हिंदू धर्म , समाज और संस्कृति के नायक : गोस्वामी तुलसीदास

राजीव कुमार झा
तुलसीदास को हिंदी का सबसे श्रेष्ठ कवि कहा जाता है . उन्होंने ‘ रामचरितमानस ‘ और ‘ विनय पत्रिका ‘ इन महान काव्य ग्रंथों की रचना की है . हिंदू धर्म के अनुयायी तुलसीदास के संदेश को हृदय से ग्रहण करते हैं . ईश्वर की विराटता और जीव के प्रति उसकी करुणा तुलसीदास की काव्य चेतना का प्रमुख पक्ष है . मध्यकाल के विघटित सामाजिक – राजनीतिक – सांस्कृतिक परिवेश में रामकथा को लोकभाषा अवधी में लिख करके उन्होंने अनेकानेक मत मतांतरों में विभाजित धर्मप्राण हिंदू जनमानस में समन्वय की चेतना का संचार किया था और नवजीवन प्रदान किया था . तुलसीदास का काव्य ईश्वर के प्रति मनुष्य के मन को असीम आस्था का संदेश देता है और संसार में सबको सद्कर्मों के लिए प्रेरित करता है . उनका काव्य धर्म – नीति और विवेक के माध्यम से मनुष्य को अनेकानेक विषमताओं से परिपूर्ण इस संसार के संताप और क्लेश से निरंतर उबारता है और मनुष्य को जीवन के संघर्ष के पथ पर अग्रसर करता है . तुलसीदास का जन्म उत्तर प्रदेश के बाँदा जिले में राजापुर नामक गाँव में हुआ था . वे बचपन में निराश्रित हो गये थे और नरहरिदास नामक किसी संत ने इस अवस्था में उनकी देखरेख की थी और शास्त्रों का समुचित ज्ञान प्रदान किया था . रामचरितमानस के शुरू में तुलसीदास ने उनका स्मरण भी किया है – ‘ बँद उ गुरुपद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि । महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर ॥ ‘ हिंदी कविता के इतिहास में भक्तिकाल को स्वर्णकाल कहा गया है . तुलसीदास इसी काल के कवि हैं और उनका महाकाव्य रामचरितमानस संसार में उनका कीर्ति स्तंभ माना जाता है . वे सरयूपारीण ब्राह्मण कहे जाते हैं और उनके बारे में ऐसी जनश्रुति भी प्रचलित है कि उन्होंने विवाह भी किया था और पत्नी रत्नावली की प्रेरणा से सांसारिक जीवन से विमुख होकर ईश्वर प्रेम को पाने की साधना में संलग्न हो गये थे . तुलसीदास ने इसके लिए काव्य साधना का अवलंबन किया था . तुलसीदास हिंदी की लोक काव्य परंपरा के मर्मज्ञ थे और शास्त्रों की अगाध ज्ञान गरिमा का भी उनमें समावेश था . अपने काव्य लेखन से उन्होंने मनुष्य को उसके कर्मपथ पर अग्रसर किया है . रामचरितमानस को प्रबंधकाव्य के रूप में देखा जाता है और राम – रावण की युद्ध कथा इसके मूल में है . उन्होंने इस काव्यग्रंथ में व्यक्ति – परिवार और समाज की परिधि में सत्ता – शासन और संस्कृति से जुड़ी तमाम अनुकरणीय बातों को वर्णन किया है . रामचरितमानस में उन्होंने वेदों – उपनिषदों – पुराणों का सार प्रस्तुत किया है . उन्हें अकबर का समकालीन कहा जाता है और उसके मंत्री टोडरमल से भी उनकी मित्रता थी . राजस्थान की कवयित्री मीराबाई से भी उनकी मुलाकात का जिक्र किया जाता है . तुलसीदास को रामभक्त कवि कहा जाता है और दास्य भाव से उन्होंने राम की उपासना की है . काशी में गंगा के पावनतट पर वास करते हुए वे काव्य साधना में मृत्युपर्यंत संलग्न रहे . यहाँ का तुलसी मंदिर और मानस मंदिर को उनका स्मृति स्थल माना जाता है ।