उत्तर प्रदेश के वाराणसी की पत्रकार पायल लक्ष्मी सोनी से राजीव कुमार झा की बातचीत!

नारी जीवन: पत्रकारिता

 

“जहां तक मेरे शहर काशी ( वाराणसी ) का सवाल है ,वह केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि मेरी चेतना का एक अहम हिस्सा है। “

प्रश्न 1: आपने पत्रकारिता को अपने जीवन का कार्य क्षेत्र चुना है। महिलाओं के लिए पत्रकारिता में आज किस प्रकार की परिस्थितियां हैं?

उत्तर: आज के दौर में महिलाओं के लिए पत्रकारिता के द्वार पहले से कहीं अधिक खुले हैं। वे केवल डेस्क या सॉफ्ट बीट्स तक सीमित नहीं हैं, बल्कि युद्ध क्षेत्र, राजनीतिक विश्लेषण और खोजी पत्रकारिता (Investigative Journalism) जैसे चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में भी अपनी योग्यता साबित कर रही हैं। हालांकि, परिस्थितियां पूरी तरह आदर्श नहीं हैं। फील्ड में सुरक्षा की चुनौतियाँ, कामकाजी घंटों की अनिश्चितता और शीर्ष नेतृत्व (Editorial Leadership) के पदों पर महिलाओं का कम प्रतिनिधित्व आज भी कुछ बड़ी बाधाएँ हैं। इसके बावजूद, महिला पत्रकार अपनी संवेदनशीलता, निष्पक्षता और दृढ़ इच्छाशक्ति से इन परिस्थितियों को अपने अनुकूल बना रही हैं। आज की महिला पत्रकार ‘ स्पष्टता’ और ‘साहस’ का एक बेहतरीन संतुलन पेश कर रही हैं।

​प्रश्न 2: पत्रकारिता के अलावा साहित्य से भी आपका लगाव है। आपको किन-किन विधाओं में लेखन करना पसंद है?

​उत्तर: पत्रकारिता जहाँ समाज का यथार्थ और समसामयिक सच सामने लाती है, वहीं साहित्य मुझे उस सच को गहराई और संवेदना के साथ महसूस करने का अवसर देता है। मुझे लेखन में मुख्य रूप से ग़ज़ल, नज़्म, अतुकांत कविताओं के साथ गद्य (विशेषकर उपन्यास व वैचारिक एवं समसामयिक, ऐतिहासिक सत्यता पर लिखे आलेख) पसंद हैं। कविता या ग़ज़ल के माध्यम से जहाँ मैं मानवीय भावनाओं, सामाजिक सरोकारों और ‘नारी चेतना’ (Women’s Consciousness) को छंदबद्ध अभिव्यक्ति देती हूँ, वहीं गद्य के जरिए समाज के जटिल ताने-बाने और ऐतिहासिक-सांस्कृतिक संदर्भों को विस्तार से टटोलने का प्रयास करती हूँ। मेरे लिए ये दोनों विधाएं एक-दूसरे की पूरक हैं।

प्रश्न 3: प्रमिला देवी फाउंडेशन के माध्यम से आप क्या कार्य करना चाहती हैं?

​उत्तर:‘प्रमिला देवी फाउंडेशन’ मूलतः एक सामाजिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक संस्था है, जिसका ध्येय जन-जन की सेवा और समाज में एक सकारात्मक चेतना का निर्माण करना है। फाउंडेशन केवल विचारों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने धरातल पर उतरकर कई महत्वपूर्ण कार्य किए हैं और आगे भी इन्हें विस्तार देना चाहती है, जन-स्वास्थ्य को प्राथमिकता देते हुए फाउंडेशन ने बड़े स्तर पर योग शिविरों और स्वास्थ्य प्रशिक्षण कार्यक्रमों का सफल आयोजन किया है, जिससे लोगों को स्वस्थ जीवनशैली के प्रति जागरूक किया जा सके। ​पर्यावरण संरक्षण (एक वृक्ष अभियान): प्रकृति के संतुलन के लिए हमने ‘एक वृक्ष’ की संकल्पना पर कार्य करते हुए व्यापक स्तर पर पौधारोपण अभियान चलाए हैं, ताकि आने वाली पीढ़ियों को एक सुरक्षित पर्यावरण मिल सके। ​नारी विमर्श ,महिलाओं के अधिकारों, उनकी अस्मिता और सुरक्षा को लेकर संस्था निरंतर जन-जागरूकता कार्यक्रमों और वैचारिक विमर्श का आयोजन करती रही है। एक साहित्यिक संस्था होने के नाते हम न केवल रचनात्मकता को मंच देते हैं, बल्कि अपने कार्यक्रमों के माध्यम से राष्ट्र के प्रति लोगों में कर्तव्यबोध और अटूट चेतना भरने का राष्ट्रीय कार्य भी करते हैं।

प्रश्न 4: आप अपनी शिक्षा, अपने घर परिवार और अपने शहर वाराणसी के बारे में संक्षेप में बताइए।

​उत्तर: मेरी प्रारंभिक शिक्षा काशी में हुई और जीवन के मूल्यों की नींव मेरे परिवार में पड़ी, जहाँ वैचारिक स्वतंत्रता और राष्ट्रीय,सामाजिक सरोकारों को हमेशा प्राथमिकता दी गई। पारिवारिक परिवेश साहित्यिक नहीं था लेकिन राष्ट्रवाद से ओतप्रोत रहा जिसने मुझे अपने देश के प्रति कर्तव्यबोध कराया और मुझे सदैव कुछ सार्थक करने के लिए प्रेरित किया। मेरे विचार सदैव “सर्वे भवन्तु सुखिन:” एवं “वसुधैव कुटुम्बकम्” का रहा है। ​जहाँ तक मेरे शहर वाराणसी (काशी) का सवाल है, वह केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि मेरी चेतना का अहम हिस्सा है। काशी कबीर की फक्कड़ता, तुलसी के समर्पण और कला-साहित्य की अमर विरासत का शहर है। इस शहर ने मुझे जीवन और संसार को एक गहरी और ठहरी हुई दृष्टि से देखना सिखाया। यहाँ की गलियों, घाटों और सांस्कृतिक ताने-बाने ने मेरे भीतर के लेखक और पत्रकार दोनों को तराशा है। काशी से मिली सांस्कृतिक थाती ही मेरी शिक्षा और संस्कारों का मूल आधार है।

​प्रश्न 5: सोशल मीडिया आज समाचार का काफी बड़ा माध्यम बनता जा रहा है। इसकी भूमिका के बारे में क्या कहना चाहेंगी?

​उत्तर: सोशल मीडिया ने सूचनाओं का ‘लोकतांत्रिकरण’ (Democratization) किया है। आज आम नागरिक भी केवल समाचार का उपभोक्ता नहीं, बल्कि ‘सिटिजन जर्नलिस्ट’ बनकर समाचार का स्रोत बन चुका है। इसने उन आवाजों को मंच दिया है जो मुख्यधारा के मीडिया (Mainstream Media) में कहीं छूट जाती थीं। इसकी त्वरित पहुँच (Instant Reach) संकट के समय में बेहद मददगार साबित होती है। ​लेकिन, इस सिक्के का दूसरा पहलू भी है। सोशल मीडिया पर सनसनीखेज खबरों की बाढ़, तथ्य-जांच (Fact-checking) की कमी और टीआरपी की अंधी दौड़ ने सूचनाओं की विश्वसनीयता को कमजोर किया है। जिससे समाज में भ्रम की स्थिति बनती है। यह एक शक्तिशाली उपकरण है, लेकिन इसकी भूमिका तभी सार्थक होगी जब इसे जिम्मेदारी के साथ इस्तेमाल किया जाए।

प्रश्न 6: सोशल मीडिया पर सरकार को किस तरह का नियंत्रण कायम करना चाहिए?​उत्तर: यह एक बेहद संवेदनशील और गंभीर विषय है। सरकार का नियंत्रण ऐसा होना चाहिए जो ‘नियमन’ (Regulation) और ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ (Freedom of Speech) के बीच एक महीन संतुलन बना सके। सरकार को ‘फेक न्यूज’ (Fake News), डीपफेक (Deepfake) और हेट स्पीच (Hate Speech) को रोकने के लिए सख्त और पारदर्शी तकनीकी कानून बनाने चाहिए, ताकि देश की संप्रभुता और सामाजिक सौहार्द सुरक्षित रहे।नियंत्रण का उद्देश्य लोकतांत्रिक आवाजों या रचनात्मक आलोचना को दबाना (Censorship) बिल्कुल नहीं होना चाहिए। ​सरकार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स (जैसे X, Meta आदि) को कानूनी रूप से अधिक जवाबदेह बनाना चाहिए, न कि सीधे तौर पर नागरिकों की अभिव्यक्ति पर अंकुश लगाना चाहिए। एक स्वतंत्र समाज में ‘अंकुश’ से बेहतर ‘सकारात्मक नियमन’ होता है।

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