वोट के बदले क्या मिला? अंतरराष्ट्रीय श्रमिक दिवस पर सड़क पर उतरे श्रमिक, कला के जरिए उठाई हक की आवाज

 

कोलकाता: चुनाव आते हैं और चले जाते हैं। वादे किए जाते हैं और फिर भुला दिए जाते हैं। संविधान ने जिस पेशे को मान्यता दी और चुनाव आयोग ने जिसे मताधिकार दिया, आज वही श्रमिक वर्ग अपने अस्तित्व और बुनियादी अधिकारों की लड़ाई लड़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय श्रमिक दिवस के मौके पर कोलकाता की सड़कों पर एक अलग ही नजारा देखने को मिला, जहां ‘सीड्स फाउंडेशन’ के नेतृत्व में श्रमिकों ने अपने हक की मांग की।

संविधान ने दिया अधिकार, व्यवस्था ने किया दरकिनार
इस वर्ग के कई लोगों ने इस बार भी मतदान किया, तो कुछ ने हताशा में इससे दूरी बनाए रखी। उनकी शिकायत है कि वोट देने के बावजूद उनका भाग्य नहीं बदलता। इसी उपेक्षा के खिलाफ श्रमिकों ने ‘श्रम कोड’ (Labour Code) के अनुसार मिलने वाली सुविधाओं और मान-मर्यादा की मांग को लेकर सड़क पर उतरने का फैसला किया।

कला बनी विरोध का माध्यम: सड़क पर उकेरी ‘अल्पना’
इस विरोध प्रदर्शन की सबसे खास बात इसका तरीका था। अपनी मांगों को केवल नारों तक सीमित न रखकर, इन श्रमिकों ने सड़क पर ‘अल्पना’ (रंगोली जैसी कलाकृति) उकेरी। इस कला के माध्यम से उन्होंने अपने जीवन के संघर्ष, अपनी अपूर्ण मांगों और समाज से मिलने वाली उपेक्षा को प्रदर्शित किया।

सीड्स फाउंडेशन की पहल
फाउंडेशन की संस्थापिका अमृता सिंह और सचिव शिबानी गिरि ने इस कार्यक्रम का नेतृत्व किया। उनका उद्देश्य श्रमिकों को समाज में वह सम्मान दिलाना है जिसके वे हकदार हैं।

*मुख्य मांगें:*

नए श्रम कोड के तहत मिलने वाली सभी आवश्यक सुविधाओं को लागू करना।

श्रमिकों को उचित सामाजिक सुरक्षा और कार्यस्थल पर सम्मान प्रदान करना।

सरकारी योजनाओं का लाभ उन तक पारदर्शी तरीके से पहुँचाना।

शिबानी गिरि (सचिव): “संविधान ने इन्हें नागरिक के तौर पर पहचान दी है, लेकिन समाज और व्यवस्था इन्हें आज भी इनका उचित दर्जा नहीं दे पाई है। हम चाहते हैं कि इन्हें श्रम कोड के अनुसार वे सभी लाभ मिलें जिनका वादा किया गया है।”

अमृता सिंह (संस्थापिका, सीड्स फाउंडेशन): “कला एक शक्तिशाली माध्यम है। आज इन श्रमिकों ने सड़क पर अल्पना बनाकर यह दिखाया है कि वे भी समाज का एक अभिन्न हिस्सा हैं। चुनाव के समय सब इनके पास आते हैं, लेकिन चुनाव के बाद इनकी सुध लेने वाला कोई नहीं होता।”

यह कार्यक्रम न केवल श्रमिकों के संघर्ष को दर्शाता है, बल्कि प्रशासन और समाज को उनकी जिम्मेदारी की याद भी दिलाता है।

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