समाज में पुस्तक संस्कृति के विकास में समीक्षा लेखन का योगदान।
पुस्तक समीक्षा
रचनाशीलता का गणित
लेखक : दिलीप कुमार पाण्डेय
प्रकाशक: आस्था प्रकाशन
89 न्यू राजा गार्डन, मिठ्ठापुर रोड
जालंधर ( पंजाब)
मूल्य: 350.00
राजीव कुमार झा
आलोचना को साहित्य चिंतन की विधा कहा जा सकता है और अक्सर विद्वान निबंध से इसे काफी भिन्न मानते हैं। साहित्य की इस विधा के बारे में यह भी कहा जाता है कि इसके प्रतिपाद्य
में किसी कालखंड की साहित्यिक प्रवृत्तियों की पहचान और उसकी सृजनात्मकता के आकलन का भाव मुख्य रूप से समाहित होता है। इस दृष्टि से जाहिर है कि आलोचना एक तरह से साहित्य की विशिष्ट पुस्तकों की चर्चा को वैचारिक विमर्श और चिंतन में प्रस्तुत करती है लेकिन आधुनिक काल में साहित्य लेखन का दायरा अत्यंत विस्तृत होता गया और
साहित्य के मूल्यांकन की लोकप्रिय विधा के रूप में आलोचना के साथ समीक्षा का भी हिंदी में काफी विकास हुआ।
समीक्षा के विकास में मीडिया की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि अखबार और पत्र पत्रिकाओं के माध्यम से समीक्षा समाज में निरंतर लिखी जा रही नयी पुस्तकों की चर्चा को लेकर सामने आयी और हिंदी में इस तरह से इसे बहुत महत्वपूर्ण माना जाने लगा। सचमुच समाज में पुस्तक संस्कृति के विकास में समीक्षा लेखन का योगदान उल्लेखनीय है।
यहां पंजाब के जालंधर के सुपरिचित समीक्षक दिलीप कुमार पाण्डेय की प्रस्तुत पुस्तक ‘ रचनाशीलता का गणित ‘ की चर्चा इस प्रसंग में काफी विशिष्ट प्रतीत हो रही है और इसमें वर्तमान दौर के कई लेखकों की विविध विधाओं में लिखी पुस्तकों
की चर्चा को पढ़ते हुए साहित्य लेखन से जुड़े रचनात्मक सरोकारों को वैचारिक धरातल पर जानने समझने का मौका हमारी साहित्य चेतना के जीवन के नये संदर्भों से अवगत कराता है और सामाजिक सरोकारों को भी विस्तृत करता है।
प्रस्तुत पुस्तक को पढ़ते हुए वर्तमान दौर में साहित्य लेखन की तमाम प्रचलित विधाओं में
सृजन के समवेत उपक्रमों से अवगत होने का अवसर प्राप्त होता है और इस प्रसंग में सबसे पहले समीक्षक
के द्वारा पद्य खंड के प्रथम अध्याय के रूप में काव्य संग्रह समीक्षा के अंतर्गत लिखी गयी अनेक जाने पहचाने कवियों के काव्य संग्रहों की समीक्षा को पढ़ने का मौका मिलता है। इनमें मोहन सपरा , प्रियवंदा पांडेय, सीमा भाटिया, सरला भारद्वाज के काव्य संग्रहों के अलावा डा शशिकला लढ़िया के कविता संग्रह की समीक्षाओं को पढ़ना पुस्तक चर्चा के बेहद दिलचस्प अनुभवों में शुमार किया जा सकता है। इसमें अतुल कुमार शर्मा के काव्य संग्रह ‘ मुरारी की चौपाल ‘ की समीक्षा भी शामिल है।
पुस्तक समीक्षा लेखन का व्यापक सरोकार साहित्य चिंतन के विविध पहलुओं से अभिन्न रूप में जुड़ा होता है और इसमें
समय , समाज और संस्कृति के साथ लेखन के वैचारिक उपक्रमों के अन्वेषण की बात को सबसे प्रमुख माना जाता है। इसमें विषय विवेचन के अलावा अंतर्वस्तु के रूप में लेखक कविता के फलक पर जीवन की हलचल के साथ मनुष्य के हृदय के राग विराग को केन्द्र में रखकर
आलोचना की अभिव्यंजनावादी शैली में साहित्य की संश्लिष्ट चेतना को अपनी व्याख्या में विशेष रूप से उजागर करने में तल्लीन दिखाई देता है। इसे समीक्षा लेखन की वस्तुपरक शैली भी कहा जा सकता है और इस दृष्टि से दिलीप कुमार पाण्डेय के समीक्षा लेखन की विशिष्टता को इस पुस्तक में सम्मिलित सारे अध्याय विशेष रूप से रेखांकित करते हैं और इनमें उनकी लिखी प्रबंध काव्य की समीक्षा को भी शामिल करना समीचीन होगा।
आज के दौर में साहित्य सृजन तमाम विधाओं में संपन्न हो रहा है और इस नजरिए से दिलीप कुमार पाण्डेय के द्वारा लिखित इस पुस्तक में आत्मकथा, जीवनी, रिपोर्ताज , डायरी संस्मरण इन विधाओं की पुस्तकों की समीक्षा भी अगर आप पढ़ना चाहते हैं तो यहां आपको निराशा का सामना करना पड़ेगा और इसमें कविता – कहानी -उपन्यास और लघुकथा इन विधाओं की पुस्तकों की समीक्षा ही इस प्रकार इस पुस्तक में संकलित है।
लेखक ने किसी नाट्यकृति की
समीक्षा को भी इस पुस्तक में शामिल नहीं किया है।
आज के दौर में हिन्दी कविता अपनी संवेदना, भाषा, शिल्प और शैली में कई प्रकार की नयी भाव भंगिमा को प्रकट कर रही है। इसमें नये – पुराने काव्य रूपों का प्रचलन भी समान रूप से दिखाई देता है। इसलिए दिलीप कुमार पाण्डेय की इस पुस्तक में दोहा, क्षणिका ,कुंडलियां और ग़ज़ल इन सारे काव्य रूपों पर आधारित कविता संग्रहों की समीक्षा भी पढ़ने को प्राप्त होती है । इस क्रम में शिव कुमार ‘चंदन’ , डॉ ज्ञान प्रकाश ‘ पीयूष ‘
और ज्ञानेंद्र पांडेय के काव्य संग्रहों की समीक्षा भी इस पुस्तक में शामिल है। पुस्तक के अगले खंड में नयी – पुरानी पीढ़ी के कुछ उपन्यासकारों के उपन्यासों की समीक्षा से गुजरने का मौका इस पुस्तक को आगे पढ़ते हुए मिलता है।
इसमें प्रसिद्ध लेखिका मैत्रेयी पुष्पा के उपन्यास ‘ नमस्ते समथर’ , डॉ अजय शर्मा के उपन्यास ‘ कुमुदिनी ‘ और ‘ तलाश अस्तित्व की ‘ के अलावा डॉ .हंसा दीप के उपन्यास ‘ बंद मुट्ठी के अलावा अजय सिंह राणा के उपन्यास ‘ तेरा नाम इश्क ‘ की समीक्षा पठनीय बन पड़ी है और इनको पढ़ते हुए मौजूदा दौर में जीवन के बदलते हालातों से उपजी समाज की वर्तमान समस्यायों से रूबरू होने का मौका पाठकों को मिलता है।
दिलीप कुमार पाण्डेय की इस पुस्तक के अंतिम हिस्से में कहानी और लघुकथा संग्रहों की समीक्षाएं हैं। इसमें सबसे पहले विवेक निझावन के कहानी संग्रह ‘ सिलवटें ‘ की समीक्षा है। इसके बाद लेखक ने डॉ मनोज प्रीत की पुस्तक ‘ शून्य से निन्यानबे तक’ , मनोज धीमान की पुस्तक ‘ जागते रहो ‘ , डॉ जवाहर धीर की
किताब ‘ एक फीकी सी मुस्कान ‘ की समीक्षा संकलित है।




