बाल साहित्य लेखिका आभा दवे से राजीव कुमार झा की बातचीत…
साक्षात्कार
बच्चों के संस्कार जितने अच्छे रहेंगे उतना ही देश का भविष्य उज्जवल होगा।- आभा दवे
प्रश्न.1. आप बाल साहित्य लेखन के प्रति समर्पित रही हैं।इस साहित्य की प्रासंगिकता और इससे जुड़े अपने लगाव के बारे में क्या कहना चाहेंगी?
उत्तर- बच्चे देश का भविष्य होते हैं। आगे का भविष्य इन्हीं नाजुक कंधो पर है। बचपन में डाले गए संस्कार जीवन भर साथ होते हैं।
चूंकि मैं एक शिक्षिका भी हूँ इसलिए शुरू से ही बच्चों के प्रति लगाव रहा है। बच्चों के संस्कार जितने अच्छे रहेंगे उतना ही देश का भविष्य उज्जवल होगा। इसी विचारों के साथ बाल साहित्य की ओर झुकाव हुआ और इसी के चलते मैंने प्ले – नर्सरी स्कूल भी खोला( 2005-2007 ) और आठ साल (2007- 2015) विदेश में रहने के पहले ये स्कूल चलाया । हालांकि उस समय मैं महिला विश्वविद्यालय चर्चगेट में भी पढ़ा रही थी । आज इसी प्ले-नर्सरी स्कूल के बच्चे देश- विदेश में कार्य कर रहे हैं। मेरे द्वारा डाले गए संस्कार वो भूले नहीं हैं आज जब भी मिलते हैं पैर छू कर आशीर्वाद जरूर लेते हैं।
जहाँ तक मेरे बाल साहित्य लेखन का सवाल है तो उसे बहुत अच्छा प्रतिसाद मिला है। मेरी बाल कविताएं/ कहानियां एक गुरुकुल / संस्कारों की क्लास और कई परिचित शिक्षिका द्वारा स्कूल में पढ़ाई जा रही है। महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी सोहनलाल द्विवेदी पुरस्कार (2023-24) एवं 2026 में ही आओ तुम्हें कृष्ण बना दूँ ( बाल काव्य संग्रह) काव्य साहित्य सेवा पुरस्कार ने मेरी लेखनी में ऊर्जा का संचार किया। उनकी मैं आभारी हूँ।
प्रश्न.2. अपने घर परिवार माता- पिता और शिक्षा दीक्षा के बारे में बताइए।
उत्तर-मेरे पति मुंबई में एक प्रतिष्ठित प्राइवेट कंपनी में उच्च पद पर कार्यरत रह चुके हैं । तीन साल पहले ही वो अपने पद से रिटायर हुए हैं पर अब भी कई पदों पर सक्रिय हैं। मेरे माता -पिता दिव्यलोक में विलीन हो चुके हैं। पिता जी सरकारी पद पर उच्च पदासीन थे मध्यप्रदेश मेें। माँ एक संस्कारी धार्मिक महिला थी। ससुराल में सभी उच्च पदों पर हैं। सासु माँ हिंदी विभागाध्यक्ष रह चुकी हैं, महाराष्ट्र के चंद्रपूर में। इस समय उनका निवास स्थान बंगलोर है। ससुर जी दिव्य लोक में विलीन हो चुके हैं। मेरी इकलौती बेटी इंजीनियर है और एक प्रतिष्ठित कंपनी में कार्यरत है । दामाद भी प्रतिष्ठित कंपनी में हैं। मेरा जन्म दमोह (मध्यप्रदेश ) मेें हुआ है और स्कूली शिक्षा अलग-अलग जगहों पर हुई है,पर मेरी उच्च शिक्षा सागर विश्वविद्यालय (मध्यप्रदेश ) से हुई है। एम. ए. इतिहास ,बी.एड सागर से ही हुआ। शादी के बाद मुंबई आने पर एम. ए. हिंदी, अनुवाद डिप्लोमा, पेटिंग , संगीत सब कुछ मुंबई मेें हुआ।
प्रश्न.3.आपको देश – विदेश की साहित्य संस्थाओं से सम्मान प्राप्त हुए हैं। साहित्य में इतने आदर सम्मान के प्रति अपने हृदय के उद्गारों को किस तरह प्रकट करना चाहेंगी?
उत्तर– किसी भी तरह का सम्मान या पुरस्कार जीवन में ऊर्जा का संचार करता है। चाहे किसी भी क्षेत्र में सम्मान हो। हालांकि मैंने कभी सम्मान प्राप्ति के लिए लेखन नही किया, लेखन कार्य मेरा शौक रहा है पर यह सम्मान मुझे लगातार मिलता रहा । पहला सम्मान मुझे गुजराती से हिंदी अनुवाद के लिए आदरणीय राम जेठमलानी जी के कर कमलों से प्राप्त हुआ था 1999 में, जो मेरे लिए बहुत ही खास रहा। सभी सम्मान और पुरस्कारों ने मेरी लेखनी को एक नयी पहचान दी है जो मेरे लिए गर्व की बात है। सभी के प्रति कृतार्थ हूँ।
प्रश्न.4.साहित्य लेखन के अलावा अपनी अन्य अभिरुचियों के बारे में बताइए।
उत्तर-साहित्य के साथ-साथ स्कूल के समय से ही खेलों में रुचि रही है। सिलाई -कढ़ाई ,बुनाई के साथ ही टेबल टेनिस,बैडमिंटन ,पेटिंग,गाने में रुचि है। अंकशास्त्र ,हस्तरेखा (कंसल्टेंट) गायन का कार्य भी वर्तमान में जारी है। साथ ही मीडिया के अलग-अलग लिंक एवं यूट्यूब पर कार्य जारी है।
प्रश्न.5.पुस्तकों के पठन-पाठन के प्रति बच्चों के भीतर आने वाले मौजूदा बदलावों से जुड़े प्रश्नों के बारे में आप क्या सोचती हैं?
उत्तर- आजकल के समय में शिक्षा में बहुत बदलाव आया है। पहले नैतिक शिक्षा पर बहुत जोर दिया जाता था। बचपन से ही बच्चों को गर्मी की छुट्टियों में बाल पुस्तक पढ़ने को मिल जाती थी। चंपक, चँदामामा , कॉमिक्स जैसी पत्रिका के प्रति एक लगाव होता था। अब समय बदल चुका है अब बच्चे टी. वी या मोबाइल पर कार्टून देख कर सब सीख पढ़ रहे हैं। पुस्तकें पढ़ने में रुचि कम हो गई है। केवल जो स्कूल के विषय से संबंधित है वही वे पढ़ रहे हैं। आज बड़े पाठकों के साथ -साथ बाल पाठकों की संख्या कम हो रही है जो कि चिंता का विषय है। मेरा ऐसा मानना है कि बच्चों को सप्ताह में एक दिन स्कूल के पुस्तकालय में बच्चों को सभी प्रकार की पुस्तकों से रूबरू कराया जाए और उन्हें अपनी रुचि के अनुसार पुस्तकें पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। अच्छी पुस्तकें जीवन भर की दोस्त होती हैं। हालांकि मेरा ऐसा भी मानना है कि आज के बच्चे पढ़ाई के साथ अन्य क्षेत्रों में बहुत आगे हैं बस कमी है तो अच्छे संस्कारों की।
सभी बच्चों का भविष्य उज्जवल हो यही कामना है।

