प्रकृति और जीवन के विघटन की चिंता से उपजी कविताएँ

पुस्तक : डूबती टिहरी की आखिरी कविताएँ , संपादक : हेमचंद्र सकलानी , प्रकाशक : समय साक्ष्य , 15 फालतू लाइन , देहरादून – 248001, उत्तराखंड

 ‘ जल – समाधि में लीन हैं स्मृतियाँ . और निर्मित करती हैं स्मारक . स्मृतियों का . तेजी से व्यतीत होते वर्तमान का . चित्र . अतीत बन जाएगा . किसी भविष्य में . इतिहास के हाशिए पर . एक छोटे से . काले बिन्दु जैसा . डिठौना बन जाएगा . अकस्मात् . किसी दिन दैवीय चमत्कार से . सामने होंगे भावी लोगों के . काई लिपटे घर , पथ , वीथियाँ . महीन रेत के कण – कण में . चमकेगा स्मारक . किसी भविष्य में . . .। ( गंगा प्रसाद विमल की कविता ‘ स्मारक ‘)
प्रस्तुत काव्य संग्रह में दिवंगत कवि गंगाप्रसाद विमल की यह कविता हमारे जीवन में विकास की अंधी दौड़ में अपने परिवेश की निरंतर बदलती सारी चीजों के यथार्थ का बयान करती हैं. हिमालय के शांत सुरम्य पावन परिवेश में भी विकास की इस हलचल में यहाँ के नैसर्गिक जीवन की गति और लय सिमटती जा रही है . आज मनुष्य अपने वर्तमान जीवन की जरूरतों को लेकर ही इतना आत्मकेंद्रित और स्वार्थी हो गया है कि उसके जीवन का अतीत स्मृति के रूप में किसी स्मारक के समान होता जा रहा है . हमारे जीवन में यद्यपि स्थायी कुछ भी नहीं है लेकिन यह भी जरूरी है कि धरती पर जो सुंदर जीवन है वह कायम रहे और किसी दिन आधुनिकता और विकास की इस आपाधापी के खत्म होने के बाद हम किसी भावी काल के स्मृति कुंड में उदास और धुँधले दिखायी नहीं दें और इसकी चिंता आज के जीवन में सबको होनी चाहिए .
 सुपरिचित साहित्यकार हेमचंद्र सकलानी के संपादन में प्रकाशित काव्य संकलन ‘ डूबती टिहरी की आखिरी कविताएँ ‘ में संकलित कविताएँ आधुनिक विकास की विशालकाय परियोजनाओं के माध्यम से पर्यावरण और जनजीवन के दूसरे पहलुओं पर इससे कायम होने वाले बदलावों और इससे उभरने वाले विचलन को लेकर लिखी गयी हैं . पिछले कुछ समय से साहित्य में प्रकृति के क्षरण की चिंताओं के साथ इससे जुड़े विविध सवालों ने विचार और चिंतन की दुनिया में एक व्यापक विमर्श को शुरू किया है और इस संग्रह की कविताएँ उसी कड़ी के विस्तार के रूप में देखी जा सकती हैं और इनमें उत्तराखंड के साहित्यिक परिवेश में सक्रिय नयी – पुरानी पीढ़ी के अनेक कवियों की कविताएं संग्रहित हैं .
आधुनिक भौतिकवादी जीवन सभ्यता और संस्कृति के भोगवादी दर्शन में हमारी समस्त पुरातन आस्थाएँ – विश्वास – जीवनमूल्य निरंतर आज सर्वत्र छिन्न भिन्न होते जा रहे हैं और विकास की रंगबिरंगी रोशनी के साथ फैलते शोर शराबे में मनुष्य के जीवन की आध्यात्मिक शांति भी सिमटती प्रतीत होती है – ‘ हे टिहरी . तेरे ही आँगन उमड़ता था . जन सैलाब , पवित्र डुबकी लगाने को . वसंत पंचमी और मकर संक्रांति पर . गंगा – भिलंगना के संगम पर नहाने को । तुमने जन्म लिया मिट जाने को , अनंत जलराशि में समाधिस्थ हो जाने को । थम गया भागीरथी का प्रबल – प्रवाह . एक बाँध बनाने को . मानव के घर दीप जलाने को . विद्युतमय बल्बों में बिजली बन , टिमटिमाने को । ‘ ( भागवत चौहान शैलपुत्र की कविता दीप जलाने को )
कविता के स्मृतिलोक में मनुष्य के जीवन की विलुप्त आत्मिक और भौतिक परिवेश की तमाम वो चीजें जिन्हें बचाने और फिर से पाने कहीं उन्हें अपने बीच निरंतर स्थापित करने की भावना से उपजी इन कविताओं में धरती पर मानवजन्य कार्यों उसकी गतिविधियों पर गहन चिंतन और विमर्श के बीच सबको आमंत्रित करती हैं . उत्तराखंड के पर्वतीय जनजीवन का यथार्थ अपनी परंपरागत जीवन संस्कृति और उसके भीतर मनुष्य के प्रकृति को बचाने के संघर्ष को इन कविताओं में विशेष स्थान मिला है . इस प्रसंग में मंगलेश डबराल की कविता का उल्लेख भी समीचीन है – ‘ इन पत्थरों में . अब भी आग बाकी है . और इतिहास भी . इनसे एक मकान बनेगा . एक खेत का पुश्ता . एक लड़ाई और . लड़ी जाएगी . अभी . इन पत्थरों से . ( मंगलेश डबराल की कविता ‘ आग बाकी है ‘ )
इस संग्रह में  , राजेन टोडरिया , शिवप्रसाद जोशी , जगमोहन आजाद और लोकेश नवानी की कविताओं में भी प्रकृति के प्रति प्रेम और मानवजनित स्वार्थपूर्ण कार्यों से इसके पतन की पीड़ा के भाव सहजता से प्रकट हुए हैं . इनकी कविताओं के अलावा भारती पाण्ड , चारुचन्द्र चन्दोला ,अंजलि नौटियाल और जी . पी . नौटियाल की कविताओं में भी मौजूदा समय में चतुर्दिक विस्थापन के संकट की चर्चा खास तौर पर पढ़ने को मिलती है . इस संकलन में राजीव पैन्यूली ,रमेश कुड़ियाल ,श्री प्रसाद गैरोला ,श्रीदेव सुमन , विमल भाइ , गिरिराज उनियाल , डा . अतुल शर्मा , विपिन बिहारी सुमन , बुद्धिबल्लभ थपलियाल की कविताओं में भी पहाड़ के जनजीवन की संवेदनाएँ सहजता से साकार हुई हैं . इसी संदर्भ में सुरेंद्र पुंडीर , नीलम नेगी , वीणापाणि जोशी और कमलेश्वरी मिश्रा की काव्यानुभूतियों की विवेचना भी की जा सकती है .
हिंदी कविताओं के साथ इसमें उत्तराखंड की लोकभाषाओं में रची कविताओं को भी इसमें संकलित किया गया है और इस दृष्टि से मदन मोहन डुकलाण , जीवानंद श्रीयाल ,धर्मानंद कोठारी और ओम बधाणी के अलावा ज्ञान पंत की कविताओं में यहाँ के लोक समाज का सच्चा जीवन स्वर अभिव्यक्त हुआ है .
सदियों से धरती पर मनुष्य का जीवन प्रकृति के विभिन्न तत्त्वों जंगल हरियाली नरम धूप बारिश नदियाँ साफ स्वच्छ हवा असंख्य पेड़ पौधों से परिपूर्ण इस पृथ्वी पर विभिन्न प्रकार के रोचक जीव जंतुओं की साहचर्यता में व्यतीत होता रहा है . लेकिन पिछली कुछ शताब्दी से हम निरंतर अपनी इस जीवन संस्कृति से किनारा करते चले गये . पृथ्वी पर मानव केंद्रित इस जीवन संस्कृति के दुष्परिणाम बेहद स्पष्टता से अक्सर साकार होते प्रतीत होते हैं . इसके बावजूद विकास की इस आपाधापी में हमारी आधुनिक जीवन संस्कृति की भोग लिप्सा में कहीं कोई ठहराव नजर दिखायी नहीं देता है . इस काव्य संग्रह में संकलित कविताएँ हमारे वर्तमान जीवन के ऐसे ही संकटों की विवेचना करती हैं .
विकास की अंधी दौड़ में मनुष्य के जीवन के तमाम पहलू अपनी पहचान को खोकर समय के धुँध में उभरती पुरानी आहटों के साये में फिर से अपने नये पुराने जीवन को जानने पहचानने प्रक्रिया निरंतर किसी बेचैनी की आवाजाही से गुजरता दिखायी देता है . आधुनिक विकास की विद्युत – सिंचाई , महानगरों के लिए लंबी भारी भरकम पेयजल की उपलब्धता की डैम परियोजनाओं एवं उद्योग धंधों की स्थापना के साथ विकास की चहल पहल के अन्य कार्यों से देश के मैदानी – पठारी हिस्सों के अलावा हिमालय का शांत सुरम्य और पावन परिवेश भी विनाश की चपेट में घिरता दिखायी दे रहा है . साहित्य सदैव समग्रता में हमारे जीवन के इन तमाम परिवर्तनों को लेकर सार्थक चिंतन को प्रस्तुत करता रहा है . इस प्रसंग में सुपरिचित साहित्यकार हेमचन्द्र सकलानी के संपादन में प्रकाशित कविता संकलन ‘ डूबती टिहरी की आखिरी कविताएँ ‘ सबके लिए पठनीय कही जा सकती हैं और इसमें विभिन्न कवियों की संकलित कविताएँ भागीरथी और भिलंगना नदी के जल समाधि की कीमत पर उत्तराखंड के टिहरी में प्रकृति के विध्वंश और जनजीवन के विस्थापन की कथा का बयान करती प्रतीत होती हैं .

समीक्षक : राजीव कुमार झा