शहीद ए भगत सिंह की आखिरी पत्र और फिल्म देखने का शौक क्रांतिकारी चिंगारी को बनाया आग
अजित प्रसाद/ सिलीगुड़ी: शहीद – ए-आजम भगत सिंह पर एक-दो नहीं, बल्कि दर्जनों फिल्में बन चुकी हैं। कभी राजकुमार संतोषी की द लीजेंड ऑफ भगत सिंह, तो कभी मनोज कुमार की शहीद—हर दौर का सिनेमा इस नौजवान क्रांतिकारी को अपनी-अपनी तरह से परदे पर उतारता रहा. पर बहुत कम लोग जानते होंगे कि खुद भगत सिंह का सिनेमा से रिश्ता क्या था। शहीद- ए-आजम भगत सिंह न सिर्फ किताबों के गहरे पाठक और विचारक थे, बल्कि रंगमंच पर भी शानदार अभिनेता रहे। उसे यह फिक्र है हरदम नया तर्ज़े-जफ़ा क्या है, हमें यह शौक है देखें सितम की इंतहा क्या है. दहर से क्यों खफा रहें , चर्ख का क्यों गिला करें,
सारा जहां अदू सही, आओ मुकाबला करें.
कोई दम का मेहमां हूं ऐ अहले-महफ़िल ,
चरागे-सहर हूं बुझा चाहता हूं। मेरी हवा में रहेगी ख़्याल की बिजली,ये मुश्ते-ख़ाक है फ़ानी, रहे रहे न रहे। कॉलेज के दिनों में उन्होंने कई नाटकों में अभिनय किया और दर्शकों को मुग्ध कर लिया। उनका प्रसिद्ध पगड़ी वाला चित्र भी दरअसल नेशनल कॉलेज, लाहौर के ड्रामा क्लब के ग्रुप फोटो से लिया गया है। फिल्में देखने का शौक़ उन्हें अधिक नहीं था।।उनका समय किताबों, विचारों और आंदोलन की तैयारियों में बीतता था।फिर भी एक फिल्म उन्होंने देखी बल्कि अपने साथियों से जबरन दिखवाई। यह फिल्म थी अंकल टॉम्स केबिन, जो गुलामों पर हो रहे अत्याचार और आजादी की लड़ाई की कहानी कहती थी। इसे देखकर भगत सिंह ने कहा था। हर क्रांतिकारी को यह फिल्म देखनी में वर्णित सलूक से भी बुरा बरत रहे हैं। तब न सिर्फ उस सलूक के मुखर आलोचक थे, बल्कि भगत सिंह को ‘अपने रंग में रंगकर’ अपनाने की अनेक सच्ची झूठी कवायदें भी किया करते थे। बहरहाल, पहले वाकया जान लेते हैं। जेलों में बंद और बाहर संघर्ष को तेज करने की कोशिशों में जुटे साथियों की एक ही चाहत थी कि इस मोड़ पर भगत सिंह का साथ जरूरी है। लेकिन खुद भगत सिंह तो बलिदान को कमर कसे हुए थे। उन्हें किसी तरह की रहम या फिर कैद की जिल्लत कुबूल नहीं थी. फांसी के फंदे और उनके बीच सिर्फ एक रात का फासला था. लेकिन उस वक्त भी वे कितने शांत-संयत और बेख़ौफ़ थे। पढ़िए तब क्या चल रहा था अमर शहीद के मन में। जी गया तो क्रांति मद्धिम हो जाएगी :
22 मार्च 1931 को अपने साथियों को संबोधित पत्र में भगत सिंह ने लिखा, “स्वाभाविक है कि जीने की इच्छा मुझमें भी होनी चाहिए. मैं इसे छिपाना नहीं चाहता. लेकिन कैद या पाबंद रह कर जीना मुझे कुबूल नहीं है.” बेशक भगत सिंह जेल में थे लेकिन उनके मुकदमे और फिर फांसी की सजा के ऐलान के बाद उन्हें लेकर देश का जो माहौल था, इसकी उन्हें पूरी जानकारी थी। उन्होंने लिखा, “मेरा नाम हिन्दुस्तानी क्रांति का प्रतीक बन चुका है और क्रांतिकारी दल के आदर्शों और कुर्बानियों ने मुझे बहुत ऊंचा उठा दिया है. इतना ऊंचा कि जीवित रहने की स्थिति में इससे ऊंचा हरगिज नहीं हो सकता. आज मेरी कमज़ोरियां जनता के सामने नहीं हैं लेकिन अगर मैं फांसी से बच गया तो वे जाहिर हो जाएंगी और क्रांति का प्रतीक चिन्ह मद्धिम पड़ जाएगा या फिर शायद मिट ही जाए.”
लाहौर षडयंत्र केस में विशेष ट्रिब्यूनल ने 7 अक्टूबर 1930 को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू को फांसी की सजा सुनाई थी।बेताबी से फांसी का इंतजार:
भगत सिंह को अपनी जिंदगी से ज्यादा आजादी के उस संघर्ष की कामयाबी जरूरी लगती थी, जिसके लिए असंख्य बलिदान हो चुके थे. असेंबली बम कांड के जरिए बरतानिया हुकूमत को जगाने के लिए उन्होंने तो खुद ही अपनी गिरफ्तारी दी थी. अब उन्हें लगता था कि सिर्फ जेल में रहना ही काफी नहीं. क्रांति की ज्वाला को तीव्र करने के लिए अपने प्राण न्योछावर करना जरूरी है. उन्होंने लिखा, “दिलेराना तरीके से हंसते-हंसते मेरे फांसी पर चढ़ने की सूरत में हिन्दुस्तानी माताएं अपने बच्चों के लिए भगत सिंह बनने की आरजू करेंगी. फिर देश की आजादी के लिए कुर्बानी देने वालों की तादाद इतनी बढ़ जाएगी कि क्रांति को रोकना साम्राज्यवाद या तमाम शैतानी ताकतों के बूते की बात नहीं होगी. “
हालांकि उन्हें इस बात का अफसोस था कि देश और मानवता के लिए जो कुछ करने की उनके मन में चाहतें थीं , उनका हजारवां हिस्सा भी पूरा नहीं कर सके।।फांसी के मुहाने खड़े उनके मन की बात इन पंक्तियों के जरिए देश – दुनिया के सामने आई, ” मुझसे अधिक सौभाग्यशाली कौन होगा? आजकल मुझे स्वयं पर बहुत गर्व है. अब तो बड़ी बेताबी के साथ आखिरी इम्तहान का इंतजार है. ख्वाहिश है कि यह और नजदीक आए।“
क्रांति के लिए बलिदान जरूरी
लाहौर षडयंत्र केस में विशेष ट्रिब्यूनल ने 7 अक्टूबर 1930 को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू को फांसी की सजा सुनाई थी. लेकिन फैसले के काफी पहले से ही भगत सिंह अपने लिए फांसी की सजा तय मान रहे थे. सच तो यह है कि कि क्रांति की ज्वाला तीव्र करने के लिए उन्होंने अपना बलिदान जरूरी माना था। चंद्रशेखर आजाद के एतराज के बाद भी असेंबली बम एक्शन में अपना नाम शामिल कराया. बम-पर्चे फेंकने के बाद सुरक्षित निकल भागने की पेशकश ठुकराई। 63 दिन की भूख हड़ताल के बाद 13 सितंबर 1929 को जेल में यतींद्र नाथ दास शहीद हो गए थे. भगत सिंह और साथियों को यतींद्र की शहादत ने व्यथित कर दिया था. लेकिन वे मानते थे कि यह शहादत व्यर्थ नहीं जाएगी. साथ ही जरूरी मानते थे कि जिस मंजिल की उन सबको तलाश है,उसके लिए अभी और बलिदान देने होंगे.
भगत सिंह ने सुखदेव को लिखा, “मुझे अपने विषय में मृत्युदंड सुनाए जाने का अटल विश्वास है. किसी प्रकार की नरमी की मुझे आशा नहीं है. हमारे लिए न क्षमा हो सकती है और न होगी. मेरी अभिलाषा है कि जब आजादी का आंदोलन चरम सीमा पर पहुंचे तो हमें फांसी दे दी जाए. “
जब देश का सवाल तो चंद जिंदगी की क्या बिसात!
जब सवाल देश की आजादी और उसके किस्मत के फैसले से जुड़ा हो और इसे लेकर ब्रिटिश हुकूमत से किसी निर्णायक समझौते की उम्मीद दिख रही हो तो भगत सिंह नहीं चाहते थे कि उनकी या कुछ साथियों की जान बचाने का सवाल उसके रास्ते में बाधक बने।।उन्होंने लिखा, “जब देश के भाग्य का निर्णय हो रहा हो तो व्यक्तियों के भाग्य को पूर्णतया भुला देना चाहिए. हम क्रांतिकारी होने के नाते अतीत के समस्त अनुभवों से पूर्णतया अवगत हैं. इसलिए हम नहीं मान सकते कि हमारे शासकों और विशेषकर अंग्रेजों की भावनाओं में कोई आश्चर्यजनक परिवर्तन हो सकता है. ऐसा परिवर्तन बिना क्रांति के संभव नहीं है. क्रांति तो केवल सतत कार्य करते रहने से, प्रयत्नों से, कष्ट सहने से और बलिदानों से ही की जा सकती है और वह की जाएगी.” हर हाल में मंजिल पर पहुंचना है: बेशक भगत सिंह और क्रांतिकारी साथियों का आजादी के संघर्ष का रास्ता महात्मा गांधी के अहिंसा के रास्ते से अलग था. अनेक अवसरों पर दोनों के मतभेद भी सामने आए. लेकिन क्रांतिकारियों की एक ही चाहत थी कि यह लड़ाई तेज और मजबूत होनी चाहिए। 19 अक्टूबर 1929 को लाहौर में सुभाष चंद्र बोस की अध्यक्षता में सम्पन्न छात्रों के सम्मेलन में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त का जेल से लिखा यह पत्र पढ़ा गया, “इस समय हम नौजवानों से यह नहीं कह सकते कि वे बम और पिस्तौल उठाएं. आज उनके सामने इससे भी अधिक महत्वपूर्ण काम है. जल्दी ही कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में आजादी की जबरदस्त लड़ाई की घोषणा होने वाली है. इन कठिन क्षणों में देश के नौजवानों के कंधों पर बड़ी जिम्मेदारी होगी. ये सच है कि छात्रों ने आजादी की लड़ाई की अगली कतार में मौत से टक्कर ली है. क्या परीक्षा की इस घड़ी में उसी प्रकार की दृढ़ता और आत्मविश्वास प्रदर्शित करने में पीछे तो नहीं रहेंगे? नौजवानों को क्रांति का यह संदेश देश के कोने-कोने में पहुंचाना होगा. कल-कारखानों से झोपड़ियों तक और हर डगर पर करोड़ों लोगों के बीच इसकी अलख जगानी होगी।
आखिरी वक्त भी पढ़ने की ललक
वकील प्राण नाथ मेहता आखिरी शख्स थे, जिनकी भगत सिंह से फांसी के चंद घंटों पहले मुलाकात हुई थी. भगत सिंह ने उनसे लेनिन की जीवनी लाने को कहा था. 23 मार्च को मेहता के जेल पहुंचने पर स्टाफ ने बताया कि नजदीकी रिश्तेदारों के अलावा अन्य किसी से मुलाकात पर रोक के कारण भगत सिंह और साथियों ने किसी से भी
बेशक भगत सिंह और क्रांतिकारी साथियों का आजादी के संघर्ष का रास्ता महात्मा गांधी के अहिंसा के रास्ते से अलग था.
मुलाकात से इनकार कर दिया है. फिर भी मेहता ने कैदियों के वकील के नाते उनकी आखिरी इच्छा जानने के नाम पर मुलाकात की इजाजत हासिल कर ली थी. सिर्फ दो घंटे बाद उन्हें फांसी दी जानी थी. मेहता को देखते ही भगत सिंह ने किताब के बारे में पूछा. हाथ में किताब आते ही भगत सिंह उसे पढ़ने लगे थे.
फांसी के लिए जेल के अफसर जब उन्हें लेने आए तब भी वे यही किताब पढ़ रहे थे. भगत सिंह की भतीजी वीरेन्दर सिंधु ने लिखा, ” कोठरी की दहलीज पर खड़े अफसर ने कहा सरदार जी! फांसी का हुक्म आ गया है. तैयार हो जाइए. भगत सिंह के दाएं हाथ में किताब थी. नजरें उठाए बिना उन्होंने बायां हाथ उठाकर कहा- रुकिए. यहां एक क्रांतिकारी दूसरे से मिल रहा है. कुछ और पंक्तियां पढ़कर उन्होंने किताब एक ओर रख दी और उठते हुए बोले : चलिए ! “
एक दिन पहले दी गई फांसी
फांसी की तारीख 24 मार्च के लिए तय थी. लेकिन व्यापक अशांति की आशंका में एक दिन पहले ही 23 मार्च 1931 की शाम भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को बताया गया कि उसी शाम फांसी दी जाएगी. उनका वजन बढ़ गया था. फांसी के लिए जाते समय तीनाें गा रहे थे,” कभी वो भी दिन आएगा, जब हम आजाद होंगे. ये अपनी ही जमीं होगी, ये अपना आसमां होगा.” जेल की बैरकों में उस शाम दो घंटे पहले ही कैदी बन्द कर दिए गए थे. कैदियों को भगत सिंह और साथियों की फांसी की तैयारी का अहसास हो गया था.
जल्द ही इंकलाब जिंदाबाद-साम्राज्यवाद मुर्दाबाद के नारे गूंजने लगे. तीनो अलग तख्तों पर खड़े किए गए. भगत सिंह बीच में थे. तीनों ने फंदा चूमा. उनके हाथ-पांव बांधे गए. गले का फंदा कसा गया. जल्लाद ने पूछा कि पहले कौन जाना चाहेगा? सुखदेव ने कहा मैं. जल्लाद ने ठोकर मारकर पैरों के नीचे की तख्तियां हटा दीं. उनके शरीर देर तक झूलते रहे. आखिरी वक्त तक उन तीनों की हिम्मत देख मौजूद जेल स्टाफ हतप्रभ रह गया. एक भारतीय अधिकारी ने मौत की शिनाख़्त करने से इनकार कर दिया. उसे फौरन ही निलम्बित कर दिया गया. फिर ये औपचारिकता दो ब्रिटिश अफसरों ने पूरी की.
हमें यह शौक देखें सितम की इंतिहा क्या?
28 सितंबर 1907 को जन्मे भगत सिंह का 23 मार्च 1931 को बलिदान हुआ. छोटी सी उम्र में बड़े काम करके वर अमर हो गए. जिंदगी के हर लम्हे में सिर्फ देश के लिए सोचते रहे. उसी के लिए जिए और उसी के लिए मरे. लेकिन जेल में रहते उन्हें अपने परिवार और उसके दुख और परेशानियों की भी याद आई।
3 मार्च 1931 को उन्होंने भाई कुलवीर सिंह को लिखा, “देख, मैंने किसी के लिए कुछ नहीं किया. तुम सबको विपदाओं में छोड़कर जा रहा हूं. लेकिन कभी न घबराना. इसके सिवाय और क्या कह सकता हूं?” दूसरे छोटे भाई कुलतार को उसी दिन लिखा, “आज तुम्हारी आंखों में आंसू देखकर बहुत दुख हुआ. आज तुम्हारी बातों में बहुत दर्द था. तुम्हारे आंसू मुझसे सहन नहीं होते. बरखुरदार हिम्मत से पढ़ना. सेहत का ध्यान रखना.हौसला रखना. ..और क्या कहूं।



