विनीता मिश्रा से तुलसी जयंती के अवसर पर महाकवि तुलसीदास के अवदान के बारे में उनसे राजीव कुमार झा की बातचीत

 विनीता मिश्रा कवयित्री रामकथा की विदुषी हैं . उनके कविता लेखन पर भी रामकथा का गहरा प्रभाव परिलक्षित होता है . प्रस्तुत है तुलसी जयंती के अवसर पर महाकवि तुलसीदास के अवदान के बारे में उनसे राजीव कुमार झा की बातचीत

1 . विनीता मिश्रा जी ! आज तुलसी जयंती है . तुलसीदास को हिंदीभाषी हिंदू समाज का उद्धारक क्यों कहा जाता है ?

17 वीं शताब्दी तक उत्तर भारत का लगभग पूरी तरह से इस्लामीकरण हो चुका था। हमारे सभी धार्मिक ग्रंथ संस्कृत भाषा में थे और संस्कृत भाषा का सीखना – सिखाना सीमित होता जा रहा था। ऐसे समय में तुलसीदास जी ने राम को एक आदर्श स्वरूप उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करते हुए मर्यादा पुरुषोत्तम राम और उनके राम राज्य को आम जन की बोली में रचकर हिंदुओं को उनकी विलुप्त होती हुई संस्कृति और धर्म में आस्था का रोपण करने का कार्य किया जिसके कारण उन्हें यह संज्ञा दी गई।

2 . तुलसीदास ने रामभक्ति के माध्यम से मानवता को क्या संदेश दिया है ?

ऐसा कौन सा संदेश है मानवता का जो तुलसीदास में राम के माध्यम से नहीं दिया? राम के द्वारा उन्होंने पुत्र, भाई, मित्र, पति, जन – प्रेमी, दीन – रक्षक, सर्व – उद्धारक, सबसे समभाव रखना, हर प्रकार की परिस्थिति को स्वीकार कर उनके लिए स्वयं को प्रस्तुत करना। लेकिन जो सबसे बड़ा संदेश है, वह यह है कि दीन – हीन , शोषित- पीड़ित लोगों के साथ जुड़कर उनको एकजुट करते हुए उनके भीतर आतताई के विरुद्ध संघर्ष करने की क्षमता पैदा करना। उन्होंने दिखा दिया की सभी पीड़ित यदि एक हो जाएं तो वह कितने भी दुर्बल हो रावण जैसी परम शक्तिशाली सत्ता को भी मिटा सकते हैं।

3 . तुलसीदास के रामराज्य की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालिये ?

रामराज्य की प्रासंगिकता के लिए एक ही चौपाई पर्याप्त है
दैहिक दैविक भौतिक तापा।
रामराज्य काहुहि नहीं व्यापा।।

ऐसे राज्य की परिकल्पना आज भी कोई क्यों नहीं चाहेगा? जिसमें समस्त प्रजाजन इन तीनों कष्टों से बची रहे। न उन्हें कोई शारीरिक कष्ट हो, न उस राज्य में दैवीय आपदाएं; जैसे – बाढ़, भूकंप, महामारी, तूफान आदि; हो रही हो और न ही लोगों को किसी तरह की भौतिक आवश्यकताओं में कष्ट या कमी हो। खेती-बाड़ी व्यवसाय सब सुचारू रूप से चल रहे हो।

4 . तुलसीदास की जीवन चेतना का गहरा प्रभाव हिंदी साहित्य पर आज भी दिखायी देता है . आप किन संदर्भों में उनको कालजयी कवि मानती हैं ?

हिंदी साहित्य में आज भी सबसे अधिक पढ़ा जाने वाला,सबसे अधिक मंचित किया जाने वाला, सबसे अधिक गाया जाने वाला, सबसे अधिक व्याख्या किया जाने वाला, सबसे अधिक सुना जाने वाला, सबसे अधिक शोध किया जाने वाला, और सबसे अधिक जनमानस से जुड़ा हुआ तुलसीदास रचित रामचरितमानस के अतिरिक्त अन्य कोई ग्रंथ नहीं पाया गया है। स्वांतः सुखाय लिखा जाने वाला यह ग्रंथ अपने पठन-पाठन , गायन में जितना सहज- सरल है उतना ही गूढ़ और अर्थपूर्ण भी।

5 . आज समाज के धर्म – जाति – क्षेत्र के विवाद और संघर्ष संकुल सामाजिक राजनीतिक परिवेश में तुलसी का संदेश किस प्रकार हमारा मार्गदर्शन करता है ?

आज हमारा समाज धर्म -जाति और क्षेत्र के नाम पर बंट चुका है किंतु आप रामचरितमानस में देखिए तो कहीं भी हिंदू शब्द तक का प्रयोग नहीं किया गया है, यह ग्रंथ मानव मात्र को मानवीय धर्म से जोड़ने के लिए रचा गया है। तुलसी के आराध्य राम जिस तरह से उत्तर भारत के सिद्धाश्रम आदि क्षेत्रों में ऋषि -मुनियों की रक्षा करते हैं, उसी तरह दंडकारण्य और दक्षिण की ओर जाते हुए सभी की रक्षा करते हैं। जितना आदर और सम्मान वह भरद्वाज जैसे ऋषियों का करते हैं, निषादराज गुह को भी उतने ही स्नेह और सम्मान से अपनाते हैं। आदिवासी और वन जाति के लोगों:- शबरी -सुग्रीव -जामवंत -जटायु ; सभी के साथ एक जैसा स्नेहिल संबंध कायम करते हैं। बल्कि शत्रु भूमि लंका में भी किसी के भी साथ अमानवीय कृत्य नहीं करते हैं। युद्ध पश्चात जिस सम्मान से अपने योद्धाओं का अंतिम संस्कार करते हैं उतना ही सम्मान शत्रु पक्ष के वीरगति पाए असुरों का भी करते हैं।
अपने इन पात्रों के द्वारा तुलसीदास राम के माध्यम से यही संदेश देना चाहते हैं कि जब तक संसार में पीड़ित -शोषित लोगों के लिए महलों से निकल कर उनके निकट जाकर उनके दुख दूर करने के लिए प्रयास नहीं किया जाएगा तब तक रामराज्य संभव नहीं है। वास्तव में राम का वनवास राम राज्य की आधार भूमि है। वनवास जैसे कष्टों और संघर्षों के द्वारा ही जनमानस से जुड़ा जा सकता है उनके कष्टों को समझा और दूर किया जा सकता है तभी रामराज्य स्थापित हो सकता है।

6 . रामचरितमानस तुलसीदास के द्वारा रचित महाकाव्य की महत्ता के बारे में बताइए ?

स्वांतः सुखाय लिखा जाने वाला यह ग्रंथ अपने पठन-पाठन , गायन में जितना सहज- सरल है उतना ही गूढ़ और अर्थपूर्ण भी। एकमात्र ऐसा ग्रंथ है जिसे केवल अक्षर पहचानने वाला व्यक्ति भी उतने ही चाव से पढ़ता है जितनी रुचि से उच्चतम विश्वविद्यालयों का एक शोधार्थी।
इस महाकाव्य में स्तुति के रूप में प्रत्येक कांड के आरंभ में संस्कृत व्याकरण से सुसज्जित सुंदरतम छंद रचे गए हैं जो संस्कृत के पूर्ण ज्ञान के बिना संभव नहीं है , तो आगे बिल्कुल ही सरल जन भाषा अवधी में विभिन्न प्रकार के छंदों में सामाजिक, राजनैतिक ,आध्यात्मिक ज्ञान की त्रिवेणी में जिस प्रकार कथा के रूप में यह रचना आगे बढ़ती है वह भारत में तो क्या संसार में अन्यत्र प्राप्त नहीं है।
इसके बावजूद भी तुलसीदास ने स्वयं को कुकवि और अपनी रचना को एक अज्ञानी की रचना के रूप में प्रस्तुत किया है जिसे ज्ञानी और विद्वान लोग कोई महत्व न दें। ऐसा सरल – सहज और अहंकार विहीन भाव दूसरा देखने को नहीं मिलता।

7 . तुलसीदास के बारे में जनश्रुति है कि वे अपनी धर्मपत्नी रत्नावली की प्रेरणा से संन्यासी हो गये . भारतीय परंपरा में संन्यास धर्म और साधना की क्या महिमा है ?

यह सत्य है कि तुलसीदास की कथा के पीछे उनकी पत्नी रत्नावली के अनेक प्रसंग जुड़े हुए हैं किंतु तुलसीदास सन्यासी नहीं एक भक्त अधिक थे और उनके आराध्य थे सीताराम रूपी दंपति।विडंबना है कि जिस तुलसी को अपने जीवन काल में जन्म से लेकर आगे तक परिवार का सुख नहीं प्राप्त हुआ उसकी कालजई रचना एक आदर्श परिवार का स्वरूप लेकर आई। मेरे विचार से तुलसी सन्यास के नहीं आदर्श गृहस्थी के पक्षधर थे। क्योंकि किसी भी राष्ट्र के निर्माण की इकाई एक परिवार होता है। जब तक आदर्श परिवार की संकल्पना सत्य नहीं होगी तब तक रामराज्य जैसे राज्य की परिकल्पना अर्थहीन है।
इसलिए मेरा मानना है कि गृहस्थ वह जिसमें आसक्ति नहीं विरक्ति हो और सन्यासी वो जिसमें समाज के उत्थान की आसक्ति हो।
देखिए ना तुलसीदास सन्यासी होकर राम के मर्यादित प्रेम की गाथा कह रहे हैं जो सन्यासियों के भांति वन में विचरण करता है राम राज्य की स्थापना करता है और महल में एकाकी वास करते हुए इस रामराज्य का संचालन सफलतापूर्वक करता है।

8 . तुलसीदास की ईश्वर और जीव विषयक अवधारणा के बारे में बताइए ?

लोग कहते हैं कि तुलसीदास सगुण ब्रह्म उपासक हैं। मेरा मानना है कि ब्रह्म को या ईश्वर को जो अलग-अलग भाग में बांटकर देखता है वह ब्रह्म या ईश्वर की सत्ता को ही नकार देता है। ईश्वर ईश्वर होता है, हां! उससे जुड़ने का हमारा भाव भिन्न-भिन्न हो सकता है। किंतु तुलसीदास जी इस भिन्नता से भी परे हो चुके हैं क्योंकि यदि वे सगुण ब्रह्म उपासक हैं तो इतनी सुंदर बात निर्गुण ब्रह्म के लिए वह कैसे कह सकते हैं :-

बिनु पग चले सुनई बिनु काना।
कर बिनु करम का करै बिधि नाना।।
आनन रहित सकल रस भोगी।
बिनु बानी बक्ता बड़ जोगी।।
तन बिनु परस नयन बिनु देखा ।
ग्रहई घ्रान बिनु बास बिसेखा।।
असि सब भांति अलौकिक करनी।
महिमा जासु जाई नहीं बरनी।।
श्री प्रभु मोर चराचर स्वामी।
रघुवर सब उर अंतर्यामी ।।

तो तुलसीदास के लिए ईश्वर एक अत्यंत दयालु, कृपालु, सबका स्वामी है जो सब से प्रेम करता है और दीनों से विशेष प्रेम करता है , दुखियों, ब्राह्मणों ( ब्रम्ह में रत रहने वाले ), धरती ( सृष्टि – प्रकृति) , गाय ( कल्याणकारी ,निरीह बेजुबान जंतु ) और सुरों ( प्रकृति के उपासक, रक्षक) के कष्ट निवारण के लिए स्वयं भी कष्ट लेने को तैयार हो जाता है।
ईश्वर सर्वत्र व्याप्त शक्ति है जो कल्याण के लिए कोई भी रूप धर कर आ सकता है।
जीव की उत्पत्ति ईश्वर ने की है ,उसे सृष्टि और प्रकृति के अनुकूल होना चाहिए, प्रतिकूल होने पर ईश्वर द्वारा उसके दंड का प्रावधान है।
जीव प्रेम और परहित के द्वारा ईश्वर से प्रेम और समर्पण कर अपने जीवन को सार्थक कर सकता है।
ईश्वर से जुड़ने के लिए तुलसीदास जी ने स्वयं राम के द्वारा नवधा भक्ति का उपदेश दर्शाया है, जिसमें से कोई भी एक मार्ग चुनकर कोई भी जीव ईश्वर से अपना जुड़ाव या प्रेम प्रदर्शित कर सकता है और निश्चय ही ईश्वर उसे अपनाता है। जिसमें एक प्रकार तो केवल सरल मन और निश्छल होना ही है। राम स्वयं कहते हैं : –

निर्मल मन जन सो मोहि पावा ।
मोहि कपट छल छिद्र न भावा ।।

9 . इस संसार में मनुष्य के जीवन कल्याण के बारे में तुलसीदास ने क्या उपाय बताया है ?

इस संसार में मनुष्य के जीवन कल्याण के लिए तुलसीदास जी ने एकमात्र ईश्वर यानी राम से प्रेम करना बताया है। यदि मनुष्य राम से प्रेम करेगा तो राममय हो जाएगा और राममय होने का अर्थ है सदा दूसरे के कल्याण के विषय में ही सोचना। जो दूसरे के कल्याण के लिए स्वयं के कष्ट की परवाह न करें और स्वयं के सभी सुखों को त्याग देने की क्षमता रखता हो वह निश्चय ही मानव कल्याण के मार्ग पर अग्रसर रहेगा। इसके अतिरिक्त मनुष्य के अंदर कर्त्ता भाव नहीं होना चाहिए, इससे वह अहंकार से बचा रहेगा और सभी सांसारिक कष्टों से अछूता रहेगा। इसके लिए उन्होंने हनुमान और भरत के द्वारा भक्ति के उच्चतम भाव को समझाया है।
लंका दहन के बाद हनुमान कर्त्ता भाव से मुक्त हो कहते हैं : –
साखामृग की भल मनसाई।
साखा ते साखा पर जाई।।

और भरत जी किस तरह का वरदान अपने लिए देव नदी गंगा से मांगते हैं, क्षत्रिय होकर भिक्षुक बनकर वह अपना धर्म त्याग कर देखिए किस तरह का वरदान चाहते हैं:-
अर्थ न धर्म न काम रुचि, गति न चाहौं निर्वान। जनम-जनम रति राम पद, यह बरादानु न आन।।

उनके लिए धर्म की जो अवधारणा है निश्चय ही वह मानव कल्याण के लिए सिद्धहस्त सूत्र है :-

परहित सरिस धर्म नहिं भाई।
पर पीड़ा सम नहि अधमाई।।

10 . तुलसीदास ने अपनी काव्य साधना स्वान्त : सुखाय भाव से की थी . इसका क्या अर्थ है . आज आदमी किस भाव से जीवन को जीता प्रतीत होता है ?

तुलसीदास जी केवल एक रचनाकार नहीं थे ; निश्चय ही वे एक चिंतनशील विचारक, दार्शनिक व्यक्ति थे जो तत्कालीन समाज में धार्मिक, राजनैतिक, सामाजिक और व्यक्तिगत नैतिक मूल्यों का पतन देख रहे थे। रामचरितमानस के अतिरिक्त उन्होंने राम से अपनी भक्ति के कारण अनेक रचनाएं रची जैसे कवितावली, गीतावली, दोहावली, विनय पत्रिका , रामलला नहछू आदि।
किंतु रामचरितमानस की रचना उन्होंने समाज को एक दृष्टि, गति और आदर्श स्थापित करने के लिए की।” स्वांतः सुखाय ” में उनके सुख का एक बहुत बड़ा स्वरूप दृष्टिगोचर होता है : कितना ही सुंदर हो यदि रामचरितमानस में वर्णित चरित्र हमारे वास्तविक समाज में मिलने लगे और उस तरह का रामराज्य स्थापित हो सके तो यह तुलसीदास तो क्या किसी के लिए भी सुख कर, सबसे सुख कर बात होगी !

विनीता मिश्रा
विज्ञान स्नातक, कवि एवं स्वतंत्र लेखन,रामचरित मानस का अध्ययन एवं राम साहित्य का पठन – पाठन एवं चिंतन।एक कविता संग्रह प्रकाशित। अध्यात्मिक कविता संग्रह प्रकाशन के लिए तैयार।अध्यात्मिक वक्ता।विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित।