हिमाचल प्रदेश की लेखिका सुषमा खजूरिया की किताब संस्मरण सेतु का हाल ही में प्रकाशन हुआ है। यहां इस प्रसंग में राजीव कुमार झा की उनके साथ संपन्न बातचीत प्रस्तुत है !
साहित्य: साक्षात्कार
प्रश्न: हाल में प्रकाशित अपनी पुस्तक संस्मरण सेतु के बारे में बताइए?
उत्तर :‘संस्मरण सेतु ‘पुस्तक में मैंने उन व्यक्तियों आत्मीयजनों के जीवन के तात्कालिक यथार्थ को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया है जिनके प्रति मेरे मन में आदर और अनन्य सम्मान का भाव विद्यमान रहा है । जिनके व्यक्तित्व की छवि वर्षों के अंतराल के पश्चात भी धूमिल नहीं हुई है उनके व्यक्तित्व का विश्लेषण किया है । उनके महान जीवन संघर्षों को वर्णित किया है । अतीत और वर्तमान के परिपेक्ष्य में यह वर्णन हुआ है । बचपन से डेली डायरी लिखने की आदत थी । संक्षेप में लिखे वर्णन को बाद में विस्तृत करके कथानक, संवाद, देशकाल और वातावरण में डालकर अपनी स्मृति के झरोखे से अपने जीवन से संबद्ध परिवारों का सूक्ष्म विश्लेषण इसमें किया है । आपने ममता कालिया जी के संस्मरण साहित्य का जिक्र किया । इस विषय में मैं कहना चाहूंगी कि इलाहाबाद ममता जी की स्मृतियों का शहर था । वे अपने पति सहित वहां रहीं थीं । इसके पश्चात दिल्ली में रहने लगीं । इलाहाबाद के लोगों के सुख दुःख का वर्णन उन्होंने अपनी पुस्तक ‘जीते जी इलाहाबाद’ में बहुत सुंदर ढंग से किया क्योंकि संस्मरण में अपने पक्ष को उजागर किया जाता है । इसमें एक जिम्मेदारी होती है । लेखिका जीते जी पुनः वहां जाना चाहती हैं । संस्मरण विधा की यह पहली कृति है जिसे पुरस्कार मिला है । संस्मरण जिनके बारे में हो उनके प्रति रुचि होनी चाहिए । शुरू में लेखिका को यह शहर सुस्त लगा था पर वहां के साहित्यिक वातावरण के कारण उन्हें यह शहर अच्छा लगा । कॉफी हाउस में सभी लेखक इकट्ठे होते थे | वहां भारतीय प्रकाशन का शोरूम पास ही था ।
प्रश्न: आप अपने घर परिवार, माता – पिता और शिक्षा के बारे में जानकारी दीजिए।
उत्तर: मेरे पापा का पैत्रिक घर हिमाचल प्रदेश के जिला बिलासपुर के अंचल बाड़ी मझेड़वां में है । पापा का व्यवसाय पंजाब के जालंधर शहर में भगतसिंह चौक में था इसलिए वे वहीं बस गए । मेरा जन्म और शिक्षा जालंधर में हुई । प्रारम्भिक शिक्षा आदर्श केंद्र स्कूल भगतसिंह चौक, मैट्रिक मंडी फैंटनगंज गर्ल्स स्कूल जालंधर में हुई । एस डी कॉलेज फोर वूमेन जालंधर से बी ए मानविकी किया और एच एम वी कॉलेज से एम ए किया । ये कॉलेज गुरु नानक देव विश्वविद्यालय अमृतसर से संबद्ध हैं । मैं तीन भाइयों की इकलौती बहन बचपन से ही तुकबंदी करती और स्कूल के मंच पर स्वरचित कविता सुनाती । मेरी शादी हिमाचल के जिला बिलासपुर के अंचल निहाण में श्री अनिल खजूरिया जी से हुई । पहले सुषमा शर्मा के नाम से पंजाब की पत्र – पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही | पश्चात नाम के साथ खजूरिया जुड़ गया । सरस्वती संस्कृत कॉलेज एवं आचार्य विनोबा भावे वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला डंगार में हिंदी प्रवक्ता के रूप में सेवाएं दीं |इसके पश्चात व. मा. पा. रणहुकोठी चम्बा में सेवाएं दीं । वहां से स्थानांतरित होकर बिलासपुर के सुन्हाणी, कलोल और बरठीं के स्कूलों में सेवाएं दीं और बरठीं से सेवानिवृत्त हुई ।
प्रश्न: साहित्य की भूमिका के बारे में क्या कहना चाहेंगी?
उत्तर: साहित्य हमारे जीवन की समस्त आत्मिक अनुभूतियों, भावों और विचारों को अभिव्यक्ति प्रदान करता है ।साहित्य की भाषा का इसकी सफलता में अत्यंत महत्व रहता है । मेरे पाठकों ने बातों ही बातों में बताया कि आपकी रचनाओं में, विशेष कर ‘संस्मरण सेतु’ में अच्छा शब्द चयन और सरल सहज भाषा प्रयोग के कारण आनंद की अनुभूति हुई | विषयवस्तु आसानी से समझ आई । भाषा शैली के कारण आई रोचकता पारिवारिक, सामाजिक पृष्ठभूमि को वर्णित करने में सक्षम है । आदरणीया डॉ रीता सिंह जी ने अपने शुभ संदेश में और डॉ कौशिक जी ने अपने पूर्वकथन में प्रस्तुत पुस्तक की भाषा में सरलता, सजगता एवं सहजता का गुण बता कर कृतार्थ किया ।
प्रश्न: क्षेत्रीय स्तर पर आपके साहित्य में किस राज्य की सामाजिक -सांस्कृतिक विरासत की अभिव्यक्ति हुई है?
उत्तर:जी, मैं मुख्य रूप से पंजाब और हिमाचल दोनों राज्यों से जुड़ी हुई हूं इसलिए दोनों की विरासत और धरोहर अर्थात् सामाजिक – सांस्कृतिक जीवन का साझा विवरण मेरे साहित्य में स्वयं ही अभिव्यक्त हो जाता है |




