को हम पठन से अलग नहीं कर सकते | शतरंज में रुचि रही
है | गाँव में रहता हूँ, कुछ खेती भी है तो कृषि कर्म में भी रुचि है | होम्योपेथी का भी अनौपचारिक अध्ययन किया
है |

राजीव-अपने लेखन और उसकी कथा योजना में उजागर होने वाले जीवन संसार के बारे में बताएं |

माधव नागदा-मेरी कहानियों में प्रायः निम्न वर्ग बोलता है | इस वर्ग के लोगों के संघर्ष, जिजीविषा,भोलापन, सपने
बोलते हैं | ‘उसका दर्द’ में मोतीभाई की पत्नी प्रायः बीमार रहती है | वह अपने बेटे को डॉक्टर बनाना चाहता है |
उसे नहीं पता कि इसमें कितना खर्च बैठेगा फिर भी वह जुट जाता है | तरह-तरह के छोटे-छोटे काम करके अपने
सपने को साकार करने की चेष्टा करता है | यहाँ मोतीभाई का चरित्र अलग ही रूप में उभरकर आता है | ‘चाहत’
कहानी का फूलचंद फलवाला ग्राहकों के लिए ताज़ा फलों की गुहार लगाता है परंतु बेबसी यह कि अपनी नन्ही बेटी
को ताज़ा फल नहीं खिला पाता | जब वह फल खाने की इच्छा प्रकट करती है तो सबसे सड़ा हुआ फल छांटकर
देता है | दूसरी ओर जब एक बच्चा उसकी लारी में से फल चुराकर भाग जाता है और जब आस-पास के दूकानदार
उसे पकड़कर मारने लगते हैं तो फूलचंद फलचोर बच्चे को छुड़ा लेता है | फूलचंद को इस बच्चे में अपनी बेटी की
छवि नज़र आती है जो थोड़ी देर पहले ताज़ा फल खाने की चाहत में निराश होकर चली गई थी | निम्न तबके के
लोगों की मानवीय संवेदनाएँ और ईमानदारी मेरी कई कहानियों में आई है | मुख्यतः ग्रामीण परिवेश उभरकर
सामने आता है | कुछ कहानियों में एक खुद्दार और मुँहफट बुजुर्ग आया है | कपाल क्रिया, बूढ़ी आँखों के सपने,
अंजलि भर उजास, केस नंबर पाँच सौ सोलह में ऐसे ही वृद्ध का चित्रण हुआ है | हालांकि ‘अंजलि भर उजास’ में
एक ग्रामीण निरक्षर स्त्री के अपमान और उपेक्षा की कहानी है | यह स्त्री धीरे-धीरे हकीकत से रूबरू होती है और
अंततः अपने ही पति के खिलाफ कोर्ट में जाने का निर्णय लेती है | ‘धोलो भाटो लीलो रूंख’ भी एक ऐसी ग्रामीण
स्त्री की व्यथा कथा है जो पति के इस दबाव को स्वीकार नहीं कर पाती कि बदला लेने के लिए अपने शत्रु मगन
पर बलात्कार का आरोप लगाए | यह कहानी सर्वप्रथम ‘हंस’ में प्रकाशित होकर बहुप्रशंसित हुई थी | कुछ कहानियों
में सांप्रदायिक मानसिकता के प्रति आक्रोश उभरकर सामने आता है | ‘अंधेरे में किरण’, ‘जहर काँटा’, ‘आत्मवत सर्व
भूतेषु’ इसी स्वर की कहानियाँ हैं |

राजीव-कविता अथवा कथा लेखन में से किस विधा में आप स्वयं को सहज पाते हैं ?
माधव नागदा- कथा लेखन में | यहाँ स्वयं को अभिव्यक्त कर पाने की अधिक स्वतन्त्रता होती है |

राजीव-आज देश और समाज का माहौल आपको कैसा लग रहा है ?
माधव नागदा-राजीव जी, आज के संदर्भ में यह प्रश्न बहुत असहज कर देने वाला है | अशोक मिज़ाज के ये शेर
मेरे मन की बात कह देते हैं-

बदल रहे हैं यहाँ सब रिवाज क्या होगा ?/ मुझे ये फिक्र है कल का समाज क्या होगा ?
लहू तो कम है मगर रक्तचाप भारी है/ अब ऐसे रोग का आखिर इलाज क्या होगा ?
हर एक सिम्त है चेहरे पर खौफ़ के मंज़र/ हर एक शख्स सवाली है आज क्या होगा ?

राजीव-हिन्दी की दशा और दिशा के बारे में बताएं |

माधव नागदा- हिन्दी का परिदृश्य ज्यादा उत्साहवर्द्धक नहीं है | हिन्दी संसार केवल लेखकों तक सिमटता जा रहा
है | इन्टरनेट पर जो हिन्दी छाई हुई दिखाई देती है वह लेखकों-साहित्यकारों की वजह से है | आज एक मजदूर भी
अपने बच्चे को अंग्रेजी माध्यम विद्यालय में भेजना चाहता है | यह भ्रम फैलाया जा रहा है कि केवल अंग्रेजी ही
रोजगार दे सकती है | अंग्रेजी बोलने वाला ही अपना केरियर बना सकता है | सरकारें इस भ्रम को तोड़ने का कोई
उपाय नहीं कर रहीं हैं | अब तो सरकारें स्वयं अंग्रेजी माध्यम विद्यालय खोल रहीं हैं | उन्होंने अंग्रेजी के सामने
आत्मसमर्पण कर दिया है | आज जिला स्तर पर ये स्कूल खोले हैं, कल ब्लॉक स्तर पर खोले जाएंगे, परसों
पंचायत स्तर पर | धीरे-धीरे हिन्दी रिप्लेस होती जाएगी | राजस्थान में इन स्कूलों का नाम क्या रखा गया है ?
आपको जानकार आश्चर्य होगा-महात्मा गांधी अंग्रेजी राजकीय माध्यम विद्यालय | महात्मा गांधी के नाम पर,
जिन्होंने आज़ादी मिलते ही कह दिया था-कह दो दुनिया वालों से कि गांधी अंग्रेजी नहीं जानता | आज जो राजनेता
हिन्दी अथवा स्थानीय भाषा में वोट मांगकर संसद में पहुँचते हैं वे वहाँ अंग्रेजी में बहस करते हैं | जो अभिनेता
हिन्दी फिल्मों के बूते पर करोड़ों कमाते हैं उन्हें हिन्दी में बोलते हुए शर्म महसूस होती है | तो राजीव जी इस तरह
का पाखंड है | इसके चलते हिन्दी का भविष्य मुझे तो उज्ज्वल नहीं दिखाई देता | हम चाहे कितनी ही
खुशफहमियाँ पाल लें कि हिन्दी इन्टरनेट पर छा रही है कि दुनिया के कई विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ाई जाती है
| वस्तुतः हिन्दी के प्रति जो गौरव भाव होना चाहिए वह दिखाई नहीं देता | आज तो गांवों में भी माताएँ अपने
बच्चों को सिखाती हैं वो देखो काऊ, पीकॉक, एलीफेंट | मेंगों खाओ, एपल खाओ, बनाना खाओ | भूले से भी बच्चा
मेहमानों के सामने मेंगों को आम या बनाना को केला बोल दे तो माँ-बाप शर्मसार हो जाते हैं | राजीव जी ये कड़वी
बातें हैं परंतु यही आज की हकीकत है | यह नहीं भूलना चाहिए कि भाषा संस्कृति की वाहक होती है| भाषा भ्रष्ट
होगी तो संस्कृति भ्रष्ट होगी | हिन्दी अपना स्थान तभी प्राप्त करेगी जब हमें हिन्दी से वास्तविक प्रेम होगा, हमें
अपनी भाषा पर गर्व होगा | अंग्रेजी के आतंक से भाषाएँ धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही हैं | हिन्दी ज़िंदा रहेगी तो
साहित्यकारों के बल पर | सरकारों से कोई उम्मीद नहीं है |

राजीव-लघुकथा लेखन में भी आपकी रुचि रही है | लघुकथा लेखन की चुनौतियों के बारे में बताएं |

माधव नागदा-चुनौतियाँ तो हैं, कुछ बाह्य तो कुछ आंतरिक | लघुकथा आज भी नामचीन आलोचकों की वक्र दृष्टि
का शिकार है | जब लघुकथा का जिक्र आता है तो वे कुछ-कुछ खिल्ली उड़ाने की मुद्रा में आ जाते हैं | इसीलिए
आलोचक की भूमिका भी लघुकथाकारों को ही निभानी पड़ रही है | इससे कई बार होता यह है कि अच्छी लघुकथाएँ
भी उपेक्षित रह जाती हैं और हल्की को महत्व मिल जाता है | आलोचना में जिस तटस्थत्ता की अपेक्षा है वह कहीं
पीछे छूट जाती है | इधर कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं के संपादक अभी भी लघुकथा और लघुकथाकारों को उपेक्षा की
दृष्टि से देखते हैं | विषय सूची में लेखक का नाम नहीं देंगे, आवरण पृष्ठ पर अन्य लेखकों के साथ लघुकथाकारों
के नाम नहीं छापेंगे(सृजन कुंज और समावर्तन जैसी कतिपय पत्रिकाओं को छोडकर), भीतर न फोटो न परिचय |
नाम दे देंगे रचना के अंत में | कहने का तात्पर्य है कि लघुकथा एवं लघुकथाकार को अभी भी वांछित महत्व की
दरकार है | यद्यपि कई पत्रिकाओं में बदलाव भी दिखाई दे रहा है जो स्वागत योग्य है | कई आंतरिक चुनौतियाँ
भी हैं, यथा; व्यंग्य के लापरवाह प्रयोग से हास्य बन जाने का खतरा, संवेदना के अभाव में घटना चित्रण का
रिपोर्ताज बन जाने का खतरा, संदेश के उपदेश में तब्दील हो जाने का खतरा, मानवीय संवेदनाओं के अतिशय
प्रयोग का लिजलिजी भावुकता में बदल जाने का खतरा, कथ्य की पुनरावृत्ति का खतरा, भाषा के ठसपन या
अतिशय कारीगरी का खतरा, कलात्मकता के फेर में अमूर्तन का खतरा |

राजीव-मीडिया के नये रूपों ने समाज को कैसे बदलावों की ओर बढ़ाया है ?

माधव नागदा– नए रूपों में प्रायः सोशल मीडिया को लिया जाता है | इससे समाज पर सकारात्मक और नकारात्मक
दोनों प्रकार के प्रभाव दिखाई देते हैं | दुनिया सिमटकर छोटी-सी हो गई है | आज सेकंडों में दुनिया के किसी भी
कोने मे बैठे आदमी से संपर्क किया जा सकता है | ज्ञान का विस्फोट तो है ही | आज आप घर बैठे ही जो भी
जानना चाहें जान सकते हैं | दूसरी ओर व्हाट्सएप जैसे माध्यमों से अफवाहों का बाज़ार भी गरम होने लगा है |
सच के आते देर लगती है और झूठ अपना काम कर जाता है | युवा आत्मकेंद्रित होता जा रहा है | उसकी उँगलियाँ
मोबाइल पर ही चलती रहती हैं जिससे समय की बरबादी होती है | परंतु जागरूक युवा सोशल मीडिया का प्रयोग
अपने हित में कर लेते हैं | सरकारों ने भी कई चीजों को डिजिटल कर लिया है जिससे लोगों को खूब फायदा हुआ
है | आज घर बैठे सरकारी योजनाओं की जानकारी हो जाती है, ऑनलाइन सारे काम हो जाते हैं |