पत्रकार को जनहित में खबर लगाना पड़ रहा भारी

पुलिस द्वारा जेल भेजने की पत्रकार को दी जा रही है धमकी

 

*ब्यूरो चीफ बाराबंकी* रामनगर बाराबंकी रामनगर थाना क्षेत्र अंतर्गत में पत्रकार को खबर छापना भारी पड़ रहा है। पुलिस द्वारा उसे फर्जी मामले में फंसा कर जेल भेजने की धमकी भी दी जा रही है। रामनगर थाना क्षेत्र के अंतर्गत एक हिंदी दैनिक समाचार पत्र जन मोर्चा व नेशनल खबर 9 के पत्रकार नीरज शुक्ला द्वारा हाल ही में नगर पंचायत रामनगर के आसरा आवास में पुलिस वालों के कब्जे व कटिया लगाकर बिजली जलाने संबंधी खबर को प्रकाशित किया गया था जिससे खुन्नस खाए रामनगर थाने में तैनात सिपाही सुनील सिंह चौहान द्वारा पत्रकार को षड्यंत्र रचकर फर्जी मामले में फंसा देने की धमकी दी जा रही है। पुलिस द्वारा पत्रकार को दी गई धमकी से लोकतंत्र की मर्यादा तार तार की जा रही है।
इस संबंध में पुलिस की धमकी से भयभीत पत्रकार ने आज पंजीकृत डाक के माध्यम से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, पुलिस महानिदेशक उत्तर प्रदेश, पुलिस अधीक्षक बाराबंकी समेत कई जिम्मेदार अधिकारियों को लिखित शिकायती प्रार्थना पत्र दे कर कार्रवाई की मांग की गई है। इतना ही नहीं पीड़ित पत्रकार ने क्षेत्र के संभ्रांत जनप्रतिनिधियों को भी लिखित में घटना को अवगत कराया है।
अब सवाल यह उठता है कि क्या लोकतंत्र में सच को सच लिखना गुनाह है?
रामनगर पुलिस द्वारा लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पत्रकारिता की आवाज को दबाने का कार्य लोकतंत्र की हत्या तथा ब्रिटिश काल की दमनात्मक नीति की याद दिलाता है। रामनगर क्षेत्र में जब जनहित की आवाज उठाना लोकतन्त्र के चतुर्थ स्तंभ माने जाने वाले मीडिया जगत के लोगों को भारी पड़ रहा है तो अन्य आम नागरिकों का क्या हाल है, इसका अंदाजा इसी घटना से लगाया जा सकता है।
अब देखना यह है कि पीड़ित पत्रकार के प्रार्थना पत्र का योगी आदित्यनाथ सहित सूबे के आला अधिकारी संज्ञान लेकर आवश्यक कार्रवाई कर संवैधानिक हितों की मर्यादा रखेंगे या ऐसे ही रामनगर पुलिस कर्मचारी निरंकुश हो करके लोगों पर अपना रौब जमा कर ,फर्जी मामलों में फसाने की धमकी देकर लोकतंत्र की धज्जियां उड़ाते रहेंगे।

इस संबंध में जब हमारे संवाददाता ने इसकी सूचना नगर चेयरमैन रामशरण पाठक तथा रामनगर ब्लाक प्रमुख संजय तिवारी को दी तो उन्होंने पुलिस के इस रवैये की कठोर निंदा करते हुए कहा कि संविधान में लोगों को अभिव्यक्त की आजादी है। यदि ऐसा है तो निश्चय ही यह पुलिस की दमनात्मक नीति है, पुलिसकर्मियों द्वारा ऐसी सोच और कृत्य लोकतंत्र की हत्या को प्रदर्शित करता है। अगर पुलिस बदले की भावना से किसी भी व्यक्ति या पत्रकार पर उत्पीड़नात्मक कार्रवाई करती है तो आंदोलन किया जाएगा।

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