वो ख़फा था आज बेहद शाम तक लौटा नहीं रात सारे मंदिरों की सीढ़ियां देखी गईं।

शाम तक लौटा नहीं

आज गुफ्तगू पब्लिकेशन, इलाहाबाद से प्रकाशित डॉ सोमनाथ शुक्ल का ग़ज़ल संग्रह, शाम तक लौटा नहीं जनार्पित हुआ। संग्रह में संग्रहीत ग़ज़लों ने मन मोह लिया। आज जब ग़ज़ल विधा, पंचायत की ज़मीन जैसी हो गई है, ग़रीब की जोरू हो गई है या गाँव भर की भौजाई हो गई है, जो चाहे जैसे जैसे चाहे वैसे बरत रहा है, इस मेयार के ग़ज़ल संग्रह का प्रकाशन एक सुखद परिघटना है। ग़ज़ल हिन्दी या उर्दू की नहीं होती, हिन्दुस्तानी होती है। उसका हिन्दुस्तानी चेहरा, आज की कविता का भी चेहरा है। सच कहें तो ग़ज़ल है, तो हिन्दुस्तान है, जो दोनों भाषाओं को नज़दीक लाता है। शाम तक लौटा नहीं, यह उन्वान है किताब का। इस शीर्षक को समेटे ग़ज़ल का यह शेर देखें/

वो ख़फा था आज बेहद शाम तक लौटा नहीं
रात सारे मंदिरों की सीढ़ियां देखी गईं।

संग्रह की ग़ज़लों का कथ्य मज़बूत है और शिल्प भी कसी मुठ्ठी जैसा। संवेदना के साथ इनका निर्वाह विलक्षण है। सारी ग़ज़लें अपने पाठक से एक संवाद करती सी दिखाई देती हैं, उनमें ज़िन्दगी के मुहावरे हैं, देश दुनिया और समाज की धड़कनें हैं, जिनमें हमारा समय बोलता है। जिसके बोलने में आम आदमी का दर्द उजागर होता है। एक रोशनी मिलती है, जो अंधेरों को भी एक जगमगाहट दे देती है। दुष्यन्त कुमार, और अदम गोंडवी की विरासत जहां महफूज़ महसूस होती है । रिश्तों का रूमान और रोजबरोज़ का जीवन संघर्ष जहां साथ साथ चलता है और भरपूर जी लेने के उपाय जहां मुहैया होते हैं। सामान्य व्यक्ति की जिजीविषा और उत्सवधर्मिता जहां हाथ में हाथ लेकर डोलते हैं, वहां सम्भव होती हैं यह ग़ज़लें। मैं संग्रह से एक पूरी ग़ज़ल भी यहां दे रहा हूँ, ग़ज़लकार को रचनात्मक सफ़र की शुभकामनाएं देते हुए/

खिले खिले से गुलों पर खुमार बाक़ी है
अभी दरख़्त पे रिमझिम फुहार बाक़ी है

किसी के तल्ख़ रुखों से चिटक गई थी जो
जिगर पे आज तलक वो दरार बाक़ी है

कहां मिला है मुझे कुछ मैं ये नहीं कहता
ख़ुशी नसीब हुई है क़रार बाक़ी है

तमाम कर्ज़ ख़ुशी से अदा किए मैंने
मगर हयात का मुझपे उधार बाक़ी है

बिता के वक़्त बुरा भी संभल गए हम तो
कहानियों में हमारा शुमार बाक़ी है।

/ यश मालवीय

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