मैंने नयी दिल्ली के महाराष्ट्र सदन में तीजन बाई का पंडवानी गायन सुना था!

छत्तीसगढ़: लोककला पुण्य स्मरण: तीजन बाई

 

राजीव कुमार झा

दिल्ली में उन दिनों मैं लोदी रोड में स्थित भारतीय ज्ञानपीठ के प्रकाशन विभाग में नौकरी करता था और शाम में प्रायः नाटक,सिनेमा देखने और गोष्ठियों में भाग लेने इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, हैबिटेट सेंटर के अलावा मंडी हाउस भी जाया करता था और उन्हीं दिनों मुझे कहीं ऐसी ही किसी जगह के नोटिस बोर्ड पर महाराष्ट्र सदन के द्वारा जारी पब्लिक आमंत्रण All are cordially invited से महाराष्ट्र दिवस के मौके पर महाराष्ट्र सदन में
आयोजित तीजन बाई के पंडवानी गायन और वहां उनके पधारने के बारे में जानकारी मिली।
महाराष्ट्र सदन में उस दिन ज्यादा भीड़ नहीं थी और मुझे आराम से तीजन बाई के कार्यक्रम में बैठने के लिए कुर्सी मिल गयी।

उन्होंने ओपन स्पेस मंच पर अपना कार्यक्रम प्रस्तुत किया। तीजन बाई इस दिन अपने पूरी संगीत मंडली के साथ वहां आई थीं और उसमें ज्यादा कलाकार नहीं थे। उस दिन महाभारत की कथा के किस अंश को उन्होंने प्रस्तुत किया था यह मुझे याद नहीं आ रहा है लेकिन वह इस महाकाव्य का कोई सुंदर प्रसंग ही था। महाभारत के सारे कथा प्रसंग समाज संस्कृति धर्म और व्यवस्था से जुड़े पाप – पुण्य और नैतिकता -अनैतिकता की भावना की वैचारिक विवेचना को प्रस्तुत करते हैं और तीजन बाई के गायन और अभिनय से शायद ऐसे ही भावों की अभिव्यंजना वहां मंच पर होती रही।
तीजन बाई का कार्यक्रम शायद एक घंटे तक वहां चला और फिर कार्यक्रम खत्म होने से पहले काफी आत्मीय अंदाज में उन्होंने सबसे विदाई मांगी । वह महाराष्ट्र सदन के द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में विशेष रूप से भाग लेने दिल्ली आयी थीं।
तीजन बाई एक महान लोक कलाकार थीं और उन्होंने छत्तीसगढ़ की लोकनाट्य शैली पंडवानी को देश में लोकप्रिय बनाया। उनकी कला में सादगी सरसता और सहजता के साथ आत्मीयता का समावेश था। उनके नारी हृदय में रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्य की कथा के सार को जनमानस में प्रतिष्ठित करने का पावन भाव समाया था। उन्होंने देश विदेश में भारतीय लोक संगीत नाटक के प्रचार प्रसार से देश का नाम रोशन किया। उनके निधन से लोक कला संगीत का मंच सूना लग रहा है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button