फुलिया के करघे पर बुना जा रहा तिरंगा, धागों में उतर रही देशभक्ति

* बंगाल की प्रसिद्ध हथकरघा नगरी से स्वतंत्रता दिवस पर अनूठा संदेश, करघे पर ही उकेरा जा रहा अशोक चक्र

 

अजित प्रसाद
फुलिया : पश्चिम बंगाल के नदिया जिले में स्थित फुलिया लंबे समय से अपनी समृद्ध हथकरघा परंपरा और उत्कृष्ट सूती वस्त्रों के लिए देशभर में पहचान रखता है। शांतिपुर और फुलिया क्षेत्र की बुनकरी परंपरा बंगाल की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है। यहां के करघों पर तैयार होने वाली साड़ियां और अन्य वस्त्र अपनी बुनाई, डिजाइन और कारीगरी के लिए प्रसिद्ध हैं। इसी पारंपरिक बुनकर नगरी से अब देशभक्ति की एक अनूठी मिसाल सामने आ रही है।

स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर फुलिया के बुनकरों ने इस बार करघे पर ही राष्ट्रीय ध्वज बुनने की पहल की है। आमतौर पर राष्ट्रीय ध्वज को कपड़े पर तैयार करने के बाद उसके विभिन्न हिस्सों को सिलाई, डिजाइन या अशोक चक्र की स्टांपिंग के जरिए पूरा किया जाता है। लेकिन फुलिया के कारीगर इस प्रक्रिया से अलग हटकर तिरंगे को सीधे हथकरघे पर बुन रहे हैं। इतना ही नहीं, ध्वज के बीच में मौजूद अशोक चक्र को भी बुनाई के दौरान ही कपड़े पर उकेरा जा रहा है।

इस अनूठी पहल को राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त हथकरघा कलाकार अभिनव बसाक और राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त डिजाइनर मंटू बसाक के संयुक्त प्रयास से आकार दिया जा रहा है। ‘वीवर सर्विस सेंटर’ भी इस कार्य में सहयोग कर रहा है। इस पहल का उद्देश्य बंगाल की पारंपरिक हथकरघा कला को देशभक्ति की भावना से जोड़ने के साथ-साथ स्वदेशी उत्पादों और स्थानीय कारीगरों की क्षमता को सामने लाना है।

अभिनव बसाक के अनुसार, इस विशेष तिरंगे को 100 प्रतिशत सूती 92 काउंट के धागे से तैयार किया जा रहा है। हैंडलूम की ‘कट-शटल’ तकनीक का इस्तेमाल करते हुए कपड़े की बुनाई के साथ ही अशोक चक्र को भी उकेरा जा रहा है। तिरंगे के निर्धारित 2:3 अनुपात को ध्यान में रखते हुए इसे लगभग 21 इंच के आकार में तैयार किया जा रहा है।

इस काम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि तिरंगे पर कोई अलग से प्रिंट या बाद में लगाया गया डिजाइन नहीं होगा। इसके रंग, संरचना और अशोक चक्र को बुनाई की प्रक्रिया में ही आकार दिया जा रहा है। इसके लिए बुनकरों को अत्यंत सावधानी और तकनीकी दक्षता के साथ काम करना पड़ रहा है।

अभिनव बसाक का कहना है कि भारतीय राष्ट्रीय ध्वज से बढ़कर गर्व की बात कुछ नहीं हो सकती। उसी राष्ट्रीय ध्वज को बंगाल के पारंपरिक करघे पर सूती धागों से तैयार करना उनके लिए गौरव का विषय है। उनके अनुसार, इस पहल के जरिए स्वदेशी सोच, स्थानीय कारीगरी और बंगाल की सदियों पुरानी बुनकरी परंपरा को एक साथ सामने लाने का प्रयास किया जा रहा है।

इस विशेष राष्ट्रीय ध्वज को तैयार करने का काम टांगाइल तंतुबाय सहकारी समिति द्वारा किया जा रहा है। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर तैयार किए गए कुछ विशेष तिरंगों को फहराने की भी योजना है। इसके अलावा, बुनकर इस विशेष कलाकृति को ‘वीवर सर्विस सेंटर’ के माध्यम से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री तक पहुंचाना चाहते हैं। संभव हुआ तो इसे केंद्रीय वस्त्र मंत्रालय तक भी पहुंचाने का प्रयास किया जाएगा।

फुलिया की यह पहल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल एक राष्ट्रीय ध्वज तैयार करने का प्रयास नहीं है। यह उस क्षेत्र की पहचान और परंपरा को राष्ट्रीय गौरव से जोड़ने की कोशिश है, जहां पीढ़ियों से बुनकर अपने हाथों और करघों के जरिए बंगाल की सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखे हुए हैं।

मशीनों के बढ़ते दौर में फुलिया के बुनकरों ने करघे पर तिरंगा बुनकर यह संदेश दिया है कि देशभक्ति केवल नारों में नहीं, बल्कि अपने हुनर, अपनी परंपरा और अपनी मेहनत में भी दिखाई दे सकती है। इस बार फुलिया के करघे से निकलने वाला तिरंगा केवल कपड़ा नहीं होगा, बल्कि बंगाल की मिट्टी, बुनकरों के कौशल और भारत के प्रति उनके सम्मान का प्रतीक बनेगा।

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