लघु निबंध: मथुरा की मिट्टी और काशी के मसान की राख की होली!
साहित्य सृजन।
राजीव कुमार झा
इस वर्ष की शुरुआत में वसंत ऋतु में प्रयागराज में लाखों करोड़ों लोगों के द्वारा कुंभ के गंगा-स्नान से सारे देश के लोगों के हृदय में पावन जीवन को संचार हुआ । कुंभ में सारे देश के लोग एकत्रित हुए और गंगा की पावन धारा ने सबके मन को पवित्रता के एक सुरभित रंग से सराबोर कर दिया है और इसी बीच होली की आहट को लेकर फागुन का भी आगमन हो चुका है। फसलों फूलों मंजूरियों से चतुर्दिक परिपूर्ण धरती सबको सुख प्रदान कर रही है और सुख शांति आनंद उल्लास के गीत सभी दिशाओं में गूंजते सुनाई दे रहे हैं। जाड़े के मौसम में रजाई की गर्माहट सालों भर याद आती है और ग्रीष्म के मौसम में इसी तरह धूप भी सबको पगडंडियों पर चलते हुए अपने पास बुलाती है। पेड़ पौधों के विनाश और उनकी अंधाधुंध कटाई ने जिंदगी की छांव से सबके मन को दूर कर दिया है। सचमुच इस मौसम में चैत के खत्म होते ही सारे लोग
विकल हो उठते हैं और लू के थपेड़ों से अब जनजीवन बेहाल हो जाता है। यह वातानुकूलित संयंत्रों से सुसज्जित घरों का जमाना सबके मन को अपनी तरफ आकृष्ट करता है लेकिन इसके साथ आकाश का मृदु आवरण भी क्लोरो फ्लोरो कार्बन के स्राव से क्षीण होता जा रहा है।
वसंत हमें जीवन में निरंतर प्रकृति के साथ जीवन के सामंजस्य की याद दिलाता है।
इसे मधुमास भी कहा जाता है और यह प्रेम में संयोग के सुख की ऋतु है। आज इसकी विरहाग्नि में सुलगती पृथ्वी जीवन को नैसर्गिकता की सीख देती है लेकिन हमारे जीवन में भौतिक सुख की आपाधापी में उलझे मन को यह सब व्यर्थ प्रतीत होता है और हमारे एकाकी होते जाते जीवन में सर्वत्र स्वार्थ का बोलबाला वसंत की आबोहवा में जहर घोलता दिखाई देता है। फागुन के सरस दिनों की याद अब सबको खूब सताती है। गांवों में छठ के गीतों की तरह पहले होली के गीत गाए जाते थे लेकिन बाग बगीचों में मंजूरियों की महक की तरह से ही वसंत ऋतु में कोयल के सुर की पंचम तान हमारे खामोश होते जाते मन की व्यथा का बयान करती है। यह पेट्रोल के धूएं और कल कारखानों के शोर शराबों के बीच अबाध गति से दौड़ती मोटर रेलगाड़ियों और आकाश में उड़ते वायुयानों का जमाना है और हमारा जीवन निरंतर बदलता जा रहा है। वैश्विक तापीकरण के इस युग में जीवन अब खतरों से खाली नहीं है। सारे संसार में हम मनुष्य एक दूसरे के चाहे कितने करीब आ गये हों लेकिन देश की धरती से बाहर जिंदगी की लड़ाई में भटकते लोगों को लेकर भी हमने पहली बार सोचना शुरू किया। पहले साम्राज्यवादी सेना के साथ सत्ता की हवश और इसके बलात् खेल में धर्म धरती और संस्कृति की सीमा को रौंदकर मनुष्य की आबादी दुनिया में एक क्षेत्र से विस्थापित होकर दूसरे देशों में आकर बस्ती रही लेकिन अब उसकी जगह रोजी-रोटी की लड़ाई में सारे संसार के लोग या पूर्व से पश्चिम की तरफ मनुष्य रोजाना भागदौड़ करता दिखाई देता है। यह गांवों से लेकर शहरों तक के हमारे जीवन क्रम को प्रभावित कर रहा है और इन सबके बीच वसंत की सुगबुगाहट
हवा की थिरकन में मुस्कान भर्ती दिखाई देती है और सचमुच ऐसा
लगता है कि मानो इस बार मथुरा में मिट्टी की तो काशी में मसान के राख की होली सबके जीवन की यादगार बन जाएगी और इस साल के कुंभ का गंगा स्नान हमारे मन को शताब्दियों के जोर जुल्म के ताप से आहत मन को सांत्वना प्रदान करता रहेगा।



