माँ धरती पिता आकाश* (साझा काव्य संग्रह)

पुस्तक समीक्षा

“माँ धरती – पिता आकाश” शीर्षक से प्रकाशित कृति की डॉमंजु गुप्ता संपादक हैं। यह कृति
अपने आप में भारतीय संस्कृति की भावनात्मक गहराइयों को समेटे हुए है। माँ को धरती के समान धैर्य, ममता और सृजन का प्रतीक तथा पिता को आकाश के समान संरक्षण, विस्तार और संबल का स्वरूप मानने की अनुभूति इस साझा काव्य संकलन के प्रत्येक पृष्ठ पर स्पंदित होती है। आदरणीया डॉ. मंजु गुप्ता के कुशल संपादन तथा डॉ. दिव्या सिन्हा की प्रेरणादायी साहित्य-साधना से सुसज्जित यह कृति अनेक साहित्यकारों की संवेदनाओं का सुंदर समवेत स्वर बनकर उभरी है। निष्कर्ष प्रकाशन द्वारा प्रकाशित यह संकलन विषय, भाव और प्रस्तुति—तीनों दृष्टियों से अत्यंत सराहनीय है।

इसमें संकलित रचनाएँ माता-पिता के त्याग, प्रेम, संघर्ष, संस्कार और संरक्षण का मार्मिक चित्र प्रस्तुत करती हैं। कहीं माँ की गोद को स्वर्ग कहा गया है, तो कहीं पिता के श्रम और अनुशासन को जीवन का आधार बताया गया है।
संकलन में श्री विनोद कुमार दुबे की “फिर ना मिलेगा” माता-पिता के अमूल्य सान्निध्य का स्मरण कराती है, वहीं हेमा जालान ‘कनक’ की “ममता का आँचल” मातृत्व की करुणा और त्याग का मधुर चित्र उकेरती है।

श्री दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’ की “माँ की ममता और पिता का बल” भावों का सुंदर समन्वय प्रस्तुत करती है तथा भगवती प्रसाद द्विवेदी की “माई” लोकभाषा के माध्यम से आत्मीयता का सहज संसार रचती है। डॉ. मंजु गुप्ता के दोहे, वंदना और घनाक्षरी छंद संकलन को छंद-सौंदर्य से अलंकृत करते हैं। यह कृति केवल पढ़ने योग्य नहीं, बल्कि हृदय में उतारने योग्य है। वर्तमान समय में जब पारिवारिक मूल्य चुनौतियों से घिरे हैं, तब ऐसी पुस्तकें समाज को दिशा देने और नई पीढ़ी को संस्कारों से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य करती हैं। निस्संदेह “माँ धरती – पिता आकाश” साहित्य जगत में दीर्घकाल तक स्मरणीय रहने वाली उत्कृष्ट साझा कृति सिद्ध होगी। डॉमंजु गुप्ता ने भारत की महामहिम परम् आ महिला राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू जी को भारत की मात के रूप में चौपाई में रचा है । देखिए बानगी -चौपाइयों में माता आ द्रौपदी मुर्मू जी
शुभ दिन सुंदर मंगलआया
मुर्मूजी का श्रीयश लाया।।
दूर करी खुद की सब बाधा।
रहा नहीँ फिर दुख अब आधा।।
लगती वह है सीता- राधा।
वंचित पिछड़ा सभी अगाधा।।
हीर कनी वह है संथाली।
बनी उड़ीसा की वह लाली।।
डॉ मंजु ने भारत के लोकप्रिय प्रधानमंत्री आ श्री नरेंद्र मोदी जी को पिता के रूप में दोहों में लेखनी चलाई । पंक्तियाँ हैं- बना विश्वकर्मा यहाँ, शिल्पकार का सार।
कड़े फैसले ले किया , देश -जगत उद्धार।।
तिन सौ सत्तर हठ गया,बुझी घृणा की आग।
केसर क्यारी में फिर खिली,सुखद खुशी के फाग।।
नवभारत के स्वप्न को,देता मोदी आकार।
भारत माता के लिए, त्याग दिया घरबार।।
कृति – माँ धरती पिता आकाश काव्य
मूल्य -₹599/ संपादक-डॉमंजु गुप्ता
निष्कर्ष प्रकाशन , मध्यप्रदेश। प्रकाशन वर्ष2026
समीक्षक*कवि दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’*
*जनपद संभल उत्तर प्रदेश*

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