वंदे मातरम् गाने से आसमान नहीं टूट पड़ेगा: हाईकोर्ट
-मदरसों में अनिवार्य करने का विरोध करने वालों को सुनाई खरी खरी
भारत पोस्ट संवाददाता
कोलकाता। वंदे मातरम् को लेकर छिड़ी बहस के बीच कलकत्ता हाईकोर्ट की एक टिप्पणी ने पूरे विवाद का सार सामने रख दिया है। अदालत ने साफ कहा है कि वंदे मातरम् गाने से आसमान नहीं टूट पड़ेगा।” कोर्ट ने यह भी याद दिलाया कि देश के हजारों ईसाई स्कूलों में दूसरे धर्मों के छात्र भी प्रार्थना में शामिल होते हैं, लेकिन इससे उनका धर्म नहीं बदल जाता। ऐसे में अगर कोई भारतीय अपनी मातृभूमि के सम्मान में वंदे मातरम् गा देता है, तो इसमें आखिर आपत्ति किस बात की है? सवाल यह भी है कि जिस धरती ने हमें जन्म दिया, पहचान दी और हर अधिकार दिया, उसे माता कहने में शर्म कैसी? क्या भारत माता का सम्मान करना अब भी कुछ लोगों के लिए इतना कठिन है कि उसे भी धर्म और राजनीति के चश्मे से देखा जाए?
हम आपको बता दें कि कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश तपब्रत चक्रवर्ती ने सुनवाई के दौरान एक के बाद एक ऐसे सवाल उठाए, जिन्होंने पूरे विवाद की दिशा ही बदल दी। उन्होंने कहा कि आसमान नहीं टूट पड़ेगा अगर कोई वंदे मातरम् गा ले। उन्होंने उदाहरण देते हुए पूछा कि देश के हजारों ईसाई स्कूलों में सभी छात्र प्रभु यीशु की प्रार्थना करते हैं, तो क्या दूसरे धर्मों के छात्र यह कहते हैं कि इससे उनका धर्म बदल जाएगा? न्यायाधीश ने साफ शब्दों में कहा कि यदि किसी व्यक्ति से उसकी धार्मिक परंपरा से अलग कोई पंक्ति दोहराने को कहा जाए, तो क्या वह अपने धर्म से बाहर हो जाएगा? अदालत ने यह भी पूछा कि अभी तक क्या किसी व्यक्ति को वंदे मातरम् नहीं गाने पर सजा दी गई है या उसके खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई हुई है? यदि ऐसा नहीं हुआ, तो फिर इतना भय और विरोध किस बात का?
हम आपको बता दें कि कलकत्ता हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका पर सुनवाई हो रही थी, जिसमें मदरसों में वंदे मातरम् के सभी छह अंतरों को अनिवार्य बनाए जाने संबंधी अधिसूचना को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि संविधान निर्माण के दौरान व्यापक चर्चा के बाद केवल पहले दो अंतरों को ही राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किया गया था, इसलिए सभी छह अंतरों को अनिवार्य नहीं बनाया जा सकता। साथ ही यह आशंका भी जताई गई कि यदि इसे कानूनी रूप से लागू किया गया तो सांप्रदायिक तनाव बढ़ सकता है।
हम आपको यह भी बता दें कि संसद ने इसी मानसून सत्र में राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण ;संशोधन विधेयक, 2026 पारित कर वंदे मातरम् को भी वही कानूनी संरक्षण प्रदान कर दिया है जो पहले केवल राष्ट्रगान जन गण मन को प्राप्त था। अब यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर वंदे मातरम् के गायन में बाधा डालता है या उसका अपमान करता है, तो उसके खिलाफ तीन वर्ष तक की सजा और जुर्माने का प्रावधान किया गया है।
हालांकि विपक्ष के कुछ दलों ने इसे राष्ट्रवाद के नाम पर थोपा गया कदम बताते हुए विरोध दर्ज कराया तो वहीं ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ;। ने भी इस कानून का विरोध करते हुए कहा कि वंदे मातरम् के कुछ हिस्सों में मातृभूमि को देवी स्वरूप में चित्रित किया गया हैए जो इस्लामी आस्था के अनुरूप नहीं है। बोर्ड ने संविधान के अनुच्छेद 19 और 25 तथा सर्वोच्च न्यायालय के बिजो एमैनुएल बनाम केरल राज्य फैसले का हवाला देते हुए कहा कि किसी नागरिक को उसकी धार्मिक मान्यताओं के विरुद्ध किसी गीत या प्रतीक को अपनाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। बोर्ड ने यह भी कहा कि देशप्रेम और पूजा दो अलग.अलग बातें हैं तथा मुसलमान अपने वतन से प्रेम करते हैं, लेकिन उसे देवी के रूप में पूजना उनके धार्मिक सिद्धांतों के विरुद्ध है।
बहरहाल, वंदे मातरम् पर विवाद केवल एक गीत का विवाद नहीं है। यह उस सोच की परीक्षा है, जो तय करेगी कि हम भारत को केवल रहने की जगह मानते हैं या अपनी मातृभूमि। अदालत का संदेश स्पष्ट है कि राष्ट्रीय सम्मान से आस्था खतरे में नहीं पड़ती। ऐसे में यह सवाल उन सभी से पूछा जाना चाहिए जो भारत माता कहने या वंदे मातरम् गाने से परहेज करते हैं कि आखिर भारत की धरती को माता मानने में शर्म कैसी? जिस धरती ने सब कुछ दिया, उसके प्रति सम्मान व्यक्त करने में हिचक क्यों है?



