प्रदर्शन लगातार हो रहा था तो अचानक हिंसक कैसे हो गया?

रिपोर्ट :अजित चौबे (आल इंडिया रिपोर्टेर )/ विनय चतुर्वेदी (स्पेशल कोरेस्पोंडेंट )

अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 को निरस्त करके जम्मू कश्मीर राज्य का पुनर्गठन किया गया। जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 के तहत पूर्ववर्ती जम्मू-कश्मीर राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों जम्मू कश्मीर और लद्दाख में बांटा गया। इसमें जम्मू-कश्मीर को विधानसभा वाला केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया। वहीं, लद्दाख को बिना विधानसभा वाले केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा दिया गया। इस बदलाव के तहत जम्मू कश्मीर में पिछले साल नई विधानसभा का भी गठन हो गया। वहीं, दूसरी ओर राज्य पुनर्गठन के साथ ही लद्दाख में इस केंद्र शासित प्रदेश को छठी अनुसूची में शामिल करने और इसे पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग उठने लगी। इसे लेकर अलग-अलग समय पर प्रदर्शन हुए। इन्हीं मांगो को लेकर चल रहे ताजा प्रदर्शन के दौरान हिंसा भड़क उठी।

प्रदर्शन लगातार हो रहा था तो अचानक हिंसक कैसे हो गया?

लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने और राज्य का दर्जा देने की मांग को लेकर सोनम वांगचुक ने 35 दिनों के धरने का एलान किया था। 10 सितंबर से सोनम वांगचुक और लद्दाख एपेक्स बॉडी के 15 कार्यकर्ता भूख हड़ताल पर थे। मंगलवार को एलएबी के दो कार्यकर्ताओं की हालत बिगड़ी तो उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। कार्यकर्ताओं की तबीयत बिगड़ने के बाद बुधवार को लेह बंद का एलान किया था। बंद में बड़ी संख्या में युवा सड़कों पर उतर आए और मार्च निकाला। युवाओं ने भाजपा व हिल काउंसिल के मुख्यालय में घुसने की कोशिश की, जिसके बाद पुलिस व सुरक्षाबलों ने बल का प्रयोग किया। देखते ही देखते प्रदर्शनकारियों और सुरक्षाबलों के बीच पथराव शुरू हो गया। प्रदर्शनकारियों ने स्थानीय भाजपा कार्यालय में आग लगा दी।

इस पूरे आंदोलन का केंद्र बिंदु बने सोनम वांगचुक हैं कौन?
सोनम वांगचुक एक इंजीनियर और पर्यावरणविद हैं। 2009 में आई हिंदी फिल्म 3 इडियट्स में आमिर खान द्वारा निभाए गए किरदार की प्रेरणा उन्ही से ली गई थी। वह लद्दाख के छात्रों के लिए स्कूली शिक्षा प्रणाली में सुधार लाने के लिए भी काम करते रहे हैं। 2018 में, वांगचुक को लद्दाख के लिए शिक्षा में उनके योगदान के लिए रेमन मैग्सेसे पुरस्कार मिला था। वे सतत विकास को भी बढ़ावा देने के लिए जागरुकता फैलाते हैं। 2019 में जब लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया और वहां विधानसभा का प्रावधान नहीं रखा गया, तब से सोनम लद्दाख को छठी अनुसूची में शामिल करने और उसे पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग कर रहे हैं। इसे लेकर उन्होंने अलग-अलग समय पर धऱना प्रदर्शन और मार्च निकाला है।

क्या है संविधान की छठी अनुसूची जिसमें लद्दाख को शामिल करने की मांग की जा रही है?

सोनम वांगचुक का प्रदर्शन मुख्य रूप से चार मांगों को लेकर हो रहा है। इसमें लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा, छठी अनुसूची के तहत संवैधानिक सुरक्षा, लेह और कारगिल दो अलग लोकसभा सीटें और सरकारी नौकरियों में स्थानीय लोगों को आरक्षण की मांग शामिल है। इसमें सबसे ज्यादा जिस मांग का बात हो रही है वह संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने की है।

दरअसल, पूर्वोत्तर आदिवासियों के अलग जीवन और दृष्टिकोण को बचाने के लिए संविधान सभा ने इस क्षेत्र के आदिवासियों के लिए एक अलग प्रशासनिक ढांचा दिया। संविधान के अनुच्छेद 244(2) के तहत, छठी अनुसूची असम, मेघालय, मिजोरम और त्रिपुरा राज्यों में जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन के लिए विशेष व्यवस्था करती है। इसका सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान यह है कि जनजातीय क्षेत्रों को स्वायत्त जिलों और स्वायत्त क्षेत्रों के रूप में प्रशासित किया जाना है। छठी अनुसूची के प्रावधान के तहत, राज्य के राज्यपाल को स्वायत्त जिलों और स्वायत्त क्षेत्रों की प्रशासनिक इकाइयों के रूप में क्षेत्रों को निर्धारित करने का अधिकार है।

छठी अनुसूची के पैरा 2(1) में बताया गया है कि हर स्वायत्त जिले में एक जिला परिषद होगी जिसमें तीस सदस्य होंगे, इसमें से चार राज्यपाल द्वारा नामित किए जाएंगे जबकि बाकि मताधिकार के आधार पर चुने जाएंगे। छठी अनुसूची ने उन्हें कुछ कार्यकारी, विधायी और न्यायिक शक्तियां प्रदान की ताकि उन्हें अपनी भूमि के कानून बनाने, अपने वनों (आरक्षित वनों को छोड़कर) का प्रबंधन करने, पारंपरिक मुखियाओं और प्रधानों की नियुक्ति, संपत्ति का उत्तराधिकार, विवाह, सामाजिक रीति-रिवाज का अधिकार प्राप्त हो।
2024 में अपनी पहली 21 दिनों की भूख हड़ताल के दौरान रॉयटर्स को दिए बयान में सोनम वांगचुक ने कहा था कि, “लद्दाख में कोई लोकतंत्र नहीं है।” उन्होंने कहा कि यदि क्षेत्र में निर्वाचित प्रतिनिधि होते, तो भूमि और जंगलों को औद्योगिक और खनन हितों से बचाने के लिए कानून बनाए जा सकते थे। सरकार ने बिना स्थानीय परामर्श के लद्दाख के खानाबदोश चरागाहों पर 13 गीगावाट की नवीकरणीय ऊर्जा परियोजना “थोप” दी। उन्होंने इस समय कहा था कि “लद्दाख धरती के थर्मामीटर की तरह है। इसलिए अगर यह नष्ट हो गया… तो यह एक वैश्विक तबाही होगी”
गृह मंत्रालय की तरफ से एक बयान जारी कर बताया गया कि जब सोनम ने अनशन शुरू किया उसी समय, भारत सरकार उच्चाधिकार प्राप्त समिति (एचपीसी), उसकी उप-समिति और स्थानीय नेताओं के साथ कई अनौपचारिक बैठकों के माध्यम से शीर्ष निकाय लेह और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस के साथ पहले से ही बातचीत कर रही थी।

बातचीत की प्रक्रिया ने लद्दाख की अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण को 45% से बढ़ाकर 84% करने, परिषदों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण प्रदान करने और भोटी व पुर्गी को आधिकारिक भाषा घोषित करने जैसे अभूतपूर्व परिणाम दिए हैं। इसके साथ ही, 1800 पदों पर भर्ती की प्रक्रिया भी शुरू की गई। हालांकि, कुछ राजनीतिक रूप से प्रेरित लोग उच्चाधिकार प्राप्त समिति (एचपीसी) के तहत हुई प्रगति से खुश नहीं थे और संवाद प्रक्रिया को विफल करने की कोशिश कर रहे थे। उच्चाधिकार प्राप्त समिति की अगली बैठक 6 अक्तूबर को निर्धारित की गई है, जबकि लद्दाख के नेताओं के साथ 25 और 26 सितंबर को भी बैठकें आयोजित करने की योजना थी।

गृह मंत्रालय ने आगे कहा कि जिन मांगों को लेकर वांगचुक भूख हड़ताल पर थे, वह एचपीसी में चर्चा का अभिन्न अंग हैं। कई नेताओं द्वारा भूख हड़ताल समाप्त करने का आग्रह करने के बावजूद, उन्होंने भूख हड़ताल जारी रखी और अरब स्प्रिंग शैली के विरोध प्रदर्शनों और नेपाल में जेन-जी के विरोध प्रदर्शनों का भड़काऊ उल्लेख करके लोगों को गुमराह किया। इसी के चलते हिंसा भड़की।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button