घर की लक्ष्मी या आग का दरिया: कौन बना रहा बेटियों को कठोर?

 

विशेष संवाददाता – पश्चिम चंपारण,बिहार_ आज के दौर में जहां बेटियों को आकाश देने की बातें हो रही हैं, वहीं कुछ घटनाएँ ऐसी भी सामने आ रही हैं जो सोचने पर मजबूर करती हैं कि कहीं यह उड़ान दिशा विहीन तो नहीं हो गई है? रवींद्र सिंह मंजू सर मैहर की कलम से निकली सच्चाई, समाज के सामने एक ऐसा आईना रखती है जिसमें संवेदना, चेतावनी और आत्ममंथन के भाव एक साथ नजर आते हैं।

रवींद्र सिंह मंजू सर ने हाल ही में एक ऐसी मार्मिक घटना पर अपनी प्रतिक्रिया साझा की, जिसमें एक पत्नी ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर पति की हत्या कर दी और फिर मासूम बनकर खुद को पीड़िता दिखाने की कोशिश की। यह घटना न केवल एक पति की जान ले गई, बल्कि एक माँ की ममता, एक पिता की मेहनत और एक पूरे परिवार की खुशियों को भी लील गई।

उनकी कलम सवाल उठाती है कि जब बेटी के हाथ में किताब की जगह मोबाइल और संस्कारों की जगह “फ्रीडम विदाउट रिस्पॉन्सिबिलिटी” का ज़हर भर जाए, तो क्या वह वास्तव में ‘घर की लक्ष्मी’ रह पाती है? क्या सोशल मीडिया की अंधी दौड़ ने आज की पीढ़ी को आत्मकेंद्रित और रिश्तों के प्रति संवेदनहीन बना दिया है?

*बदलती सोच, बदलती परवरिश*

मंजू सर लिखते हैं कि आज ‘मैं अपनी ज़िंदगी के फैसले खुद लेती हूँ’ जैसा एटीट्यूड अगर ज़िम्मेदारी के बिना आ जाए तो यही आज़ादी दूसरों के लिए घातक बन जाती है। बेटी अगर देवी है तो बेटा भी बलि का बकरा नहीं है। आज राजा रघुवंशी की तरह लाखों बेटे झूठे केस, तलाक, मानसिक प्रताड़ना और अब सीधे हत्या के शिकार हो रहे हैं। लेकिन समाज चुप है, क्योंकि आरोपी लड़की है?

*परिवार, परवरिश और सोशल मीडिया की भूमिका*

वे लिखते हैं कि “सिर्फ उड़ान नहीं, बेटियों को दिशा देना भी जरूरी है।” सोशल मीडिया, इंस्टाग्राम, रील्स और बोल्ड कंटेंट ने युवा सोच पर जिस तरह से असर डाला है, वह अब सामाजिक संतुलन को तोड़ता नजर आ रहा है। बेटियों को संस्कारों की नींव देनी होगी, वरना वे वही ‘चील’ बन सकती हैं, जो घरों को नोंच डालें।

*एक माँ का दुःख और एक समाज की चुप्पी*

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि राजा रघुवंशी की माँ ने पहले अपने बेटे की डोली देखी और कुछ ही दिनों में उसकी अर्थी उठाई। यह सिर्फ हत्या नहीं थी, यह भावनाओं और विश्वास की भी मौत थी। रवींद्र सिंह मंजू सर कहते हैं – “अब समाज को चुप रहने का हक नहीं। हर माँ-बाप को बेटियों को चरित्र की शिक्षा देनी होगी। वरना यह आग किसी दिन आपके ही घर तक पहुँच जाएगी।”

*समापन में एक स्पष्ट संदेश*

समाज को झकझोरते हुए मंजू सर की कलम कहती है:
“शादी कोई सौदा नहीं, आत्माओं का मिलन है।
पति कोई एटीएम नहीं, जीवनसाथी है।
बेटी सिर्फ शरीर नहीं, चरित्र भी है।”

अब समय आ गया है जब हम सिर्फ बेटियों को उड़ने की आज़ादी न दें, बल्कि उन्हें सिखाएँ कि आकाश में उड़ना है तो ज़मीन से रिश्ता बनाए रखना ज़रूरी है।

*नोट:* यह रिपोर्ट किसी भी जाति, लिंग या वर्ग के विरुद्ध नहीं है, बल्कि समाज में संतुलन और जिम्मेदारीपूर्ण आज़ादी के पक्ष में एक चेतावनी है।

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