कवयित्री कंचनमाला ‘अमर’ से राजीव कुमार झा की बातचीत

साहित्य: साक्षात्कार

 

कवयित्री, विज्ञान अध्यापिका, कथक नृत्यांगना और संगीत साधिका कंचनमाला ‘अमर’ बहुआयामी व्यक्तित्व की धनी हैं। उनका काव्य-संग्रह “इसी रहगुज़र से” पाठकों द्वारा खूब सराहा गया है। उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश:

प्रश्न 1: सोशल मीडिया पर कविता लेखन के लिए मिले सम्मानों के बारे में आपकी क्या अनुभूति है?
उत्तर: सोशल मीडिया ने मेरी रचनाओं को पाठकों तक पहुँचाने का एक व्यापक माध्यम प्रदान किया है। जब मेरी कविताओं को पाठकों का स्नेह और विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मान मिला, तो यह मेरे लिए अत्यंत सुखद और प्रेरणादायक क्षण था। मैं इन सम्मानों को केवल अपनी उपलब्धि नहीं, बल्कि अपने पाठकों, शुभचिंतकों और गुरुजनों के विश्वास का सम्मान मानती हूँ। हर सम्मान मुझे और अधिक जिम्मेदारी के साथ लिखने की प्रेरणा देता है। मेरा विश्वास है कि सच्चा साहित्य समय और माध्यम की सीमाओं से परे होता है।

प्रश्न 2: अपने एकल काव्य-संग्रह ‘इसी रहगुज़र से’ के बारे में बताइए।
उत्तर: ‘इसी रहगुज़र से’ मेरा प्रथम एकल काव्य-संग्रह है, जो मेरे जीवन के विविध अनुभवों, संवेदनाओं और मनोभावों का साहित्यिक प्रतिबिंब है। इसमें प्रेम, विरह, आत्मचिंतन, प्रकृति, सामाजिक सरोकार और मानवीय रिश्तों की अनेक भाव-छवियाँ समाहित हैं। इस संग्रह की प्रत्येक रचना मेरे जीवन की किसी न किसी अनुभूति से जुड़ी हुई है। मैंने सहज और भावपूर्ण भाषा में अपने विचारों को अभिव्यक्त करने का प्रयास किया है। पाठकों ने इस पुस्तक को जिस आत्मीयता से अपनाया, वह मेरे लिए सबसे बड़ा पुरस्कार है।

प्रश्न 3: अपने घर-परिवार, माता-पिता और पढ़ाई-लिखाई के बारे में बताइए।
उत्तर: मेरा मूल निवास बिहार के मुज़फ्फरपुर से है, जबकि वर्तमान में मैं दिल्ली में निवास करती हूँ। मेरे पिता स्वर्गीय अमरनाथ झा और माता श्रीमती पुनीता देवी ने मुझे संस्कार, शिक्षा और मेहनत का महत्व सिखाया। विवाह उपरांत परिवार में मेरे दोनों बेटों का सहयोग मेरे जीवन की सबसे बड़ी शक्ति रहा है। शिक्षा के क्षेत्र में मैंने विज्ञान और शिक्षा दोनों विषयों में उच्च अध्ययन किया है। साथ ही संगीत और कथक की भी विधिवत शिक्षा प्राप्त की है। वर्तमान में मैं शिक्षा के क्षेत्र में शोध कार्य भी कर रही हूँ।

प्रश्न 4: विज्ञान की अध्यापिका होने के साथ साहित्य के प्रति आपके लगाव के बारे में आप क्या कहना चाहेंगी?
उत्तर: मेरे लिए विज्ञान और साहित्य एक-दूसरे के पूरक हैं। विज्ञान जीवन को तर्क और तथ्य देता है, जबकि साहित्य उसे संवेदना और मानवीय दृष्टि प्रदान करता है। मेरा मानना है कि प्रत्येक व्यक्ति के भीतर भावनाओं को अभिव्यक्त करने की एक स्वाभाविक इच्छा होती है और साहित्य उसी का सुंदर माध्यम है। एक अध्यापिका होने के नाते मैं विद्यार्थियों को केवल ज्ञान ही नहीं, बल्कि संवेदनशीलता का भी पाठ पढ़ाना चाहती हूँ।

प्रश्न 5: संगीत के बदलते स्वरूप के बारे में आपके क्या विचार हैं?
उत्तर: संगीत मेरे जीवन का अभिन्न हिस्सा है। भारतीय शास्त्रीय संगीत की राग, लय और सुर की परंपरा अत्यंत समृद्ध और वैज्ञानिक है। आज के समय में संगीत में अनेक नए प्रयोग हो रहे हैं, जो समय की माँग भी हैं। परिवर्तन स्वाभाविक है, लेकिन मेरा मानना है कि नवीनता के साथ शास्त्रीय मूल्यों और सुरों की शुद्धता भी बनी रहनी चाहिए। यदि परंपरा और आधुनिकता का संतुलित समन्वय बना रहे, तो संगीत की आत्मा सदैव जीवित रहेगी।

प्रश्न 6: कथक नृत्य के प्रति आपका रुझान कैसे बना और इसकी विशेषताएँ क्या हैं?
उत्तर: बचपन से ही मुझे संगीत और नृत्य के प्रति विशेष आकर्षण रहा। इसी रुचि ने मुझे कथक सीखने के लिए प्रेरित किया। कथक केवल एक नृत्य शैली नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, इतिहास और भाव-अभिव्यक्ति की सजीव परंपरा है। इसमें पद-संचालन, घूमर, हस्त-मुद्राएँ, भाव-भंगिमाएँ और ताल का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। इस कला ने मेरे व्यक्तित्व में आत्मविश्वास और मंचीय अभिव्यक्ति को और अधिक सशक्त बनाया है।

प्रश्न 7: दिल्ली शहर के बारे में आपके क्या विचार हैं?
उत्तर: दिल्ली विविध संस्कृतियों, भाषाओं और परंपराओं का सुंदर संगम है। यहाँ अवसर भी हैं और चुनौतियाँ भी। एक ओर यह शहर शिक्षा, साहित्य, कला और रोजगार के अनेक द्वार खोलता है, तो दूसरी ओर तेज़ रफ्तार जीवन व्यक्ति की संवेदनाओं की परीक्षा भी लेता है। मुझे दिल्ली की साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियाँ विशेष रूप से आकर्षित करती हैं। यहाँ विभिन्न क्षेत्रों के लोगों से सीखने और संवाद करने का अवसर मिलता है।

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