दीपावली : मनुष्य के कर्मशील बनने का दीप मालिका का सन्देश

आओ मिलकर हम दीप जलाएं, जाति पाती की दूरी मिटाएं

 

अजित प्रसाद / सिलीगुड़ी: चित्त जहां भय-शून्य, माथ हो उन्नत, हो ज्ञान जहां पर मुक्त, खुला यह जग हो। घर की दीवारें बनें न कोई कारा,हो जहां सत्य ही स्रोत सभी शब्दों का। हो लगन ठीक से ही सब कुछ करने की, हों नहीं रूढ़ियां रचती कोई मरुथल, पाए न सूखने इस विवेक की धारा। हो सदा विचारों, कर्मों की गति फलती, बातें हों सारी सोची और विचारी,मुक्त वह स्वर्ग रचाओ हममें/बस उसी स्वर्ग में जागे देश हमारा। विविधताओं से भरे इस विशाल देश के हम निवासी।हिन्दू धर्म की जितनी भी शाखाएं हैं वे सभी दिवाली के महत्व को स्वीकार करती हैं। वास्तव में दीप मालिका का सन्देश मनुष्य के कर्मशील बनने का है जो कि भारतीय संस्कृति का भौतिक स्वरूप है। इस पर्व पर सुनाई जाने वाली कहानी गृहलक्ष्मी की महत्ता को बताती है और पाश्चात्य संस्कृति से अलग नारी शक्ति का गुणगान करती है। स्त्री और पुरुष दोनों मिलकर घर की गाड़ी को किस युक्ति से खींचे, इसका सन्देश भी दिवाली का पर्व देता है। आज रात्रि को पूजन के समय जो कहानी कही जाती है वह विपन्न व गरीबी की मार सह रहे एक व्यक्ति की होती है जिससे उसकी पुत्रवधू अपनी बुद्धि चातुर्य से निजात दिलाती है। भारत में कही जाने वाली लोक-कथाओं में व्यावहारिक जीवन का सच छिपा पड़ा है। यही वजह है कि 1932 के करीब राष्ट्रिपता महात्मा गांधी ने कहा था कि भारत के लोग गरीब व अनपढ़ हो सकते हैं मगर वे मूर्ख नहीं हैं। यह उन्होंने तब कहा था जब आजादी की लड़ाई लड़ने वाली कांग्रेस पार्टी ने यह तय किया था कि स्वतन्त्र भारत में सारे जातिगत या सम्प्रदायगत भेदों को भूलकर प्रत्येक वयस्क स्त्री- पुरुष को एक समान रूप से वोट देने का अधिकार मिलेगा। हम भारतीय प्रत्येक बड़े पर्व के साथ एक लोक कहानी को जोड़ कर चलते हैं। दिवाली की कहानी भी हमें यही बताती है कि किस तरीके से विपन्नता को एक गृहलक्ष्मी सम्पन्नता में बदलती देती है। कहानी में एक पुत्रवधू अपने ससुर के माध्यम से पूरे परिवार को कर्मशील बनाती है और घर में मतैक्य कायम करती है। परिवार तभी इकट्ठा रह सकता है जब उसमें मतैक्य हो जाये और इसी आधार पर स्त्री-पुरुष दोनों को अधिकार सम्पन्न किया जाये। इसमें भी घर में सुख-शान्ति बनाये रखने की जिम्मेदारी गृहलक्ष्मी उठाये। यदि हम गौर से विश्लेषण करें तो भारत में लोकतन्त्र सबसे पहले घर से ही शुरू होता है। दीपावली की कहानी में गरीब ब्राह्मण व्यक्ति का परिवार कलह और स्वच्छन्दता का पर्याय था। इस घर की नववधू जब यह देखती है तो वह इसका कारण जान जाती है क्योंकि केवल ससुर को छोड़कर इस परिवार के सभी पुरुष सदस्य महा-आलसी व निखट्टू थे। वधू अपने ससुर को इस बात के लिए राजी कर लेती है कि घर का प्रत्येक पुरुष कुछ कर्म करने के लिए घर से बाहर निकले और वापस घर में खाली हाथ न आये। यदि कुछ काम न भी मिले तो वह बेशक मिट्टी या ईंधन की लकड़ी लेकर ही आये लेकिन उसके हाथ खाली न हों। इस नियम के चलते ही एक दिन उसका ससुर मरा हुआ सांप लेकर घर में आता है और सुदृढ़ बहू अपने ससुर से उसे छत पर फेंक देने के लिए कहती है। इसी से वह घटना जुड़ी होती है जिसमें उस राज्य के राजा की रानी का हार गुसलखाने में लगी खूंटी से गायब हो जाता है और एक चील उसे अपनी चोंच में भरकर गायब हो जाती है तथा गरीब ब्राह्मण की छत पर पड़े हुए मरे सांप को देखकर हार को अपनी चोंच से छोड़ कर मरे सांप को ले जाती है। मेरा उद्देश्य कहानी सुनाने का नहीं है बल्कि इसके पीछे छिपे सन्देश को बाहर लाने का है और सन्देश यही है कि केवल कर्मशील व्यक्ति ही जीवन के भौतिक सुखों का आनन्द ले पाता है। हिन्दू धर्म में लोक कहानियों के पीछे कहीं न कहीं बहुत बड़ा सन्देश होता है। अतः जो लोग कर्मकांड को केवल ढोंग समझते हैं उन्हें सबसे ज्यादा इन्हीं प्रचिलित कहानियों के महत्व को समझना चाहिए। ये सन्देश पूरे समाज को एकता के सूत्र में बांधने का ही होता है मगर यह एकता सबसे पहले परिवार से ही शुरू होती है।

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