प्रेमचंद का साहित्य लेखन और उसकी प्रासंगिकता

राजीव कुमार झा

प्रेमचंद का जन्म 31जुलाई 1880 में बनारस के पास लमही नामक गाँव में एक साधारण कायस्थ परिवार में हुआ था . उनके पिता डाकघर में मुंशी थे और बचपन में ही उनकी माँ का देहांत हो गया था . कुछ दिनों के बाद उनके पिता भी चल बसे और इस प्रकार काफी छोटी उम्र में उन्हें परिवार के भरण पोषण का दायित्व सँभालना पड़ा . प्रेमचंद के कथा साहित्य में समाज का सच्चा चित्र समाया है . वे साहित्य को समाज के निर्माण का साधन मानते थे . प्रेमचंद का लेखन विचार और चिंतन के पथ पर सदैव अग्रसर करता रहेगा .

प्रेमचंद ने हिंदी गद्य लेखन को आगे बढ़ाया और कथा लेखन को तिलिस्म और ऐय्यारी की प्रवृत्तियों से बाहर यथार्थ के धरातल पर अधिष्ठित किया . उन्होंने शुरू में कहानी लेखन से अपनी तरफ सबका ध्यान आकृष्ठ किया और तत्कालीन ब्रिटिश सरकार के द्वारा उनका कहानी संग्रह ‘ सोजे वतन ‘ जब्त कर लिया गया था . प्रेमचंद की आरंभिक कहानियाँ उर्दू में हैं और वे इस अदब में नवाब राय के नाम से आज भी प्रसिद्ध हैं . उन्होंने भारत की ग्रामीण जीवन संस्कृति की श्रेष्ठ परंपराओं को अपनी कहानियों में रेखांकित किया है और इस समाज की विसंगतियों का बयान भी कथा लेखन में किया है . आज भी ईदगाह , बूढ़ी काकी , नमक का दारोगा , बड़े घर की बेटी और पंच परमेश्वर शीर्षक कहानियाँ उनके लेखन के सार्वकालिक संदर्भ को उजागर करती हैं . इसके अलावा प्रेमचंद ने निर्मला और गबन जो उनके उपन्यास हैं इनमें समाज में नारी जीवन व्यथा का चित्रण किया है . उस समय अनमेल विवाह का भी प्रचलन था और लड़कियों का जीवन बेबसी की जंजीरों से बँधा था . इन उपन्यासों में इन सामाजिक बुराइयों का चित्रण उन्होंने किया है . प्रेमचंद के साहित्य में समाज में विभिन्न धर्मों के लोगों के बीच आपसी मेलजोल की भावना का वर्णन पढ़ने को मिलता है और उन्होंने रंगभूमि , कर्मभूमि के अलावा अपने संसार प्रसिद्ध उपन्यास ‘ गोदान ‘ में देश में ब्रिटिश शासन के साये में पूँजीपतियों और जमींदारों के द्वारा किसानों – मजदूरों के शोषण का चित्रण किया है . प्रेमचन्द के लेखन पर गाँधीवादी जीवनमूल्यों और आदर्शों का गहरा प्रभाव है . जीवन में खुद को कलम का मजदृर बताने वाले इस लेखक का नाम संसार के महान लेखकों की कतार में शामिल है . उनका साहित्य मानवीय चिंतन की अनमोल विश्व विरासत है .

मचंद ने उर्दू में कथा लेखन से अपना साहित्यिक सफर शुरू किया था और ब्रिटिश सरकार के द्वारा उनका पहला कहानी संग्रह ‘ सोजे वतन ‘ जब्त भी कर लिया गया था . इसमें उनके देशप्रेम की कहानियाँ संकलित थीं . वे सरकारी सेवक थे और ब्रिटिश सरकार के अधीन स्कूल इंस्पेक्टर के पद पर कार्यरत थे इसलिए बनारस के कलक्टर ने अपने दफ्तर के कमरे में बुलाकर उन्हें डाँट डपट किया था और आइंदा ऐसे लेखन से आगाह किया था . असहयोग आंदोलन के दौरान उन्होंने सरकारी नौकरी से त्यागपत्र भी दे दिया और हंस नामक पत्रिका का संपादन करने लगे . प्रेमचंद ने अपने लेखन से समाज में सभी लोगों को समानता और स्वतंत्रता का संदेश दिया . पहली बार उनके लेखन से समाज में दलितों – अछूतों की जीवन व्यथा उभरकर साहित्य में समाहित हूई . उनकी कहानी ‘ मंदिर ‘ धर्म के सनातनी पाखंडी पंडे पुरोहितों की संवेदनहीनता को उजागर करती है और समाज में सदियों से शोषण से त्रस्त तबकों के लोगों के जीवन का दुख दर्द उनकी कहानियों में समाया है . प्रेमचंद को हिंदी में उपन्यास सम्राट कहकर सम्मानित किया जाता है . उनके उपन्यास गोदान में ब्रिटिश काल की जमींदारी व्यवस्था में ग्रामीण समाज के शोषित तबके के तौर पर किसानों की समस्याओं का उल्लेख है . उन पर गाँधी जी के जीवनादर्शों का गहरा प्रभाव था . अपने उपन्यास निर्मला में दहेज प्रथा और अनमेल विवाह की समस्या का चित्रण है . वे सच्चे संघर्षशील लेखक थे और उनके लेखन का गहरा प्रभाव आज भी हिंदी लेखन पर कायम है .

हिंदी साहित्य में प्रेमचंद को आधुनिक काल का सबसे महान लेखक माना जाता है . उन्होंने अपने कथा लेखन से हिंदी साहित्य को नयी भावभूमि पर प्रतिष्ठित किया . प्रेमचंद को सामाजिक – राजनीतिक रूप से प्रतिबद्ध लेखक माना जाता है और उन्होंने भारत में ब्रिटिश शासन के अलावा वर्ण व्यवस्था पर आधारित सामाजिक व्यवस्था और सामंतवाद पर आधारित भूमि व्यवस्था का भी विरोध किया था . अपनी एक कहानी ‘ सद्गति ‘ में उन्होंने ऊँची जाति के किसी ब्राह्मण पंडित के दरवाजे पर एक अछूत जो शायद उसका कर्जदार भी है उसके अपमान और उत्पीड़न का सजीव और मार्मिक चित्रण किया है . प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक सत्यजीत राय ने इस कहानी पर फिल्म निर्माण भी किया . उन्होंने प्रेमचन्द की एक कहानी ‘ शतरंज के खिलाड़ी ‘ पर आधारित फिल्म का भी निर्देशन किया . इस कहानी में ब्रिटिश गुलामी के दलदल में देश की अवनति के काल में भारत के राजे रजवाड़ों नवाबों और यहाँ के अन्य सामाजिक वर्गों के लोगों के चारित्रिक पतन की विचारपरक कथा का सजीव वर्णन उन्होंने किया है .