कविता की भाषा में हिंदी साहित्य का सरस , विशद और जीवंत इतिहास लेखन

पुस्तक का नाम : हिंदी साहित्य का काव्यात्मक इतिहास , लेखिका : रजनी सिंह , प्रकाशक : रजनी प्रकाशन , डिबाई , पिन 203393 , उत्तर प्रदेश मूल्य : ₹ 350

राजीव कुमार झा

हमारे देश की समृद्ध लेखन परंपरा में इतिहास लेखन में कायम रहने वाली उदासीनता के बारे में अक्सर चर्चाएँ होती हैं और विराट साहित्यिक परंपरा से समृद्ध इस देश की काव्य परंपरा को रेखांकित करते हुए यह भी कहा जाता है कि यहाँ की काव्य परंपरा में जीवन और जगत के यथार्थ और इसकी कल्पना के सुंदर रंगों के साथ हमारे देश की काव्य परंपरा अपनी भाषा के लालित्य में काव्येतर विषयों के विवेचन को भी अपने दायरे में प्रस्तुत करती रही है . भारत में गणित , चिकित्सा , विज्ञान , समाज चिंतन और अन्य विषयों के ग्रंथ काव्य के रूप में ही रचे गये . संस्कृत भाषा मूलत : काव्य प्रधान भाषा है . मध्यकाल में संस्कृत के ह्यास के साथ देश में प्राचीन लेखन परंपरा का पतन हो गया और लोकभाषाओं में साहित्य सृजन शुरू हुआ और आधुनिक काल में खड़ी बोली के रूप में हिंदी के विकसित रूप में गद्य लेखन का भी समावेश हुआ . वर्तमान काल में हिंदी लेखन में प्रकट होने वाला वैविध्य इस भाषा के सर्जनात्मक रूप को विविध प्रकार के रूप शैलियों में प्रकट होता दिखायी देता है और समकालीन हिंदी काव्य लेखन के बारे में ये बातें खास तौर पर समीचीन हैं . हिंदी काव्य लेखन की प्रक्रिया अपनी विषयवस्तु में नित नये प्रयोगों से गुजरती दिखायी देती है और सुपरिचित लेखिका रजनी सिंह की प्रस्तुत पुस्तक ‘ हिन्दी साहित्य का काव्यात्मक इतिहास ‘ को इसी प्रक्रिया की एक कड़ी के रूप में देखा जा सकता है . इस पुस्तक में इन्होंने काव्य शैली में हिंदी साहित्य के इतिहास और इसके प्रवाह की कथा को अपनी जीवंत भाषा शैली के सुंदर शब्द समाहार में प्रस्तुत किया है .

इतिहास लेखन स्रोतों पर आधारित होता है और रजनी सिंह के द्वारा लिखित हिंदी साहित्य के इस इतिहास को पढ़ते हुए भी यह बात भलीभाँति प्रमाणित होती है . लेखिका ने इसमें बहुत ही सजगता से हिंदी साहित्य के प्रचलित विशिष्ट तथ्यों के अलावा महत्व की दृष्टि से सामान्य लेकिन उल्लेखनीय तथ्यों को प्रस्तुत किया है और भलीभाँति चिंतन मनन से ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में कालक्रमेण हिंदी साहित्य की तमाम प्रवृत्तियों , आंदोलनों की वैचारिक पृष्ठभूमि की विवेचना की है रजनी सिंह ने अपनी इस पुस्तक में हिंदी साहित्य का समग्र इतिहास प्रस्तुत किया है . हिंदी साहित्य के इतिहास को व्यवस्थित रूप से लिखित रूप देने का श्रेय रामचंद्र शुक्ल और हजारीप्रसाद द्विवेदी को दिया जाता है और हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन में काल विभाजन के अलावा इसकी विभिन्न साहित्यिक अंतर्धाराओं के विकास के साथ हिंदी साहित्य की ऐतिहासिक प्रवृत्तियों की पहचान के अलावा महत्वपूर्ण लेखकों और उनकी रचनाओं से जुड़े तथ्यों के शोध का कार्य इन दोनों महानुभावों के द्वारा किया गया . हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन में शुक्ल जी और द्विवेदी जी की साहित्येतिहास विषयक अवधारणाओं को प्राय : स्वीकार किया गया है और रजनी सिंह ने भी अपने हिंदी साहित्य के इस काव्यात्मक इतिहास में हिंदी का साहित्येतिहास लिखते हुए इस परंपरा का निर्वहन किया है . इस दृष्टि से इस इतिहास ग्रंथ को तथ्यपूर्ण – सारगर्भित और प्रामाणिक माना जाना चाहिए .

हिंदी भाषा के विकास के साथ इसका निरंतर उत्थान हुआ और आधुनिक काल में खड़ी बोली को हिंदी साहित्य की भाषा के रूप में स्वीकार किया जाता है . हिंदी का इतिहास एक हजार साल पुराना है और सचमुच इस भाषा और इसके साहित्य के विकास की यह रोचक कथा किसी सुंदर गीत की अनगिनत कड़ियों के समान ही प्रतीत होती है जिसके संगीत के ताल – लय – सुर और छंद को इतिहास कथा का रूप देकर रजनी सिंह ने इस पुस्तक में प्रस्तुत किया है . इतिहास को अनेक कालों की कथा के रूप में देखा जाता है और साहित्य के इतिहास के बारे में कुछ इतर बातों को भी हमें समझना होगा और शायद इसके मूल में देशकाल से परे कल्पना और मिथक के साथ यथार्थ के अनेक लक्षित – अलक्षित जीवनतत्वों के समाहार के रूप में साहित्येतिहास की विवेचना इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है . रजनी सिंह के द्वारा लिखित हिदी साहित्य के इस इतिहास ग्रंथ को इस दृष्टि से पठनीय कहा जा सकता है क्योंकि इसमें हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन में अंतर्वस्तु के विश्लेषण में शोध प्राविधि के परिमाणात्मक और गुणात्मक पद्धतियों का रचनात्मक अनुप्रयोग इसमें शामिल दिखायी देता है .

हिंदी में गद्य लेखन का आरंभ आधुनिक काल में हुआ और इसके पहले इस साहित्य के इतिहास का प्राचीन काल जिसे आदि काल भी कहा जाता है अपनी इस पुस्तक में रजनी सिंह ने इसके अलावा हिंदी साहित्य के इतिहास के मध्यकाल और उसके पूर्व और उत्तर कालखंड के रूप में भक्तिकाल और रीति काल की सारगर्भित विवेचना प्रस्तुत की है .उन्होंने काफी समग्रता में हिंदी साहित्य के इतिहास के इन दोनों कालों की रचनात्मक प्रवृत्तियों को रेखांकित किया है . हिंदी लेखन शुरू से गहन वैचारिक सरोकारों को प्रदर्शित करता रहा है और अपने इतिहास लेखन में वे हिंदी कविता के वैचारिक पक्षों के विश्लेषण में धर्म – समाज और राजनीति से जुड़े उसके सरोकारों को भलीभाँति स्पष्ट करती हैं . इस पुस्तक में उन्होंने आदि काल के जैन कवियों के अलावा नाथों – सिद्धों के साहित्य और भक्ति काल – रीति काल की प्रमुख काव्यधारा के रूप में सगुण – निर्गुण मत के कवियों इस काल के सामंती परिवेश में रचे गये दरबारी साहित्य इन सबके सम्यक मूल्यांकन में तल्लीनता से प्रवृत्त होती प्रतीत होती हैं .

रजनी सिंह के इस हिंदी साहित्य इतिहास ग्रंथ में आदि काल और भक्ति काल के विशिष्ट कवियों – कवयित्रियों के अलावा शेष अन्य महत्वपूर्ण रचनाकारों के बारे में भी जानकारी मिलती है . उन्होंने इन सभी कृतिकारों के जन्मकाल – स्थान – रचनाएँ और जनश्रुति के रूप में प्रचलित कथाओं को भी सरलता से इसमें समेटा है . इस दृष्टि से यह पुस्तक काफी सरस और रोचक है और इसमें वर्णित इतिहास कथा धर्म – संस्कृति – शासन और समाज के अनेक स्मृत – विस्मृत अध्यायों के पृष्ठों से सबको अवगत कराती है .

हिंदी का साहित्येतिहास और इसका दर्शन कालक्रम की पृष्ठभूमि में देश के सामाजिक – राजनीतिक परिवेश की विषमता और इसके अंतर्विरोधों की पृष्ठभूमि में सदैव चिंतन की धर्म – संप्रदाय – पंथ निरपेक्ष चिंतन परंपरा के सतत् प्रवाह की प्रक्रिया को रेखांकित करता है और हिंदी कविता की निर्गुण काव्यधारा के अलावा प्रेममार्गी सूफी कवियों के काव्य का मूल्यांकन इस संदर्भ में समीचीन है . इस पुस्तक में कबीर और रैदास के अलावा सारे संत कवियों के काव्य लेखन का विवेचन किया गया है और कुतबन समेत सभी प्रेममार्गी कवियों के काव्य के बारे में बताया गया है .

हिन्दी साहित्य के आधुनिक काल का इतिहास लेखन इस भाषा में कविता के अलावा अन्य पद्येतर विधाओं के विकास और उसकी सर्जनात्मकता को विशेष रूप से प्रकट करता है . इस दौर के साहित्य लेखन में ब्रजभाषा से खड़ी बोली में काव्य रचना के प्रचलन के अलावा गद्य लेखन के विकास की प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण है . इसके अलावा औपनिवेशिक शासन के बरक्स राष्ट्रीय चेतना से भी अनुप्राणित दिखायी देता है . रजनी सिंह ने अपनी इस पुस्तक में आधुनिक काल के हिंदी साहित्य का इतिहास लेखन इन तथ्यों की पृष्ठभूमि में प्रस्तुत किया है . पुस्तक के इस खंड में आधुनिक काल के दोनों कालखंड स्वतंत्रता पूर्व काल और स्वातंत्र्योत्तर काल के प्रमुख रचनाकारों और उनकी चर्चा को रजनी सिंह ने इस पुस्तक में समेटा है . इस संदर्म में नवजागरण से लेकर छायावाद , प्रगतिवाद और तमाम अन्य काव्यांदोलनों का सरस विवेचन इस पुस्तक को पठनीय रूप प्रदान करता है .

कविता की भाषा गागर में सागर की उक्ति को चरितार्थ करती है . रजनी सिंह ने काव्यात्मक भाषा में हिंदी साहित्य का इतिहास लेखन करके इसकी कथा को सरस – विशद और जीवंत रूप प्रदान किया है और इसे काव्यभाषा का चमत्कार ही कहा जाना चाहिए .

रजनी सिंह . उत्तर प्रदेश के डिबाई की निवासी . शिक्षाविद् और समाजसेवी । विविध विधाओं में दो दर्जन पुस्तकों की रचना । हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए यूरोप के अनेक देशों के अलावा अमरीका का भ्रमण । आकाशवाणी और दूरदर्शन पर कविता कहानी का प्रकाशन । पत्र पत्रिकाओं में शोध आलेखों का प्रकाशन ।