शादी के बाद बहू की पहली होली मायके में मनाने की क्या परंपरा है ?

 

अजित प्रसाद /सिलीगुड़ी: शादी के बाद बहू की पहली होली मायके में मनाने की परंपरा भारतीय संस्कृति में प्रेम, सम्मान, सुरक्षा और भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक है, जो उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, हरियाणा में निभाई जाती है. जानिए इसके पीछे का कारण। राजस्थान के ग्रामीण समाज में फागन का महीना सिर्फ रंगों की मस्ती का नाम नहीं है, बल्कि यह सदियों पुरानी परंपराओं और लोकमान्यताओं का प्रतीक भी है. जालौर सहित मारवाड़ के कई इलाकों में शादी के बाद पहली होली को लेकर आज भी एक खास मान्यता प्रचलित है. यहाँ नई बहू अपनी पहली होली ससुराल में नहीं मनाती। प्राचीन समय से चली आ रही इस रस्म के तहत, होली आने से पहले ही बहू को उसके पीहर (मायके) भेज दिया जाता है। इसे मायके का अधिकार भी माना जाता है, जहाँ बेटी को विशेष स्नेह, उपहार और बड़ों का आशीर्वाद मिलता है। ग्रामीण लोकविश्वास के अनुसार, पहली होली पर सास और बहू को एक साथ होलिका दहन की अग्नि नहीं देखनी चाहिए। बुजुर्गों का मानना है कि यदि दोनों एक साथ जलती हुई होलिका के दर्शन कर लें, तो भविष्य में उनके रिश्तों में कड़वाहट या नोकझोंक बढ़ सकती है। स्थानीय बुजुर्ग महिला सरला देवी बताती हैं कि फागन के महीने में सास-बहू को ज्यादा समय साथ नहीं बिताना चाहिए। यदि किसी अनिवार्य कारण से बहू पीहर नहीं जा पाती और ससुराल में ही रुकती है, तो होलिका दहन के समय उसे गाँव में ही किसी रिश्तेदार या पड़ोसी के घर भेज दिया जाता है ताकि वह और उसकी सास एक ही अग्नि को न देखें। इस परंपरा के पीछे एक दिलचस्प तर्क यह भी दिया जाता है कि यदि सास-बहू साथ में होलिका दहन देख लें, तो इसका दोष या ‘भार’ सास पर पड़ता है। हालांकि, इस परंपरा का कोई स्पष्ट धार्मिक या शास्त्रीय प्रमाण नहीं मिलता है, लेकिन सामाजिक अनुभवों के आधार पर इसे पीढ़ियों से निभाया जा रहा है। जानकारों का मानना है कि संयुक्त परिवारों के दौर में सास और बहू के बीच शुरुआत में एक स्वस्थ दूरी बनाए रखने और रिश्तों को संतुलित व मधुर रखने के उद्देश्य से ऐसे नियम बनाए गए होंगे। जैसे-जैसे समय बदल रहा है, शहरी समाजों में इन मान्यताओं का प्रभाव कम होता जा रहा है। आज कई आधुनिक परिवारों में सास और बहू मिलकर पहली होली खुशी-खुशी मनाती हैं और होलिका दहन की पूजा भी साथ करती हैं। बावजूद इसके, जालौर के ग्रामीण अंचलों और पारंपरिक परिवारों में यह मान्यता आज भी अपनी जगह बनाए हुए है। यह लोक कथाएँ और नियम हमें याद दिलाते हैं कि हमारी संस्कृति में रिश्तों की मर्यादा और संतुलन को कितना महत्व दिया गया है।भारतीय पारंपरिक संस्कृति में शादी के बाद बहू की पहली होली मायके में मनाने की प्रथा सदियों पुरानी है। यह परंपरा सिर्फ एक रिवाज़ नहीं, बल्कि प्रेम, अपनापन और भावनात्मक जुड़ाव का सुंदर प्रतीक है।इसके पीछे कई सामाजिक और धार्मिक कारण माने गए हैं। नए रिश्तों में सहजता लाने का समय: शादी के तुरंत बाद लड़की एक नए घर, नए लोगों और नए माहौल में जाती है।
होली जैसे रंगों और शोरगुल वाले त्योहार के दौरान उसे असहजता महसूस न हो, इसलिए यह माना गया कि पहली होली वह अपने मायके में, अपने परिवार और बचपन के वातावरण में मनाए।इससे उसे भावनात्मक स्थिरता मिलती है और नए रिश्तों में ढलने के लिए समय मिलता है।
बेटी को मायके में सम्मान और प्यार देने की परंपरा
भारतीय संस्कृति में बेटी हमेशा अपने मायके के लिए प्रिय मानी जाती है। शादी के बाद पहली होली पर उसे मायके बुलाना प्यार, सम्मान और अधिकार देने का तरीका है। यह संकेत है कि शादी के बाद भी लड़की का मायके पर पूरा हक है।ससुराल के प्रति शुभ संकेत शास्त्रीय मान्यता के अनुसार, बहू का मायके जाकर पहली होली मनाना ससुराल और मायके, दोनों परिवारों को शुभता और समृद्धि देता है। माना जाता है कि मायके से खुश होकर आने वाली बहू ससुराल में सुख और सकारात्मक ऊर्जा लेकर आती है। परंपरा से जुड़ी भावनात्मक वजहें
होली रंगों, मस्ती और परिवार के साथ समय बिताने का त्योहार है. नई दुल्हन को माता-पिता से मिलकर भावनात्मक सहयोग मिलता है। सामाजिक दृष्टि से सुरक्षा का कारण
पुराने समय में होली पर माहौल अनियंत्रित, रंगों और पानी का अधिक उपयोग और सफर लंबा होता था।नई दुल्हन को ससुराल में रंग खेलने की झिझक भी रहती थी।
इसलिए परिवार उसे सुरक्षित माहौल, मायके, में भेजते थे। रीति-रिवाज़ों की निरंतरता: कई राज्यों में, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, हरियाणा, यह परंपरा आज भी निभाई जाती है. इसे शगुन माना जाता है।पहली होली के मायके से बहू जब वापस आती है तो ससुराल में उसे उपहार, आशीर्वाद और पूर्ण सम्मान मिलता है।शादी के बाद पहली होली मायके में मनाना सिर्फ रीति नहीं, बल्कि प्यार, सुरक्षा, सम्मान और भावनात्मक जुड़ाव का सुंदर प्रतीक है। यह परंपरा दोनों परिवारों के रिश्तों में मिठास बढ़ाने और बहू को सहजता देने का माध्यम है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button