शैक्षिक दौरा – एक श्रेष्ठ शिक्षा प्रणाली कायम करें।

रिपोर्ट : अजित चौबे (विशेष संवाददाता)

बक्सर ,भारत की एक अनूठी संस्कृति है और यह दुनिया की सबसे पुरानी और महान सभ्यताओं में से एक है। इसके साथ ही यह अपने-आप को बदलते समय के साथ ढ़ालती भी आई है। आज़ादी पाने के बाद भारत में बहुआयामी सामाजिक और आर्थिक प्रगति की है।

मंदिरों का शैक्षणिक भ्रमण बच्चों के विकास के लिए एक बहुआयामी दृष्टिकोण प्रदान करता है, जिसमें इतिहास, वास्तुकला और संस्कृति को जीवंत तरीके से सीखने के अवसर मिलते हैं। यह बच्चों को धार्मिक मूल्यों के साथ-साथ व्यावहारिक जीवन कौशल, सामाजिक सद्भाव और सौंदर्यबोध की समझ विकसित करने में मदद करता है, जिससे उनके सर्वांगीण विकास को बढ़ावा मिलता है।

मंदिर में होने वाले अनुष्ठानों और कहानियों के माध्यम से, बच्चे जीवन के मूल्यों, नैतिकता और दर्शन के बारे में सीखते हैं, जैसे कि भक्ति और समर्पण का महत्व।

आज प्रचलित शिक्षा के लिए पारम्परिक दृष्टिकोण निर्धारित पुस्तकों और पाठ्यकर्म के एक सेट से छात्रों को ज्ञान के प्रसारण पर केंद्रित है । ऐसे में किसी भी स्कूल के द्वारा शैक्षिक विजिट बच्चो के आंतरिक विकास के साथ साथ उनके सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक विकास में वृद्धि कर उन्हें भारत को जानने और अपनी संस्कृति को समझने का मौका मिलेगा। शिक्षा इस समझ के साथ शुरू होती है की शिकक्ष की भूमिका बच्चो की छुपी और जन्मजात विकासात्मक शक्तियों को प्रकट करने में मदद करने के लिए है।

उत्तरप्रदेश के रामपुर कलां खरौनी बलिया में स्थित विवेकानंद विद्या मंदिर स्कूल के बच्चो को लेकर ये शैक्षिक दौरा बिहार के बक्सर ज़िले में स्थित माँ अहिल्या के पावन धाम अहिरौली में माता के दर्शन को लाया गया । यहां पे शिक्षकों एवं स्थानीय लोगो के दवारा त्रेतायुग की पौराणिक कथा माँ अहिल्या के बारे में बताया गया साथ ही साथ बच्चो को गौतम ऋषि और भगवान राम , लक्मण , विश्वामित्र एवं राक्षसी तड़का एवं सुबाहु की वध के बारे में भी जानकारी दिया गया। बच्चो को इसके बाद बक्सर के लड़ाई के मैदान दिखाया गया। १७६४ के लड़ाई के इतिहास के बारे में बताया गया की इसी युद्ध के बाद अंग्रेज़ो ने भारत में अपना कब्ज़ा शुरू किया और हमारा देश २०० साल तक अंग्रेज़ो की गुलामी की ज़ंज़ीर में जकड़ा रहा। सन १९४७ के आज़ादी के बाद अँगरेज़ भारत छोड़ चले गए। इस तरह के ऐतिहासिक एवं पौराणिक जगहों पे घूमकर बच्चे बहुत ही ख़ुश नज़र आये।

ये बदलते भारत की बदलती तस्वीर है। बच्चो की बौद्धिक क्षमता के साथ साथ अपने देश की संस्कृति , सभ्यता एवं कला को समझने के लिए एक मौका है। भारत के हर स्कूल में पाठ्यक्रम के साथ साथ इस तरह के शैक्षिक दौरा बच्चो के लिए अनिवार्य कर दिया जाए।

वैश्विक प्रतिस्पर्धा में बेहतरीन प्रदर्शन के लिए यह जरूरी शर्त है। यह आवश्यकता तभी पूरी होगी जब हम एक श्रेष्ठ शिक्षा प्रणाली कायम करें। शिक्षा में यह क्षमता है कि वह किसी राष्ट्र को वैश्विक महाशक्ति के रूप में स्थापित कर सकती है। शिक्षा नीति के तहत स्कूली व उच्च शिक्षा में शोध, नवाचार और सृजनात्मक वातावरण को बढ़ावा देने के गंभीर प्रयास किए गए हैं। नई शिक्षा नीति भारत केंद्रित है जिसमें हमारी गौरवमयी संस्कृति और मानवीय मूल्यों के संरक्षण-संवर्धन पर काफी जोर है। हमारी संस्कृति अध्यात्म की एक निरंतर बहती धारा है जिसे ऋषियों-मुनियों, संतों और सूफियों ने अपने पवित्र जीवन दर्शन से लगातार सींचा है। नवाचार के माध्यम से हमें उसी जीवन दर्शन को न केवल भारत बल्कि पूरे विश्व में प्रचारित-प्रसारित करना है। हर क्षेत्र में इनोवेशन की आवश्यकता है।

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