कविता में कवि की आत्मा का स्वर समाया होता है

पुस्तक : शब्दों के पंछी ( कविता संग्रह ) कवि : हेमचन्द्र सकलानी , प्रकाशक : शब्द – संस्कृति प्रकाशन , 74 – A , न्यू कनाट प्लेस , देहरादृन , उत्तराखंड , मूल्य : -₹ 50

समीक्षक : राजीव कुमार झा

‘ क्या तुम्हें दूँ . मै . समर्पण के सिवा . अब शेष क्या . वही अर्पण के भाव . तुम्हें दर्शाना है . लौट आयेगा . दिया आधार गौरव . न तुम दो . न बाँधो मन से . कोई उपेक्षा . आकंठ . एकाश्रित . मैं ही स्वीकार कर लूँ . अंतिम समागम . पूर्णता . इस विदा क्षण में . चलो . कर दो . मुक्त मन से . आकांक्षाएँ . उड़े होकर ( स्वच्छंद )

हेमचंद्र सकलानी के काव्य संग्रह ‘ शब्दों के पंछी ‘ को पढ़ते हुए कवि के वैयक्तिक जीवन की अनुभूतियों के अलावा उसके सामाजिक सरोकारों से भी गुजरने का मौका मिलता है . कविता के इन दोनों पाटों के बीच उसकी रचनायात्रा की तमाम अंतर्धाराओं में एक गहरे चिंतन का समावेश है और वर्तमान परिवेश के विषम सवालों को लेकर एक आकुल हृदय का व्याकुल स्वर भी इनमें समाया है . इन कविताओं में यथार्थ और कल्पना के सुंदर समावेश से कवि ने कविता के स्वर को जीवन के सार्थक भाव विचारों से सँवारा है . कवि इन कविताओं में जीवन की सुंदरता को रचने गढ़ने के यत्न में संसार के प्रति अपने मन के आत्मिक संस्पर्श से सबको अभिभूत करता प्रतीत होता है और कविता का सतरंगा आकाश विभिन्न ऋतुओं और कालों के सौंदर्य को समेट कर इन कविताओं के सुनहले फलक को प्राणवान बनाता है . इस दृष्टि से इस संग्रह की तमाम कविताओं को पढ़ना एक बेहद सुंदर अनुभव कहा जा सकता है जिसमें समाहित राग विराग जीवनपथ पर मनुष्य की यात्रा और उसके संघर्ष के तमाम पड़ावों से हमें अवगत कराते हैं . हेमचंद्र सकलानी के काव्य में उत्तराखंड के ऐकांतिक प्राकृतिक परिवेश से घिरे मन का उथलपुथल जीवन की नैसर्गिक हलचल की तरह से इन कविताओं में प्रकट होता दिखायी देता है और उसकी जीवन चेतना पर संसार की सम – विषम परिस्थितियों का गहरा प्रभाव इन कविताओं में सर्वत्र परिलक्षित होता है ।

‘ रोज सुबह . खिड़की पर . दस्तक देती है धूप . माँ की तरह . प्यार से थपथपाकर . जगाती है धूप . उष्मा भरी . ममता के आंचल से . एक अनाम आश्वस्ति . गर्मजोशी की पहल सी . बाँध लेती अपनी बाँहों में . बिछ जाती राहों में . सुबह फिर से सजग करती है . बढ़ने के लिए . बढ़ना ही जीवन है . एक बीज की तरह . फूटकर . धीरे धीरे बन जाता . एक विशाल वटवृक्ष . सतत पाता है . धूप की उष्मा . सुबह . जीवन को देती . आने वाली . धूप का आभास . धूप सिर्फ धूप नहीं . जीवनदायी कृतित्व है . ममत्व है . अस्तित्व है सृष्टि का । ( धूप )

कविता लेखन की प्रक्रिया में यथार्थ को कविता के भीतर वस्तु के रूप में और कल्पना को अलंकार के रूप में देखा जाता है . इससे कविता में सर्जना का द्वंद्व कायम होता है और कविता रूप रस से जीवंत हो उठती है . हेमचंद्र सकलानी की कविताओं की विशिष्टता की पहचान इसी अनुरूप की जा सकती है .

काव्य लेखन का संबंध संस्कृति के सृजन से है और कविता में कवि की आत्मा का स्वर समाया होता है . वह अपनी जीवनानुभूतियों से इस स्वर का संधान करता है .

‘ सदियों से . पीड़ित मानव को . मानवता का मिले आँचल . दानव को . मिले वनवास . सभ्यताओं के . खंडहर में . संस्कृति में . संस्कृति के अस्थि पंजर से . मुखर उठे इतिहास ( काश )

सदियों से कविता में प्रेम को उसके मूल रचनातत्व के रूप में देखा परखा जाता है और प्रेम अपने विविध रूपों में कवि की जीवनानुभूतियों को सहजता और सरसता से प्रकट करता व्यंजना के रूप में कविता के पाठ को प्रामाणिक रूप प्रदान करता है . प्रेम की परिधि में कवि ने अपने तमाम वैयक्तिक – सामाजिक संबंधों की उष्मा को इन कविताओं में समेटा है और प्रकारांतर में समाज और परिवेश के यथार्थ की विवेचना को प्रस्तुत किया है . मानवीय धरातल पर ये कविताएँ अपने समय और इसकी आहट में समायी तमाम तरह की जटिल विषम बातों को भी अपनी विषयवस्तु में प्रकट करती हैं . इन कविताओं में मनुष्य के स्वप्न और उसके रुपहले यथार्थ को खास तौर पर अपने विवेचन में शामिल किया है और अपनी कविताओं में हर तरह के भटकाव से खुद को बचाते हुए संसार में जो कुछ भी सुंदर और शाश्वत है उससे कविता को रचता और बार बार उसे सुनाता जीवन के सच्चे राग विराग से मंत्रमुग्ध कर देता है .

हेमचंद्र सकलानी साधारण और सामान्य जन के कवि हैं और इन कविताओं में जीवन की विषम स्थितियों को झेलते लोगों के प्रति उसके मन की पीड़ा भी समायी है . वह समय को गौर से देखता निहारता इसके खौफ से भी गुजरता दिखायी देता है और कविता के भीतर जीवन के सामंजस्य के पक्ष में चिंतनरत होकर मनुष्यता के पक्ष में निरंतर एक विमर्श में सबके साथ संलग्न होकर जीवन की उर्वर भावभूमि की ओर सबको प्रस्थान के लिए प्रेरित करता है . इस संग्रह की कुछ कविताओं में कवि का हृदय उत्तराखंड की अपनी धरती इसके अलौकिक सौंदर्य से भी अभिभूत दिखायी देता है ।

‘ ये मेरे . सपने देखने के दिन हैं . भूख प्यास के हथौड़ों से . मत तोड़ो . मेरी परीकथाओं के दिन . मत बाँधों जंजीरों से . मेरी निश्छल मुस्कान . मत चुराओ पंख . मेरे सपनों के . ये मेरे . उड़ने – चहचहाने के दिन हैं ( बचपन )

‘ स्वच्छंद विचरने लगे . अब दरिंदे . ओढ़ . श्वेत कपोतों की पोशाकें . सूने – सूने से हो गये . सदा हरित वृक्ष . डरने लगे परिंदे . लकड़ी की कुर्सियाँ . बन गयीं . अब सिंहासन . बैठ गये जिन पर नाग . हो गया विषैला . मानसिक पर्यावरण . सर्प की फुंकारें . करती . जिनका अभिनंदन . ऐसे अभिनंदन के . गुंजन में . ना जाने कहाँ . खो ज़ाता है . मानवता का क्रंदन ( क्रंदन )

उत्तराखंड के सुपरिचित कवि हेमचंद्र सकलानी के कविता संग्रह ‘ शब्दों के पंछी ‘ में संग्रहित कविताएँ कवि के हृदय के वैयक्तिक जीवन के मनोभावों में समाहित राग विराग के साथ उसके सामाजिक सरोकारों को भी प्रकट करती हैं . कवि ने इनमें वर्तमान परिवेश के यथार्थ को भी प्रकट किया है और मानव मन की सहज अनुभूतियाँ इनमें खासकर परिलक्षित होती हैं . कविता में अभिव्यक्ति का दायरा जितना आत्मीय और जीवंत होता है अपनी प्राणवत्ता में भी वह उतनी ही सजीव होती है . इस दृष्टि से काव्यकला के निकष पर हेमचन्द्र सकलानी की कविताओं की चर्चा समीचीन है . इसमें कवि जीवन के संधान में संवाद के साथ एक गहरे आलाप में अपने मनोगत हलचल को सच्चे शब्दों के सहारे प्रकट करता प्रतीत होता है और कविता के माध्यम से जीवन यथार्थ के अन्वेषण में प्रवृत्त होता है .

सागर की चंचल . फेनिल लहरों में देखा . सावन के उमड़ते – घुमड़ते . मेघों में देखा . बर्फ में डूबे पहाड़ों पर . पसरी चाँदनी में देखा . चीड़ – देवदार के वनों से गुजरती . सर्द हवाओं के लोकगीतों में . महसूस किया . ( कहाँ – कहाँ महसूस नहीं किया )