विमर्श:क्या राम ईश्वर हैं?
धर्म अध्यात्म और समाज
राजीव कुमार झा
रामायण की रचना के साथ राम ईश्वर के रूप में प्रतिष्ठित हुए और इस बार ईश्वर ने क्षत्रिय कुल में अवतार ग्रहण किया। ईश्वर को क्षत्रिय रूप में मानना परशुराम को पसंद नहीं आया। वह शास्त्रों में वर्णित ईश्वर के अन्य रूपों के खासकर शिवरूप में उसके उपासक थे। रामायण की अन्य कथा में परशुराम को ईश्वर रूप में राम की महत्ता को स्वीकार करते हुए भी दिखाया गया है। शास्त्रकारों के बारे में शायद कुछ भी नहीं कहा जा सकता है। परशुराम को भी ईश्वर का अवतार माना जाता है लेकिन राम की प्रभुता के आगे वह माथा नवाते हुए दिखाए गए हैं।
किसी महाकाव्य में वर्णित ऐसे प्रसंगों के बारे में क्या कहा जा सकता है? लेकिन यह भी एक सत्य है कि तुलसीदास ने भी राम को ईश्वर के रूप में अपने महाकाव्य रामचरित मानस में चित्रित किया है। राम को इसके बाद व्यापक रूप से ईश्वर माना जाने लगा। वह विष्णु के रूप में प्रतिष्ठित हो गये। देश समाज और राष्ट्र के समक्ष आदर्शों को प्रस्तुत करने वाले महानायक हो गये। ईश्वर की लौकिक सत्ता का साक्षात् निर्वहन करने वाले राम का ईश्वरत्व ब्रह्म की सत्ता और उसकी महिमा का आख्यान कहा जाता है। राम को प्रेम का प्रतीक माना जाता है और रामचरित मानस में उनको क्षमाशील, गुणों का आगार और भक्तवत्सल कहा गया है। अपने वचनों से वह रामचरित मानस में
धर्म के रूप में मनुष्य के आचरण उसके व्यवहार और कर्म पर चिंतन करते दिखाई देते हैं। यह सिलसिला आज भी हमारे समाज में जारी है। ऐसा माना जा रहा है कि रामचरितमानस में वर्णित जीवन संघर्ष की कथा राष्ट्र राज्य शासन समाज और व्यक्ति के प्रसंग में खत्म नहीं हुई है। लेकिन इस संदर्भ में यह प्रश्न भी जरूरी है कि हम रामकथा के निहितार्थ का अनुसरण किस
तरह से करते हैं? इसमें कहीं कुछ अनर्थ तो नहीं हो रहा है?


