खिचड़ी हो, पोंगल, बिहू या उत्तरायण _ आपसी प्रेम।
रिपोर्ट : विनय चतुर्वेदी (विशेष संवाददाता )
पटना, मकर संक्रांति हिंदू धर्म का एक प्रमुख और पवित्र त्योहार है. यह हर साल जनवरी के मध्य, आमतौर पर 14 जनवरी को मनाया जाता है. इस दिन सूर्य देव धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करते हैं, जिससे उत्तरायण की शुरुआत होती है. यह पर्व नई शुरुआत, सकारात्मक ऊर्जा और जीवन में खुशहाली का संदेश देता है.
पंचांग के अनुसार, 14 जनवरी 2026 को दोपहर 3:07 बजे सूर्य मकर राशि में प्रवेश करेंगे. इस राशि परिवर्तन को ही मकर संक्रांति कहा जाता है. इस बार सूर्य का गोचर दोपहर के बाद होने के कारण कुछ लोगों को मकर संक्रांति की सही तारीख को लेकर थोड़ी भ्रम की स्थिति हो रही है.ज्योतिषाचार्यों के अनुसार सूर्य के मकर राशि में प्रवेश के हिसाब से मकर संक्रांति 14 जनवरी को होगी. लेकिन पूजा, दान और स्नान के लिए 15 जनवरी का दिन ज्यादा शुभ माना गया है. इसलिए दोनों तारीखों का अपना-अपना महत्व है.
पुण्य काल
14 जनवरी को मकर संक्रांति का शुभ समय दोपहर 3:13 बजे से शाम 5:45 बजे तक रहेगा. इस समय में किए गए स्नान, दान और पूजा को खास फल मिलने की मान्यता है. मकर संक्रांति का मुख्य क्षण दोपहर 3:13 बजे होगा.
स्नान, दान और पूजा का सही समय
ज्योतिषियों के अनुसार, 15 जनवरी की सुबह स्नान, दान और पूजा के लिए सबसे अच्छा समय है. इस दिन प्रातः स्नान के बाद सूर्य देव को अर्घ्य देना, तिल और गुड़ का दान करना और पूजा करना बहुत शुभ माना जाता है. इसलिए कई लोग 15 जनवरी को इन धार्मिक कामों को करते हैं.
यह त्योहार देश में लोहड़ी, पोंगल, माघ बिहू, खिचड़ी पर्व जैसे नामों से मनाया जाता है, जो कृषि और सूर्य से जुड़ा है।
असम में इस पर्व को माघ बिहू (Magh Bihu) या भोगाली बिहू (Bhogali Bihu) के रूप में
मनाया जाता है, जो कटाई के मौसम के अंत और नए साल की शुरुआत का प्रतीक है।
मकर संक्रांति और बिहू भारत के विभिन्न हिस्सों में सूर्य, फसल और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने वाले पर्व हैं,
उत्तर प्रदेश और बिहार में मकर संक्रांति को मुख्य रूप से ‘खिचड़ी’ के नाम से जाना जाता है। इस दिन गंगा स्नान करना और दान देना बेहद शुभ माना जाता है। प्रयागराज में मकर संक्रांति के दौरान ‘माघ मेला’ भी लगा होता है। इस त्योहार पर खाने में उड़द की दाल और चावल की खिचड़ी, तिल के लड्डू और गुड़ का खास महत्व है। बिहार में खिचड़ी के त्योहार पर दही-चूड़ा खाने का भी काफी महत्व है।
गुजरात में इसे ‘उत्तरायण’ कहा जाता है, जहां यह एक भव्य पतंग महोत्सव का रूप ले लेता है। आसमान रंग-बिरंगी पतंगों से पट जाता है। यहां उत्तरायण में ‘उंधियू’ और ‘चिक्की’ जैसे खास व्यंजन खाए जाते हैं। राजस्थान में भी पतंगबाजी के साथ-साथ सुहागिन महिलाएं अपनी सास या बड़ों को ‘सीधा’ (कच्चा अनाज और दक्षिणा) देकर उनका आशीर्वाद लेती हैं।
तमिलनाडु में इसे ‘पोंगल’ के रूप में चार दिनों तक मनाया जाता है।
भोगी पोंगल- पुराने सामान को जलाकर नई शुरुआत की जाती है।
थाई पोंगल- सूर्य देव को दूध और नए चावल से बनी ‘पोंगल’ अर्पित की जाती है।
मट्टू पोंगल- खेती में सहायक पशुओं, खासकर बैलों की पूजा की जाती है।
कानुम पोंगल- इस दिन परिवार के लोग मिलकर जश्न मनाते हैं।
कर्नाटक में इसे ‘सुग्गी’ कहते हैं, जहां लोग एक-दूसरे को ‘एल्लु-बेल्ल’ (तिल, गुड़ और नारियल का मिश्रण) बांटते हैं।
पंजाब में संक्रांति से एक दिन पहले ‘लोहड़ी’ मनाई जाती है। लोग अलाव जलाकर उसके चारों ओर घूमते हैं और मूंगफली, रेवड़ी और फुल्ले चढ़ाते हैं। अगले दिन इसे ‘माघी’ के रूप में मनाया जाता है, जहां नदियों में स्नान और दान की परंपरा है।
बंगाल में इसे ‘पौष संक्रांति’ कहते हैं। इस दिन गंगासागर में स्नान के लिए देश भर से श्रद्धालु उमड़ते हैं। घरों में दूध, चावल और खजूर के गुड़ से बने ‘पातिसापता’ और ‘पीठे’ जैसे पकवान बनाए जाते हैं।
भले ही इसके नाम अलग हों, चाहे वह खिचड़ी हो, पोंगल, बिहू या उत्तरायण, लेकिन इस पर्व का मूल संदेश एक ही है- प्रकृति का आभार व्यक्त करना, सूर्य की उपासना और आपसी प्रेम।


