अहिंदीभाषी लेखिका डॉ मधुछंदा चक्रवर्ती से राजीव कुमार झा की बातचीत…
साक्षात्कार
प्रश्न 1. आपने आलोचना लेखन भी किया है और निराला के बारे में किताब लिखी है। हिंदी साहित्य में निराला महान कवि माने जाते हैं। निराला के काव्य की विशिष्टता की संक्षेप में चर्चा करते हुए उनके जीवन चिंतन को रेखांकित कीजिए।
उत्तर –-हाँ, मेरी रुचि आलोचना लेखन में ज्यादा रही है और मैंने निराला जी के उपन्यास साहित्य पर ही शोध किया है और उसी पर आधारित पुस्तक भी लिखी है। निराला जी साहित्य जगत में महान कवि के रूप में जाने जाते हैं। इस कारण है कि उन्होंने अपने जीवन में बहुत कुछ देखा है और भोगा है। उनका जीवन किसी मिसाल से कम नहीं है। ब्रिटिश शासन काल में एक अच्छे समृद्ध परिवार से वह आते हैं, बचपन जितना उनका सुखद बीता, युवावस्था में उन्होंने इसके विपरीत कई दुख झेले। अपने परिवार को अपनी ही आँखों के सामने महामारी में एक-एक कर मरते देखना, आर्थिक तंगी, अपने बेटी को सुखमय जीवन न दे पाना सब कुछ वे झेलते रहे। वही उन्होंने कभी भी प्रकाशकों और संपादकों का शोषण कभी स्वीकार नहीं किया। अपने जीवन में इतना दुख-कष्ट झेलते हुए भी और आर्थिक तंगी के बावजूद भी वे दूसरों की सहायता करते रहे और अंत में मानसिक विक्षिप्तता का दंश झेलकर वे इस संसार से गए। परन्तु इस दौरान उनकी जो साहित्यिक यात्रा रही उसे यदि ध्यान से अध्ययन किया जाए तो यह पता चलता है कि उन्होंने कभी हार नहीं मानी। इसलिए उनकी कविता में साधारण जन मानस की चेतना सजीव हो उठती है। वह केवल वर्णन ही नहीं बल्कि वह भोगा हुआ यथार्थ है जो हमें दिखाई देता है। उनका विद्रोही स्वभाव सामाजिक रूढ़ियों, विषमताओं, पाखंडों आदि के विरुद्ध खुलकर सामने आता है। उनकी प्रत्येक रचना प्रासंगिक है। गरीबों और शोषितों के प्रति उनकी सहानुभूति केवल लिखने तक ही सीमित नहीं है बल्कि अपने वास्तविक जीवन में भी वे उनकी सहायता करते रहे हैं। संक्षेप में कहा जाए तो निराला जी का जीवन चिंतन हमें यही प्रेरणा देता है कि जीवन में मिली कठिनाइयाँ व्यक्ति को तोड़ सकती है मरोड़ सकती है लेकिन उसे रुकना नहीं चाहिए। वह जब तक है अपने कार्यों और सिद्धांतों के सहारे अपने आप को जीवंत और प्रासंगिक बनाए रख सकता है। निराला जी का जीवन और काव्य दोनों हमें सिखाते हैं कि विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी मनुष्य को अपना स्वाभिमान और अदम्य जिजीविषा कभी नहीं छोड़नी चाहिए। उनका यही जीवन-चिंतन उन्हें सिर्फ अपने युग का नहीं बल्कि हर युग का महाप्राण कवि बनाता है।
प्रश्न 2. आप अपने घर परिवार बाल्यावस्था शिक्षा दीक्षा के बारे में बताइए?
उत्तर – मेरा जन्म मणिपुर इम्फाल में हुआ है। बाल्यावस्था से लेकर किशोरावस्था तक मैं असम रायफल्स के कैम्पस में ही रही हूँ। मेरे परिवार में मेरी माताजी श्रीमति अनिता चक्रवर्ती है, पिताजी श्री अनिल कुमार चक्रवर्ती हैं। मेरी एक छोटी बहन है डॉ. मैत्रेयी चक्रवर्ती जिन्होंने असम विश्वविद्याल तथा बी.एच.यू से कानून और मानव अधिकार की पढ़ाई की और असम विश्वविद्यालय से ही पी.एच.डी की वही मेरे छोटे भाई है डॉ. आलोक चक्रवर्ती उन्होंने कंप्यूटर साइंस की पढ़ाई की है। हमारा जीवन भी आर्थिक रूप से देखा जाए तो बचपन थोड़ा बहुत-अभावों में गुज़रा है। असम रायफल्स में पहले मेरे पिताजी नायक क्लर्क थे बाद में उन्होंने असम रायफल्स द्वारा परिचालित स्कूल में बतौर सहायक शिक्षक के रूप में काम करना शुरु किया। हम काफी समय तक पिताजी के साथ पूर्वोत्तर राज्यों के अलग-अलग हिस्सों में ट्रांस्फर होकर जाते रहे हैं। वही उनके साथ कैम्पस के बाहर शहरी तथा ग्रामीण जीवन को ज्यादा देखने का अवसर नहीं मिल पाता था। परन्तु जो कुछ भी मैंने देखा उनका प्रभाव मुझ पर पड़ा। वही हम बाद में 2001 में असम के सिलचर रहने चले आए। वही रहकर मैंने असम विश्वविद्यालय से बी.ए (गुरुचरण कॉलेज जो कि असम विश्वविद्यालय के अंतर्गत था), एम.ए और पी.एच.डी की पढ़ाई पूरी की। जब हम पिताजी के साथ अगरतला रहते थे तो वहाँ हमें संगीत और तबला सीखने का मौका मिला। हम तीनों भाई-बहन शास्त्रीय संगीत सिखने जाते थे। उसकी परीक्षा भी दी थी। परन्तु यह शिक्षा अधूरी रह गई क्योंकि पिताजी का ट्रांसफर हो गया और हम वापस से अरुणाचल प्रदेश आ गए थे। जिसके बाद हम 2001 में ही सिलचर आ गए थे और वही रहकर बाकी की पढ़ाई पूरी की।
प्रश्न3. क्या आप अहिंदीभाषी हिंदी लेखिका है? अगर यह सही है तो हिंदी के प्रति अपने मन के लगाव और झुकाव के बारे में बताएं।
उत्तर – जी मैं अहिंदीभाषी लेखिका हूँ। मेरी मातृभाषा सिलहेटी है जो कि बांग्ला की उपभाषा के रूप में जानी जाती है। मेरा हिंदी के प्रति लगाव बचपन से ही था। हालाकि मैं पढ़ाई में उतनी अच्छी नहीं थी। परन्तु कहानियाँ सुनना और टी.वी पर आने वाले कार्यक्रमों का मुझपर बहुत प्रभाव पड़ा और हिंदी भाषा बोलने और अच्छा बोलने की मेरी इच्छा लगातार बनी रही। दूसरा कारण यह भी था कि हम तीनों भाई-बहन असम रायफल्स कैम्पस में रहा करते थे। वहाँ ज्यादातर नेपाली बोलने वाले, मणिपुरी और कुमाउनी-गढ़वाली लोग काफी थे। तो इनके बच्चों के साथ खेलने और आपसी बातचीत में मैंने नेपाली भाषा भी सीखी, और हिंदी भाषा भी सीखी। आपस में हम तीनों भाई-बहन हिंदी में ही बातें करते थे। केवल अपने माता-पिता से सिलहेटी में बात होती थी। वही बड़ी कक्षा में आते-आते प्रेमचन्द जी का साहित्य पढ़ने मिला तो उनकी रचनाओं ने भी मुझे बहुत प्रभावित किया। मुझे फिल्मी गाने बहुत पसंद थे और कहानी सुनाना और लिखना बहुत पसंद था। इस तरह से मुझे हिंदी भाषा के प्रति धीरे-धीरे लगाव बढ़ता गया।
प्रश्न 4. आपकी हिंदी के अलावा और किन भाषाओं का ज्ञान है?
उत्तर – मेरी शिक्षा हिंदी और अंग्रेजी में हुई है। अन्य भाषा केवल बोलचाल के माध्यम से ही सीख पाई हूँ। नेपाली, बांग्ला और कन्नड़ बोलचाल तक सीमित है। नेपाली भाषा बचपन में बोल पाती थी परन्तु अब काफी समय से छूट गयी है। बांग्ला साहित्य पढ़ने के लिए मैंने बांग्ला घर पर ही सीखी है। संस्कृत भी पढ़ और लिख पाती हूँ।
प्रश्न 5. साहित्य लेखन के अलावा अपनी अन्य प्रकार की अभिरुचियों के बारे में बताइए?
उत्तर – मुझे घर सजाना और बागवानी का बहुत शौक है। मेरे माता-पिता का प्रभाव मुझपर अधिक पड़ा है। मेरी माँ हस्तशिल्प कला में माहिर है। वे घर को कम-से-कम सजावट की चीजों के साथ भी बहुत निपुण तरीके से सजा-संवार कर रखती रही हैं। क्रोशिए तथा सुई-धागे से वे बहुत सुन्दर मेज पोश बनाती है। वही बचपन में हम जब अपने दोस्तों के घर या गाँव में किसी रिश्तेदार के घर भी जाते थे तो वहाँ घरेलु साज-सजावट और सहेज कर रखने की कला देख कर मैं बहुत दंग रह जाती थी। शायद एक महिला होने के नाते मेरी पसंद आम भारतीय महिलाओं जैसी है। वही असम रायफल्स में रहते हुए वहाँ सभी अपने क्वाटर के पीछे खाली पड़ी जगह पर छोटी-बड़ी बागवानी करते थे। पिताजी ने भी कई बार हमारे क्वाटर के पीछे खाली पड़ी जगह पर सब्जी और फूलों की बागवानी करी। आज भी पिताजी यह काम करते हैं। तो बागवानी करने की भी रुचि है। इसके अलावा मुझे गहने बनाने और चित्रकारी का भी शौक है। ये मैंने कोविड के दौरान सीखी थी। मैंने कुछ चित्रकारी और गहने अपने लिए और दोस्तों के लिए भी बनाए हैं। समय मिलने पर यह काम भी करती हूँ।
प्रश्न 6. अपनी कोई कविता पाठकों के लिए यहां प्रस्तुत करें।
उत्तर – मेरी एक कविता है जो कि मैं निराला जी की कविता भिक्षुक पढ़कर उससे प्रभावित होकर लिखी थी। यह कविता आज बैंगलुरु उत्तर विश्वविद्यालय के बी.एस.सी के पाठ्यक्रम में शामिल की गयी है। मैं वही कविता यहाँ प्रस्तुत कर रही हूँ। कविता का शीर्षक है भूख
अनिश्चित जीवन में
निश्चित माया।
विचार मग्न मन,
पर दुर्बल काया।
झुकी रीढ़ की हड्डी,
पर झुकी न जीवन जीने की आशा।
चले जा रहे अनिश्चित पथ पर,
पर नहीं निश्चित है ठौर-ठिकाना।
हाथ उठाकर आशीश देते हैं,
मांगते केवल दो मूठ चावल।
भूख की तड़पन है मुख पर,
पर वाणी है निश्छल।
सड़क का किनारा है संसार इनका,
सड़क पर व्यतीत है जीवन इनका,
साथी बना है दुर्भाग्य इनका,
पर नहीं है निर्बल मन इनका।
मुर्झाए चेहरे पर अब भी है जीने की लालसा,
पर बनाया हमने ही इन्हें भिखारी।
जो हमें आज—तक देते आए हैं दुआएँ इतनी,
क्यों इनके लिए हमारी मानवता हारी?
कभी जीवन इनका भी बीता होगा,
सुखमय, सुदृढ़, सुयौवन।
पर नियति का भी खेल अजीब
जाना पड़ा इन्हें ही वन।
वन कैसा?
भीड़-भाड़ लोगों से भरे जंगल
धुआँ उड़ाते वाहन।
सिंह नाद से भी भयंकर मशीनों के गर्जन।
जहाँ भावना, सम्मान बह जाती नयनों से
दूसरों की दी गाली से।
जहाँ पूँजीपतियों का झुण्ड है,
सत्ता पर बैठे शेर की फैकी झूठन को खाने के लिए।
जो निर्बल, कोमल सीधे मानवों को
फाँसते अपनी नीति से।
जहाँ मिल बाँट खाते हैं रिश्वत की रोटी लिए।
वन
जहाँ केवल स्वार्थ जीता है,
मरता है परोपकार उसके पंजों के प्रहार से
जहाँ कर्म ही कर्म से टकराता है।
जहाँ विचार ही विचार से टकराता है।
जहाँ बदलते हैं पल-पल में दल
हो जैसे वह विहगों का दल
बदले जो मौसम में अपना घर।
ऐसे वन में आकर
इन बूढ़ी हड्डियों का जीवन संग्राम फिर शुरू होता है,
पर अब उसमें अंतर-ही-अंतर है।
सर से पाँव तक
परिश्रम की बूँद ही साक्षी।
पर नहीं है संतुष्टि मोटे मालिकों को
जितना कर पाए इस उम्र में भी,
क्या जाएगा अगर मिल जाए उतने की ही मजदूरी?
पर दिखा रहे उन्हें काम में हुई खामियाँ,
बता रहे वे बहाना न देने का कहकर अपनी मजबूरी।
ठोकर खाते,
लड़खड़ाते कदम,
फटे कपड़े,
और मुह में दम
भिक्षा कि झोली लिए,
घर-घर जाते हैं।
दो मूठ चावल की बस दया मांगते हैं।
हाथ उठाकर आशीष देते हैं।
भूख की क्या मजबूरी देखो,
क्या-क्या दिन दिखलाता है।


