यह देश के अभूतपूर्व सैन्य करण से ही संभव होगा!

विमर्श:

 

राजीव कुमार झा

श्रीलंका में लिट्टे के खिलाफ भारतीय सैन्य कार्रवाई संसार की राजनीति का एक नया अध्याय था। आखिर
भारत ने श्रीलंका में सैन्य कार्रवाई का फैसला क्यों किया था? बांग्लादेश निर्माण की लड़ाई लड़ते हुए हम काफी पहले दुनिया को इन प्रश्नों का जवाब देने में संलग्न रहे हैं।
क्षेत्रीय संघर्षों से यूरोप के देश आक्रांत नहीं हैं । उन्होंने अपने राष्ट्रीय विखंडन की समस्या का समाधान कर लिया है और यूरो के बैनर के नीचे वे एकजुट हैं। आपसी युद्ध तनाव और विध्वंश एशिया और अफ्रीका की समस्या है। इसके समाधान में यूरोप के देशों के अलावा अमरीका की क्या भूमिका हो सकती है? क्या अमरीका के पास पाकिस्तान – भारत सैन्य तनाव का लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के अंतर्गत कोई समाधान है? अमरीका क्या चाहता है और क्या वह दुनिया को शांति प्रगति और खुशहाली देना चाहता है ? सारे लोग जानते हैं कि अमरीकी धौंस धमकियों से बेफिक्र होकर इजरायल के विरुद्ध ईरान के हालिया हमलों से उसे इन सवालों का मुकम्मल जवाब मिला है। पाकिस्तान पर भारत के हमलों से दुनिया की राजनीति में काफी बदलाव आया है। तालिबान ने भी इस दौरान दुनिया की राजनीति में अपना एक पक्ष गढ़ना चाहा और वह कश्मीर के सवाल पर भारत के पक्ष में बात करता दिखाई देने लगा। वाकई अनुचित बातों का पक्षधर हम अगर होते भी हैं तो किसी सीमा के बाद अपनी हार स्वीकार कर लेते हैं। द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति में अमरीका की भूमिका की अक्सर चर्चा होती है और इस देश की क्रूरता से संसार के सारे देश वाकिफ हैं। दरअसल अमरीका उस समय दुनिया का शक्तिशाली व्यापारिक देश बनकर उभरा रहा था और विश्वयुद्ध की परिस्थितियां उसके पक्ष में नहीं थीं। इसी उतावलेपन में अमरीका ने परमाणु हथियार का प्रयोग विश्वयुद्ध समाप्ति के लिए किया था। इसके बाद अमरीका ने दुनिया पर अपने वर्चस्व को कायम करने के लिए एशिया के पाकिस्तान जैसे देशों को अपने सैनिक ठिकाने के रूप में विकसित किया।आज सरकार की गलत नीतियों से कश्मीर की समस्या उलझती जा रही है और रोज सेना के अफसर जवान भी मारे जा रहे हैं। गांधी जी ने अगर नासमझी में पाकिस्तान को बनाने में सहमति प्रकट की थी और तब से यह पड़ोसी देश अगर समस्याएं खड़ी करता रहा है तो अब सरकार को पाकिस्तान को खत्म कर देने का ऐलान करना चाहिए और भारतीय सेना को चरणबद्ध तरीके से पाकिस्तान पर पूरा नियंत्रण स्थापित करने में जुट जाना चाहिए। निश्चित रूप से इसमें हमें अपना काफी खून बहाना होगा लेकिन वह एक निर्णायक कार्य होगा। संसार में जितने सारे देशों ने अपने एकीकरण का कार्य संपन्न किया उनकी प्रशंसा होती है और जर्मनी -इटली जैसे देशों का आधुनिक इतिहास ही हमारी प्रेरणा का स्रोत कहा जा
सकता है। काश! हमारे देश की धरती पर कभी बिस्मार्क, मैजिनी
, गैरीबाल्डी जैसे नेताओं का जन्म होता और उनके नेतृत्व में देशवासी राष्ट्र के उद्धार में संलग्न होकर आततायियों से देश की रक्षा करके भारत का नाम भी दुनिया के इतिहास में उजागर करके दिखाते। जाहिर सी बात है कि इन परिस्थितियों में देश को अमरीकी मिसाइलों का हमला झेलने के लिए भी तैयार रहना होगा और यह देश के अभूतपूर्व सैन्यकरण से ही संभव होगा। अमरीका भारत का झूठा मित्र है।

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