संपादकीय: बिहार को चाहिए मुद्दों पर केंद्रित राजनीति, न कि भटकाव की रणनीति

 

बिहार एक बार फिर चुनावी मोड़ पर है। इतिहास गवाह है कि जब-जब सत्ता की लड़ाई में असली मुद्दों की आवाज़ दब जाती है, जनता सबसे बड़ा नुकसान झेलती है। रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग, पलायन, कृषि और गरीबी—ये वही पुराने ज़ख़्म हैं जो दशकों से बिहार के विकास में बाधा बने हुए हैं। लेकिन राजनीतिक दल बार-बार इन्हें दरकिनार कर भावनात्मक और जातीय समीकरणों में जनता को उलझा देते हैं।

कांग्रेस नेता हयात अशरफ, जो कस्बा विधानसभा से प्रत्याशी रह चुके हैं, का यह कहना बिल्कुल सटीक है कि 2014 के बाद से बिहार की जनता एक उम्मीद के सहारे इंतज़ार कर रही है कि कब भूख और पलायन खत्म होगा, कब स्कूलों और अस्पतालों में गुणवत्ता लौटेगी, कब उद्योग लगेंगे और नौजवान अपने घर में रोज़गार पाएंगे। अफ़सोस, सत्ताधारी दल, ख़ासकर भारतीय जनता पार्टी, बार-बार नए-नए मुद्दों का शोर मचाकर जनता का ध्यान असली सवालों से हटा देती है। यह केवल सत्ता बचाने की चाल नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा के साथ खिलवाड़ है।

अब बिहार को फैसला लेना होगा। जनता को तय करना होगा कि वोट जात-पात और तात्कालिक बहसों पर पड़ेगा या उस विकास के लिए, जो हर घर तक रोज़गार, शिक्षा और स्वास्थ्य की गारंटी लेकर आए। चुनावी विमर्श को कृषि सुधार, निवेश, बुनियादी ढांचे के विस्तार, युवाओं के लिए रोजगार सृजन और सामाजिक न्याय की दिशा में मोड़ना ही बिहार की असली ज़रूरत है।

आने वाला चुनाव सिर्फ सत्ता बदलने का मौका नहीं, बल्कि बिहार की दिशा तय करने की घड़ी है। अब समय है कि जनता नेताओं से साफ़ सवाल पूछे — सड़क, अस्पताल, शिक्षा, उद्योग कब और कैसे मिलेंगे? भावनाओं और भटकाव से ऊपर उठकर, मुद्दों पर आधारित राजनीति ही बिहार को उसकी असली ताक़त लौटाएगी।

लेखक हयात अशरफ पूर्व विधानसभा प्रत्याशी कस्बा 58 बिहार

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button