नामवर सिंह का साहित्य चिंतन

 राजीव कुमार झा
हिंदी साहित्य में नामवर सिंह की अनुपस्थिति को उनके चले जाने के बाद सदैव महसूस किया जाता है . आज हिंदी साहित्य में उनके जैसे प्रतिष्ठित विद्वानों का बिलकुल अभाव हो गया है . यहाँ अब आलोचक के नाम पर अकादमिक पृष्ठभूमि के कुछ लोग हैं लेकिन उनकी ज्ञान गरिमा जाहिर है . नामवर सिंह प्रगतिशील चिंतक थे और खुद को हजारी प्रसाद द्विवेदी का शिष्य वे बताया करते थे . उनकी शिक्षा दीक्षा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में संपन्न हुई थी . नामवर सिंह ने छायावाद नामक अपनी पुस्तक में राष्ट्रीय आंदोलन की पृष्ठभूमि में स्वतंत्रता पूर्वकाल की हिंदी कविता के सामाजिक – राजनीतिक सरोकारों की सारगर्भित विवेचना लिखी है . वे कथालोचक भी थे और अपनी पुस्तक कहानी नयी पुरानी में आधुनिक हिंदी कथा लेखन में नयी प्रवृत्तियों के विकास को उन्होंने भलीभाँति रेखांकित किया था . वे लगातार साहित्यिक संगोष्ठियों में शिरकत करते थे और प्राय : कार्यक्रम के अंत में बीज वक्तव्य की समाप्ति के रूप में अपना भाषण प्रस्तुत करते थे . जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में लंबे अर्स तक वे प्रोफेसर के पद पर कार्यरत रहे ।