जया जादवानी से राजीव कुमार झा की बातचीत!
साक्षात्कार :
( लेखिका जया जादवानी के पिता देश की आजादी और विभाजन के बाद पाकिस्तान के सिंध से भारत आ गये। इनकी कहानियों और उपन्यासों में मानवीय धरातल पर इतिहास और वर्तमान का कटु यथार्थ कई रूपों में करवट लेता दिखाई देता है।
यहां संपादक उनका आज से छह – सात साल पहले किया गया इंटरव्यू प्रस्तुत है। )
प्रश्न:अपने शुरुआती जीवन और माता – पिता के बारे में बताइए।
उत्तर: मेरे पिता जी रामनदास थावानी
बंटवारे के वक्त सिंध से निर्वासित होकर यहां आए। कुछ वक्त उन्होंने दतिया के कैंपों में बिताया। बड़े तकलीफ के दिन थे वे। भूख, गरीबी, बीमारी…नयी जगह, भाषाई समस्या… खुद को दोबारा अपने पैरों पर खड़ा करना, कई साल लग गए। इस सबका कुछ वर्णन मैंने अपने नये उपन्यास मिठो पाणी खारो पाणी में किया है।
जब हम पैदा हुए, वे संघर्ष का काफी हिस्सा गुजार चुके थे।
मेरी मां लक्मी देवी पिता के इस समूचे संघर्ष में उनके साथ रहीं। उन्हें सिर्फ गुरुमुखी आती थी और वे हर रोज रामायण और महाभारत जरूर पढ़ती थीं। अपने खर्च के लिए पिता जी से पैसे कभी नहीं मांगती थीं…तब तक हम कोतमा आ गये थे…मिल लगाई… पहले आटा मिल फिर आयल मिल.मेरी मां और दादी दोनों मशीन चलाती थीं। वे दस पैसे में छोटा कच्छा, पच्चीस पैसे में बड़ा कच्छा और एक रुपए में एक बंडी सिलती थीं। मां डंडी सिलने में ज्यादा तवज्जह देती थीं गोकि दस बंडी सिलने के दस रुपए आसानी से मिल जाते थे। दोनों बड़े सख्त थे। काम में लगे रहना और लगाए रखना जानते थे। वे मुझे भी कभी फ्री नहीं छोड़ते थे। कुछ न कुछ सिखाते रहना…
प्रश्न:बाल्यावस्था में पढ़ाई-लिखाई की शुरुआत युवावस्था में विवाह और नये पारिवारिक जीवन की शुरुआत इन सबके बारे में अपनी यादों को किस तरह से साझा करना चाहेंगी?
उत्तर:मैं चार साल की थी मुझे स्कूल में डाला गया। उस वक्त मुझे सिंधी के सिवा कुछ बोलना नहीं आता था। धीरे-धीरे मैंने हिंदी सीखी। आठवीं तक मैं हिंदी उपन्यास,कहानियां और कविताएं पढ़ना शुरू कर चुकी थी । ग्यारहवीं के बाद मेरा विवाह हो गया। बी.ए…एम.ए…डबल एम.ए. मैंने शादी के बाद किया। मेरी सबसे बड़ी बेटी स्मृति है फिर बेटा आकाश फिर सबसे छोटा बेटा मृदुल जो अमेरिका में साफ्टवेयर इंजीनियर है।
प्रश्न:लेखन की प्रेरणा कहां से प्राप्त हुई?
उत्तर:मैं जब आठवीं में थी हिंद पाकेट बुक्स से किताबें आती थीं घर पर…यह मेरे खालीपन को भरने का उपाय था…एक कामयाब उपाय… तमाम लेखकों से मेरा परिचय उसी वक्त हुआ… अमृता प्रीतम , शिवानी, रवीन्द्रनाथ टैगोर वगैरह… मैं बहुत पढ़ती थी…घर का काम करना नागवार गुजरता था… मैं अपनी मां से कहती थी… मुझे आपका दिया हुआ जीवन नहीं चाहिए…अपना जीवन मैं खुद बनाऊंगी… मुझे बस पढ़ने दें… पढ़ते हुए कभी लगता ऐसा तो मैं भी लिख सकती हूं…ये अहसास सबसे पहले गीतांजलि पढ़कर हुआ… सो तभी पहले कविताएं लिखीं… फिर कहानियां… फिर उपन्यास। पर जो भी मैं लिखती थी उसे संभाल कर रखने का हुनर नहीं था पास…समझ भी नहीं थी। सब खो गया। बहुत बाद में कुछ कविताएं लोकल न्यूज पेपर में छपी थीं बस । छपवाने की समझ बहुत बाद में पैदा हुई। लगभग 1992 का साल होगा। मैंने एक कहानी लिखी थी
‘ सिर्फ एक दिन ‘ पहली बार हंस के साथ- साथ मैं मनोरमा में भी भेज दी।
राजेन्द्र यादव का खत आया था छह महीने बाद। तब तक मनोरमा में छप चुकी थी। फिर लगातार कई कहानियां हंस में छपीं। राजेन्द्र यादव मेरी कहानियों की तारीफ करते थे। यूं तो बहुत कुछ वजह बनता रहता है…पर यह खास था। याद भी है।
प्रश्न:आपकी कहानियां हमेशा नारी पात्रों के इर्द-गिर्द नजर आती हैं। इसका क्या कारण है?
उत्तर: मेरा जीवन स्त्रियों से ही घिरा रहा… मेरी मां, मेरी चार बुआएं जो उतनी ही मजबूर थीं, जितनी मैं… इसके अलावा भी मैंने स्त्री की तकलीफ़ इतनी निकट से देखी है कि मैं उनसे न बच सकती थी न बचना चाहती थी. स्त्री मात्र स्त्री होने से ही दुखी है… हमारे सिस्टम में कोई बुनियादी भूल है। उसके कारण को जानना होगा।
प्रश्न: अपनी अभिरुचि के अन्य कार्यों के बारे में बताइए?
उत्तर: लिखना -पढ़ना- घूमना
प्रश्न: अपनी कहानियों में अक्सर आप ग्रामीण और नगरीय महिलाओं में अंतर को उजागर करती प्रतीत होती हैं?
उत्तर: देखिए…यह अंतर तो है। ग्रामीण महिलाओं का संसार अमूमन छोटा – सा होता है … उनके लिए घर , बच्चे, पति और रिश्तेदारियां बहुत अहम होती हैं। वे खुद के बारे में या तो नहीं सोचतीं या सबसे आखिर में सोचती हैं। नगरीय महिलाएं ज्यादा स्वतंत्र होती हैं। अपने फैसले स्वयं लेती हैं, कैरियर के प्रति ज्यादा सजग होती हैं। बदलाव की हवा सबसे पहले वहीं से शुरू होती है। हालांकि टीवी और इंटरनेट की दुनिया लोगों को घर बैठे बदल रही है।
प्रश्न:कहानियां समाज को किस तरह से प्रभावित करती हैं?
उत्तर: कहानियों का प्रभाव व्यक्ति पर तो पड़ सकता है… समाज भी व्यक्तियों से ही बनता है। दरअसल साहित्य व्यक्ति को खोलता है…हमारा दर्द…हमारा रहस्य , हमारे अंधेरे, हमारी यातना और उनके साथ जीना और लड़ते जाना … कोई भी क्रांति हो… अस्तित्व में आने से पहले मनुष्य की चेतना में शब्द ही तो होते हैं… जमीन पर आने के बाद यही देह धारण करते हैं।
यह बदलाव इतना धीमा होता है कि अक्सर दिखाई नहीं देता।
प्रश्न: अपने यात्रावृत्तांत लेखन के बारे में संक्षेप में बताएं।
उत्तर: हिमालय की तमाम यात्राएं… कुल्लू मनाली…लेह… पश्चिमी हिमालय पूरा… नैनीताल… बहुत कुछ… संस्मरण भी हैं बहुत कुछ…
प्रश्न: वर्तमान में प्रकाशन और लेखन?
उत्तर: एक उपन्यास अभी आया ” मिठो पाणी खारो पाणी”। एक उपन्यास पर कार्य कर रहा हूं। एक उपन्यास और एक कहानी संग्रह सिंधी में आ रहा है इस वर्ष के अंत तक।
प्रश्न: पसंदीदा रचना?
उत्तर: तत्त्वमसि।

